वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवाक्यलक्षणाया उपपादनम् ] आगमपरिच्छेदः २३९
आवृत्ति करने में कोई कारण नहीं है । अतः पुनरुक्ति की उपपत्ति ही नहीं लगाई जा सकती ।
इस पर यदि ऐसा कहें कि—'नदी' शब्द की केवल 'तीर' अर्थ में लक्षणा न कर 'नदी तीर' अर्थ में लक्षणा है, और 'नदीतीर' रूप लक्ष्यार्थ के 'नदी' रूप अंश के साथ ही गंभीर पद का अन्वय होता है, ऐसा करने पर कोई दोष नहीं है ।
परन्तु यह कहना ठीक नहीं है—एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ के साथ ही अन्वय होता है, उसके एकदेश के साथ नहीं । यह शाब्दबोध के विषय में नियम है । अतः 'नदीतीर' पद के नदीरूप एक अंश के साथ गंभीर पद का अन्वय हो नहीं सकता । इसलिये परिशेषन्याय से गंभीर और नदी दोनों पदों की तीररूप अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है । वह अर्थ गंभीर और नदी परस्परान्वित इन दो पदों से निष्पन्न होता है इस कारण यह वाक्यवृत्ति लक्षणा है । अर्थात् शक्ति के समान लक्षणा भी पदमात्रवृत्ति ही होती है, यह नियम नहीं बनाया जा सकता । प्रत्युत लक्षणा जैसी पदवृत्ति होती है, वैसी वाक्यवृत्ति भी होती है—यह मानना पड़ता है ।
शंका—लक्षणा का स्वरूप तो 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' बताया गया है । किन्तु वाक्यार्थ में शक्ति के न होने से उसको शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा कैसे संभव हो सकेगी ? इस प्रकार शंका उपस्थित कर उसका समाधान ग्रन्थकार करते हैं—
ननु ^१वाक्यार्थस्याशक्यतया कथं शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणा ? ।
उच्यते । शक्त्या ^२यत्पदसम्बन्धेन ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा, शक्तिज्ञाप्यश्च यथा पदार्थस्तथा वाक्यार्थोऽपीति न काचिदनुपपत्तिः ।
**अर्थ—**वाक्यार्थ में अशक्यता होने से अर्थात् वाक्यार्थ में शक्यत्व के न होने से उसमें शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा है—यह कैसे कहा जा सकेगा ? ऐसा शंका यदि हो तो समाधान बताते हैं—शक्ति से पदसम्बन्ध के द्वारा जो बोधित किया जाता है उसका सम्बन्ध ही लक्षणा है, और पदार्थ जैसे शक्ति से ज्ञाप्य ( बोध्य ) होता है, वैसे वाक्यार्थ भी शक्ति से ज्ञाप्य होता है । अतः वाक्य में लक्षणा के स्वीकार करने में कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
**विवरण—**जब किसी शाक्यार्थ ( वाच्यार्थ ) की उपपत्ति नहीं लगती, तब उसकी शक्यार्थसंबद्ध अर्थ में लक्षणा करनी पड़ती है । परन्तु जो अर्थ, वाच्य ही नहीं है उसकी तत्संबद्ध अर्थ में लक्षणा कहना तो बन्ध्यापुत्र का किसी से सम्बन्ध प्रदर्शन करने के
१. क्यस्याश०'–इति पाठान्तरम् ।
२. पदेन स्वनिष्ठशक्त्या यज्ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा । तथा च—'स्वबोध्यसम्बन्धत्वं' लक्षणाया लक्षणमुभयसाधारणत्वादावश्यकम् ।