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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 482 में से

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पृष्ठ 298

२४० वेदान्तपरिभाषा [ अर्थवादानां पदैकवाक्यता

समान ही होगा—यह आशय शंका करने वाले का है। इस पर ग्रन्थकार यह समाधान देते हैं—पदार्थ (पदजन्य अर्थ) जैसे शक्य (वाच्य) है वैसे ही वाक्यार्थ भी शक्य (वाच्य) है। इसलिये शक्यसंबंधरूप लक्षणा वाक्य में भी हो सकती है क्योंकि 'जो अर्थ, शक्ति से साक्षात् बोधन किया जाय वही शक्यार्थ है' इस प्रकार शक्य शब्द की व्याख्या यदि हमने स्वीकार की होती तो आपको कथनानुसार हमारे पक्ष में भी वाक्य में लक्षणा की अनुपपत्ति हुई होती। परन्तु शक्यार्थ का वैसा लक्षण न कर 'शक्ति से साक्षात् या परम्परा से जो अर्थ ज्ञात हो वही शक्यार्थ है' लक्षण मानते हैं—इस कारण शक्ति से साक्षात् यद्यपि पदार्थ ही बोधित होता है तथापि परंपरा से वाक्यार्थ भी बोधित होता है। पद से पदार्थ का ज्ञान होते ही उन पदार्थों के परस्पर अन्वय से हमें जो अर्थ ज्ञात होता है, वही वाक्यार्थ है, वह भी शक्ति से ही परम्परया ज्ञात होता है। इसलिये पदार्थ के समान वाक्यार्थ में भी शक्यता है। इस कारण पद के समान वाक्य की भी अपने शक्यार्थ—सम्बद्ध अर्थ में लक्षणा हो सकती है।

अब लौकिक वाक्य में जैसी लक्षणा हो सकती है उसी प्रकार वैदिक वाक्य में भी लक्षणा होती है—इस बात को ग्रन्थकार कह रहे हैं—

एवमर्थवादवाक्यानां प्रशंसारूपाणां प्राशस्त्ये लक्षणा। सोऽरोदी-
दित्यादिनिन्दार्थवाक्यानां¹ निन्दितत्वे लक्षणा। अर्थवादगतपदानां
²प्राशस्त्यादिलक्षणाऽभ्युपगमे एकेन पदेन लक्षणया तदुपस्थितिसम्भवे
पदान्तरवैयर्थ्यं स्यात्। एवं च विध्यपेक्षित-प्राशस्त्यरूपपदार्थ-
प्रत्ययकतया अर्थवादपदसमुदायस्य³ पदस्थानीयतया विधिवाक्येन⁴
एकवाक्यत्व भवतीत्यर्थवादानां⁵ पदैकवाक्यता।

**अर्थ—**इसी प्रकार प्रशंसारूप अर्थवाद-वाक्यों की विधि के प्राशस्त्य में लक्षणा एवं 'सोऽरोदीत्' इत्यादि निन्दार्थक अर्थवादवाक्यों की 'निन्दितत्व' रूप अर्थ में लक्षणा होती है।


१. 'वादानां'–इति पाठान्तरम्।
२. स्त्ये ल०'–इति पाठान्तरम्।
३. 'प्रशस्तः' इत्येकेन पदेन यावानपेक्षितः अर्थो बोध्यते, तावानेव 'वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेन उपधावति स एवैनं भूतिं गमयति' अस्यार्थवादवाक्यस्या- प्यर्थः इति पदसमुदायस्यापि अस्य पदस्थानीयत्वम्।
४. 'पदेन'–इति पाठान्तरम्।
५. 'दवाक्यानां'–इति पाठान्तरम्।