वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवाक्यलक्षणोपपादनम् ] आगमपरिच्छेदः २४१
शंका—अर्थवादवाक्य के पदों की ही प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा होती है—यह क्यों नहीं मानते ?
समाधान—अर्थवादवाक्य के पदों की ही प्राशस्त्य अथवा निन्दितत्व रूप अर्थ में लक्षणा यदि मान लें तो एक ही पद से लक्षणा के द्वारा उन अर्थों की उपस्थिति हो जायगी जिससे अन्य पद व्यर्थ होंगे अर्थात् एक ही पद से प्राशस्त्य या निन्दितत्वादि अर्थों का लक्षणा के द्वारा यदि ज्ञान हो जाय तो अन्य पद व्यर्थ हैं, समझना पड़ेगा । इसलिये अर्थवाद-वाक्य के पदसमूह में विधि से अपेक्षित ऐसे प्राशस्त्यरूप पदार्थ की बोधकता होने के कारण पदस्थानीयत्व होता है। अर्थात् वह पदसमूह एक पद के समान ही होता है। इस कारण उनकी विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता होती है। इसलिये अर्थवादवाक्यों की पदैकवाक्यता मानी जाती है।
विवरण—'गम्भीरायां नद्यां घोषः' इस वाक्य के किसी एक ही पद की लक्षणा न होकर गम्भीर एवं नदी दो पदों की अर्थात् वाक्य की ही तीर अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है।
इस पर यदि कोई कहे कि 'पदार्थः पदार्थेनान्वेति न तु तदेकदेशेन' यह नियम व्यभिचारी है अर्थात् नित्य ( अव्यभिचारी ) नहीं। जैसे—'चैत्रस्य गुरुकुलम्' चैत्र के गुरु का कुल इस वाक्य में 'चैत्रस्य' ( इस ) षष्ठ्यन्तपद का 'गुरुकुलम्' के गुरु शब्द के साथ अन्वय माने बिना गति ही नहीं है, इसलिये एकदेशान्वय का स्वीकार करना पड़ता है तो प्रकृत में भी उसी प्रकार एकादेशान्वय मानकर, गंभीर ऐसी जो नदी, उसका तीर-ऐसा अर्थ करने में क्या दोष है ? इसलिये ग्रन्थकार ने पूर्व समाधान की अरुचि से 'जहाँ वाक्य की लक्षणा माने बिना गति नहीं है', ऐसे वैदिक अर्थवाद-वाक्यों को दिखाया है।
अर्थवाद, विधि अथवा निषेध के साक्षात् बोधक नहीं होते, किन्तु गुणवाद और अनुवाद रूप से वे अपने अर्थ को बताते हैं। परन्तु वह अर्थ सदैव उत्पन्न ही हो सो बात नहीं है। इसलिए अर्थवाद-वाक्यों में साक्षात् विधिनिषेधबोधकत्व का संभव नहीं होता। इस कारण अर्थवाद-वाक्यों के मुख्यार्थ को भी सदैव स्वीकार नहीं किया जाता। अतः लक्षणा के द्वारा विधि के प्राशस्त्यादि का ज्ञान करा देना ही अर्थवादवाक्यों का अर्थ माना जाता है।
वेद में 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता'—वायु अतिवेगवती देवता है—इत्यादि स्तुतिपरक अर्थवाद-वाक्यों की वायव्यपशुयागरूप विधि की स्तुति में लक्षणा माननी चाहिये। इसी प्रकार 'सोऽरोदीत् यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्' इत्यादि निन्दापरक अर्थवादवाक्यों की 'बर्हिर्याग में रजतदान नहीं करना चाहिये' इस विवक्षित निषेध के लिए 'जो बर्हिर्याग में रजतदान करता है वह रोता है' इस प्रकार निन्दा के अर्थ में लक्षणा है, यह स्वीकार करना ही होगा। यहाँ किसी एक पद की लक्षणा है—ऐसा नहीं कह सकते।
शंका—इस उदाहरण में भी प्राशस्त्यादि अर्थों में पदों की ही लक्षणा मान ली जाय। समस्त वाक्य की यह लक्षणा है—यह आग्रह क्यों ?
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