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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 482 में से

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२३८ वेदान्तपरिभाषा [ लक्षणाया वाक्यवृत्तित्वमपि

लक्षणा च न पदमात्रवृत्तिः, किन्तु वाक्यवृत्तिरपि । यथा गम्भीरायां नद्यां घोष इत्यत्र गम्भीरायां नद्यामिति पदद्वयसमुदायस्य तीरे लक्षणा ।

अर्थ—लक्षणा केवल पदमात्रवृत्ति नहीं है किन्तु वाक्यवृत्ति भी है । जैसे—'गम्भीरायां नद्यां घोषः' गहरी नदी पर ग्वाले का घर है । इस वाक्य में गंभीर और नदी दो पदों के समूह की तीर अर्थ में लक्षणा है ।

विवरण—नैयायिक अनुमान¹ करते हैं कि—'लक्षणा, पदमात्रवृत्ति है, क्योंकि उसमें वृत्तित्व है, शक्ति के समान ।' परन्तु उनका यह अनुमान ठीक नहीं है । क्योंकि 'गम्भीरायां नद्यां घोषः' वाक्य में पदमात्रवृत्तित्व का व्यभिचार होता है । इस वाक्य में गंभीर विशेषण से विशिष्ट नदी पद की ही तीररूप अर्थ में लक्षणा की जाती है । इस कारण यहाँ लक्षणा में पदमात्रवृत्तित्व का संभव नहीं हो पाता ।

इसके अतिरिक्त इस अनुमान में 'वृत्तित्व' हेतु सोपाधिक² है, क्योंकि यहाँ 'शक्तित्व' उपाधि है । तथाहि—जहाँ 'पदमात्रवृत्तित्व' रूप साध्य होता है वहाँ ( घट पट आदि स्थलों में ) शक्तित्व भी रहता है । इस कारण 'शक्तित्व' साध्यव्यापक हुआ । और जहाँ 'वृत्तित्व' रूप हेतु हो वहाँ 'शक्तित्व' के रहने का कोई नियम नहीं है जैसे—गंभीर और नदी दोनों पदों में लक्षणावृत्ति है किन्तु 'शक्तित्व' नहीं है, इस कारण 'शक्तित्व' साधनाव्यापक हुआ । अतः यह अनुमान सोपाधिकत्वरूप दोष से दूषित है ।

गम्भीरायां नद्यां घोषः । वाक्य में नदी में 'गंभीर' विशेषण दिया है । परन्तु गंभीर जल पर घर का होना असंभव है । और यह व्यक्ति तो ऐसा बता रहा है, अतः इन दो पदों के उच्चारण से नदी शब्द का तीररूप अर्थ ही इस व्यक्ति को विवक्षित होगा, यह प्रतीति होती है, इस कारण यहाँ पर दोनों पदों की तीररूप अर्थ में लक्षणा है—यह मानना होगा । क्योंकि केवल 'नदी' पद की 'तीर' रूप अर्थ में यदि लक्षणा मान लें तो 'गंभीर तीर पर घोष है' यह अर्थ होने लगेगा । परन्तु तीर में 'गंभीर' विशेषण नहीं दिया जा सकता । क्योंकि तीर गंभीर नहीं होता । यदि 'गंभीर' पद की ही तीर अर्थ में लक्षणा मानें तो वह भी नहीं हो सकता, क्योंकि 'गंभीर' और 'तीर' में अभेद का होना संभव ही नहीं, इसी तरह 'तीर' और 'नदी' का भी अभेदान्वय कभी नहीं बन सकता । इसी प्रकार इन दो पदों में से किसी एक पद की तीररूप अर्थ में लक्षणा कर समीप के पद को उस तात्पर्य का केवल ज्ञापक मान लेने पर भी गंभीर और नदी दो पदों की


१. 'लक्षणा पदमात्रवृत्तिः वृत्तित्वात् शक्तिवत् ।'
२. उक्तानुमाने 'शक्तित्वम्' उपाधिः । यथा—दृष्टान्ते शक्तौ पदमात्रवृत्तित्वरूपं साध्यमस्ति, शक्तित्वमपि अस्ति, अतः साध्यव्यापकत्वम्, साधनं वृत्तित्वं लक्षणायामपि, तत्र शक्तित्वं नास्ति इति साधनाव्यापकत्वमपि ।