वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३२ वेदान्तपरिभाषा [ सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम्
शंका—ऐसा मानने पर 'घट नित्य है' इस वाक्य में घटरूप विशेष्यांश का नित्यत्व के साथ अन्वय जब बाधित होता है तब उसका घटत्व रूप विशेषणांश में पर्यवसान भी मुख्यवृत्ति से ही होने लगेगा, जिससे 'यह बोध लक्षणा से ही होता है' इस प्रमाणिक व्यवहार का बाध होगा—इस शंका के समाधानार्थ ग्रन्थकार कहते हैं—
यत्र पदार्थैकदेशस्य विशेषणतयोपस्थितिः, तत्रैव स्वातन्त्र्येणोपस्थितये लक्षणाऽभ्युपगमः। यथा घटो नित्य इत्यत्र घटपदाद्घटत्वस्य शक्त्या स्वातन्त्र्येणानुपस्थित्या तादृशोपस्थित्यर्थं घटपदस्य घटत्वे लक्षणा।
अर्थ—जिस वाक्य में पदार्थ के एकदेश की (एक अंश की) विशेषण रूप से उपस्थिति हो वहीं पर उसकी (केवल विशेषण की) स्वतंत्रताया उपस्थिति होने के लिये लक्षणा का अभ्युपगम (स्वीकार) करना पड़ता है। जैसे—'घट नित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद से शक्तिवृत्ति के द्वारा केवल घटत्व की स्वतंत्रताया उपस्थिति (ज्ञान) नहीं होती, इसलिये वैसी (विशेषण रूप घटत्व की) उपस्थिति होने के लिये घट पद की घटत्वरूप अर्थ में लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है।
विवरण—शक्ति प्रधानतया विशेष्य में रहती है, इसलिये उसका (विशेष्य का) स्वतंत्रताया (केवल व्यक्ति के रूप से) होने वाला बोध, शक्तिवृत्ति से ही हो सकता है, इसलिये वहाँ लक्षणा की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु विशेषण में गौणता रहती है, इसलिये जिस वाक्य में स्वतंत्रताया (विशेष्य की अपेक्षा न करते हुए) केवल गुणभूत विशेषण से ही पदार्थ का अन्वय होना होता है, उस वाक्य में उस विशेषण रूप अंश की ही उपस्थिति के लिये लक्षणा अवश्य स्वीकार करनी चाहिये। जैसे 'घट नित्य है' कहने पर घट पद से विशेषण और विशेष्य (घटत्व और घटत्वावच्छिन्न घट व्यक्ति) के साथ परस्पर संबद्ध दोनों अर्थों की उपस्थिति का संभव होने पर भी घटव्यक्ति रूप विशेष्यांश से नित्यत्व का अन्वय हो नहीं सकता। क्योंकि घटव्यक्ति के नित्य न होने से विशेष्यरूप अंशके साथ नित्यत्व का अन्वय-बोध न होकर केवल विशेषणीभूत घटत्व रूप एकदेश के ही साथ नित्यत्व अन्वित होता है, इस प्रकार की उपस्थिति के लिये घट पद की घटत्वरूप अर्थ में लक्षणा ही माननी पड़ती है। क्योंकि पदार्थ, पदार्थ के साथ ही अन्वित होता है। 'पदजन्य पदार्थ की प्रतीति में शक्तिवृत्ति के द्वारा विशेष्य-भूत अंश के ही साथ पदार्थ का अन्वय होता है, उसके एकदेश के साथ पदार्थ अन्वित नहीं होता' यह नियम होने से 'घट' पद से विशेष्य-निरपेक्ष 'घटत्व' इस विशेषणरूप अंश की उपस्थिति लक्षण के बिना नहीं हो पाती। अतः ऐसे स्थल पर लक्षणा माननी ही पड़ती है।
इस प्रकार विशिष्टवाचक पद से केवल विशेष्य की उपस्थिति होने के लिए लक्षणा को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहाँ तो केवल विशेषण की उपस्थिति