वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्यलक्षणाखण्डनम् ] आगमपरिच्छेदः २३३
के लिये लक्षणा माननी पड़ती है यह नियम बताया गया । अब उसी नियम को प्रकृत 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में लगाकर वहाँ भी लक्षणा के बिना ही अखण्डार्थ की उपपत्ति को बताते हैं—
एवमेव तत्त्वमसीत्यादिवाक्येऽपि न लक्षणा । शक्त्या स्वातन्त्र्ये- णोपस्थितयोस्तत्त्वम्पदार्थयोरभेदान्वये बाधकाभावात् । अन्यथा गेहे घटो, घटे रूपं, घटमानयेत्यादौ घटत्वगेहत्वादेरभिमतान्वयबोधायोग्य- तया तत्रापि घटादिपदानां विशेष्यमात्रपरत्वं लक्षणयैव स्यात् । तस्मात्तत्त्वमसीत्यादिवाक्येषु आचार्याणां लक्षणोक्तिरभ्युपगमवादेन बोध्या ।
**अर्थ—**इसी न्याय के अनुसार 'तत्त्वमसि' इत्यादि प्रकृत वाक्यों में भी लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि शक्तिवृत्ति के द्वारा, स्वतंत्रतया ( सर्वज्ञत्वादि विशेषणों की अपेक्षा न करते हुए केवल विशेष्यरूप से ) चैतन्यरूप से उपस्थित होने वाले 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों का अभेद से अन्वय होने में कोई भी बाधक नहीं है । अन्यथा ( ऐसे स्थल पर यदि लक्षणा को न माने ) 'घर में घट है' 'घट में रूप है' 'घट लाओ' आदि वाक्यों में भी घटत्व, गेहत्व आदि धर्मों में गृहादि पदार्थरूप अंशों में अभिमत अन्वय-बोध करा देने की योग्यता न होने से वहाँ पर भी घटादिपदों का केवल विशेष्यपरत्व लक्षणा से ही होने लगेगा । तस्मात् पूर्वाचार्यों ने 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में जहदजहल्लक्षणा का अभ्युपगमवाद से स्वीकार किया है, ऐसा समझना चाहिये ।
**विवरण—**उपर्युक्त नियम मानने पर विशिष्टवाचक पदों से केवल विशेष्य का ज्ञान होने के लिये लक्षणा का स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं, यह सिद्ध होता है । इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि अभेदार्थक वाक्यों में भी लक्षणारूप गौण वृत्ति को नहीं मानना पड़ता । क्योंकि 'तत्' पद से सर्वज्ञत्वविशिष्ट चैतन्य और 'त्वम्' पद से अल्पज्ञत्व विशिष्ट चैतन्यरूप विशिष्ट अर्थों के उपस्थित होने पर भी तथा उनका भेदान्वय बाधित होने पर भी वे पद जहदजहल्लक्षणा के द्वारा शुद्ध ( सर्वज्ञत्वादिविशेषरहित ) चैतन्य के बोधक होते हैं' यह आप का मन्तव्य ( केवल विशेष्यमात्र की उपस्थिति ) तो ऊपर बताये नियम से ही हो सकता है । तब लक्षणारूप गौण वृत्ति को मानने की आवश्यकता नहीं होती ।
**शंका—**घट आदि पद स्वाभाविक रूप से ही घटत्वादि विशेषण और घटादि विशेष्य दोनों के बोधक होते हैं अर्थात् उनकी शक्ति उन दोनों में होती है, इसलिये जहाँ पर उनमें से एक ही की उपस्थिति होती हो वहाँ वह एकदेश, उन पदों का वाच्यार्थ है, यह नहीं कहा जा सकता । इसलिये 'घट नित्य है' इत्यादि वाक्यों में केवल विशेषण का