भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 292

२३४ वेदान्तपरिभाषा [ महावाक्यलक्षणाखण्डनम्

ज्ञान होने के लिये आप को वहाँ पर जैसी लक्षणा माननी पड़ती है, वैसे ही 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में भी उसे मानना पड़ता है, तब यहाँ लक्षणा की आवश्यकता नहीं है' यह आप कैसे कहते हैं ?

समा०—ग्रन्थकार ने इस शंका का निराकरण 'अन्यथा०' इत्यादि वाक्य से किया है। विशेषण के समान केवल विशेष्य का बोध भी लक्षणा से ही होता है, ऐसा मानने पर 'घर में घट है' इस वाक्य में गृहत्वविशिष्ट गृह इस प्रकार के विशिष्टार्थ-बोधक 'गृह' पद से केवल 'गृह' रूप विशेष्यांश का बोध होने के लिये ऐसे वाक्य में भी लक्षणा का स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि यहाँ पर भी वाच्यैकदेशभूत घटत्वरूप अर्थ के साथ 'गृह' पदार्थ का आधेयता-सम्बन्ध से अन्वय का होना असंभव है। क्योंकि गृह में घटत्व नहीं रहता। उसी प्रकार घट गृह में रहता है, वह गृहत्व जाति में नहीं रह सकता। वैसे ही घट में रूप है' इस वाक्य का घटत्वविशिष्ट घट में अर्थात् घटत्व और घट इन दोनों में रूप है—यह अर्थ उपपन्न नहीं होता, क्योंकि रूप घट में रहता है, उसका घटत्व-जाति में होना संभव नहीं। इसलिये घटत्व का रूप के साथ आधेयता-सम्बन्ध से अभिलषित अन्वय हो नहीं सकता। इसलिये इस वाक्य से 'घट में रूप है' इत्याकारक जो बोध होता है वह भी लक्षणा से ही होता है—कहना पड़ेगा। इसी प्रकार 'गाय को लाओ' इस वाक्य में 'गो' इस विशिष्ट पद की भी केवल 'गो' इस अर्थ में लक्षणा मानकर ही विशेष्य का आनयन ( लाना ) क्रिया में अन्वय होता है—कहना होगा, क्योंकि वहाँ भी वाच्यैकदेशरूप ( विशेषणरूप ) अमूर्त गोत्व का आनयन क्रिया में कर्मत्वरूप से अन्वित होना संभव नहीं है।

इस पर—'गेहे घट:' आदि वाक्यों में हम लक्षणा मानते हैं उसमें क्या बाधक है—यदि कहें तो यह उचित न होगा। क्योंकि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' प्राधान्य से सब व्यवहार हुआ करते हैं, इस नियम के अनुसार उस वाक्य के वाच्यार्थ का प्रधानभूत एकदेशरूप विशेष्य की उपस्थिति होने पर वह अर्थ शक्य ( वाच्य ) है, यही मानना उचित है। वाक्य में विशेषण की प्रधानता न होने से विशेष्यरहित विशेषण का ज्ञान लक्षणा के बिना हो नहीं सकता। इसलिये केवल विशेषणरूप अंश में लक्षणा को अवश्य मानना पड़ता है। क्योंकि 'घट पद का घटत्व वाच्य है' ऐसा प्राधान्य से व्यवहार नहीं होता, इसलिये 'पदार्थ: पदार्थेनान्वेति न तु तदेकदेशेन' यह नियम भी विशेषण-विषयक ही है, ऐसा समझना चाहिये, अर्थात् विशेषण के साथ पदार्थ का अन्वय न होकर विशेष्य के ही साथ होता है, यह उस नियम का अर्थ समझना चाहिये।

शंका—परन्तु ऐसा कहने पर वाक्यवृत्ति, पंचदशी आदि पूर्वाचार्यकृत वेदान्त-ग्रन्थों के साथ विरोध होता है, क्योंकि 'तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में भागलक्षणारूप लक्षणा माननी पड़ती है, इस कहने से विरोध होता है, उसका परिहार किस प्रकार से होगा ?