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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 482 में से

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जहदजहल्लक्षणाया उदाहरणम् ] आगमपरिच्छेदः १३५

समाधान—श्रीमदाचार्य ने तथा विद्यारण्य आदिकों ने 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में जो भागलक्षणा मानी है, वह पूर्वपरम्परा का अनुसरण कर मानी है । वस्तुतः उन्हें भी वैसी लक्षणा मानने की आवश्यकता नहीं थी ।

इस पर यदि कोई ऐसा कहें कि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य में अभेदान्वय की उपपत्ति लगाने के लिये ही यह तीसरा प्रकार अर्थात् 'जहदजहल्लक्षणा' माना गया है । यदि आप के कथनानुसार इस वाक्य में भी उसका उपयोग न हो तो 'लक्षणा त्रिविधा' इस प्रकार लक्षणा के तीन प्रकार बताने का क्या उपयोग होगा ? इस प्रश्न पर ग्रन्थकार कहते हैं-

जहदजहल्लक्षणोदाहरणं तु--काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्याद्येव । तत्र शक्यकाकपरित्यागेनाशक्यदध्युपघातकत्वपुरस्कारेण काकेऽ-काकेऽपि काकशब्दस्य प्रवृत्तेः ।

अर्थ—'कौओं से दही की रक्षा की जाय' इत्यादि वाक्य ही जहदजहल्लक्षणा के उदाहरण हैं । क्योंकि ऐसे वाक्यों में 'काक' शब्द के वाच्यार्थ (काकत्वविशिष्टकाक) का परित्याग कर और अशक्यार्थ (अवाच्य लक्ष्यार्थ-दध्युपघातकत्व) का पुरस्कार कर 'काक' शब्द की काक तथा अकाक (काकभिन्न अर्थात् दधि को दूषित करने वाले मार्जारादि प्राणी) अर्थ में प्रवृत्ति है । (इसलिये यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है।)

विवरण—'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है । मूल-ग्रन्थस्थ 'इत्यादि' शब्द से 'छत्रिणो यान्ति' इत्यादि उदाहरणों को समझना चाहिये । इस कारण 'लक्षणा त्रिविधा' इस वाक्य के साथ कोई विरोध नहीं हो पाता ।

जब कि घर के बड़े लोग बच्चों से कहते हैं कि 'दही की ओर देखना, कौए उसे दूषित न करने पायें' तब केवल कौए दही को दूषित न करें, बिल्ली, कुत्ते आदि उसे दूषित करें' यह उस वाक्य का आशय नहीं होता, अपितु सभी से उसका (दही का) रक्षण करना ही उस वाक्य का तात्पर्य-विषयभूत अर्थ होता है । इसलिये उस वाक्य का अर्थ श्रोता बालक यह समझता है कि मुझे सभी-दध्युपघातक प्राणियों से दही की रक्षा करने की आज्ञा हुई है । इस प्रकार की प्रतीति उसे काक शब्द की दध्युपघातक प्राणियों में लक्षणा मानने से ही होती है । यहाँ दधिरक्षण रूप तात्पर्यार्थ की केवल वाच्यार्थ से अनुपपत्ति होने पर लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है, अतः यही जहदजहल्लक्षणा है ।

शंका—उपर्युक्त वाक्य में लक्षणा का स्वीकार आवश्यक होने पर भी 'विरुद्ध विशेष अंशों का त्याग कर अविरुद्ध विशेष अंशों का स्वीकार करना' रूप जहदजहल्लक्षणा का लक्षण प्रकृत स्थल में संभव नहीं होता, क्योंकि उसमें 'काक' पद के वाच्यार्थ का त्याग नहीं होता है । इसलिये इसे (काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्) जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण कैसे कहा जा सकता है ।

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