वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्षणायां बीजम् |
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समाधान—प्राचीन साम्प्रदायिकों ने 'विरुद्धांश-त्यागपूर्वक अविरुद्ध अंश-विशेष का स्वीकार करना' यह लक्षण जहदजहल्लक्षणा का किया है। परन्तु धर्मराजाध्वरीन्द्र आदि नवीन वेदान्तियों ने उसे स्वीकार नहीं किया। नवीनों का कहना है कि शक्य और अशक्य अर्थ का सामान्यतया बोध करा देने वाली जो लक्षणा हो वही जहदजहल्लक्षणा है।
प्रकृत उदाहरण में इस लक्षण का समन्वय होता है। क्योंकि यहाँ पर 'काक' शब्द काकत्वरूप वाच्यार्थ का त्याग कर अशक्य (वाच्यार्थभिन्न) 'दध्युपघातकत्व' धर्म का पुरस्कार करता है और मार्जार, श्वान आदि लक्ष्यार्थों के साथ वाच्यरूप 'काक' का भी उसी धर्म से (दध्युपघातकत्वरूप से) बोध कर देता है। इस रीति से यह वाक्य (काक) और अशक्य (मार्जार आदि) का बोधक होने से जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण हो सकता है इसी प्रकार 'छत्रिणो गच्छन्ति' छाते वाले लोग जा रहे हैं—आदि वाक्य भी इसी लक्षणा के उदाहरण बन सकते हैं। इस वाक्य में भी 'एकसार्थवाहित्व'—एक समूह का घटक होना—सम्बन्ध से 'छत्रिन्' पद शक्य (छत्रवान् लोग) और अशक्य (छत्ररहित लोग) दोनों का ही बोधक है।
इस प्रकार लक्षणा का स्वरूप बताकर अब उसका बीज बताते हैं—
लक्षणाबीजं तु तात्पर्यानुपपत्तिरेव न त्वन्वयानुपपत्तिः, काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्रान्वयानुपपत्तेरभावात्। गङ्गायां घोष इत्यादौ तात्पर्यानुपपत्तेरपि सम्भवात्।
**अर्थ—**परन्तु तात्पर्य की अनुपपत्ति ही लक्षणा में बीज है। अन्वय की अनुपपत्ति, लक्षणा में बीज नहीं है। क्योंकि 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' वाक्य में अन्वय की अनुपपत्ति नहीं है। (वाक्य के पदों का परस्पर अन्वय लग सकता है) उसी प्रकार 'गङ्गायां घोषः' आदि वाक्यों में तात्पर्य की अनुपपत्ति का भी सम्भव होता है। (इसलिये एकमात्र तात्पर्यानुपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानने में लाघव है)
विवरण—'तत्त्वमसि' आदि अभेदबोधक वाक्यों में गौणी लक्षणा (गौण लक्षणा-वृत्ति) मानने की आवश्यकता नहीं है, यह ऊपर बताया गया है। इसी पर यदि कोई कह दे कि 'जिस प्रकार 'शक्ति' शब्द की एक वृत्ति है--उसी प्रकार 'लक्षणा' भी शब्द की एक वृत्ति है। इस कारण शक्ति से जैसे शक्यार्थ का ज्ञान होता है वैसे ही लक्षणा से शक्यसम्बद्ध लक्ष्यार्थ का भी ज्ञान होता है, तब उसमें गौणत्व कैसा ?
इस शङ्का के निरसनार्थ यहाँ पर लक्षणा का बीज बताया गया है। शब्द से लक्षणा के द्वारा लक्ष्यार्थ का ज्ञान होने में जो कारण हो उसे लक्षणा का बीज कहते हैं। शब्द के प्रसिद्ध अर्थ को शक्यार्थ या वाच्यार्थ कहते हैं, जहाँ पर वाच्यार्थ की उपपत्ति नहीं लगती वहाँ अगत्या लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है। इसलिये उसे मुख्य शक्ति की