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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 482 में से

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प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२७

उदाहरण यहाँ ग्रन्थकार ने दिया है। दूसरा यह भी कारण है कि 'गंगायां घोषः' में केवल 'तीरत्व' धर्म से तीररूप लक्ष्यार्थ का बोध नहीं होता। ऐसा न मानने पर अन्य नदी के तीर में भी तीरत्व होने से उस तीर का भी 'गंगा' पद से बोध होने लगेगा। इसलिये 'गंगातीरत्व' धर्म से ही तीर का बोध मानना चाहिये। और ऐसा मानने पर गंगा पद के वाच्यार्थ का भी तीररूप लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव हो जाने से 'नीलो घटः' वाक्य के 'नील' पद के समान इसे भी कोई अजहल्लक्षणा कह देगा। इसलिये ऐसे विवादास्पद स्थल का उदाहरण न देकर ग्रंथकार ने 'विषं भुङ्क्ष्व' इस 'निःसंदिग्धवाक्य को ही उदाहरण के रूप में रखा है। जब कोई व्यक्ति अपने परमप्रिय मित्र से कहे कि 'विषं भुङ्क्ष्व'--विष खाओ, तब 'प्रिय मित्र हालाहल विष खाकर प्राण दे दे' ऐसा उद्देश्य तो कहने वाले का हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमप्रिय है। इसलिये इस वाच्यार्थ के स्वीकार करने पर तात्पर्य की अनुपपत्ति होती है। इस कारण उस समय श्रोता उस वाक्य का अर्थ इस प्रकार ही समझता है जब कि देवदत्त मेरा शत्रु है और वह भोजन के लिये बुला रहा है और यह यज्ञदत्त मेरा परमप्रिय मित्र होता हुआ मुझे 'विष खाओ' कह रहा है। ऐसी स्थिति में 'विष क्यों नहीं खाते' यही उसके कहने का उद्देश्य है। अतः अपने शत्रु देवदत्त के घर भोजनार्थ नहीं जाना चाहिये, वहाँ भोजनार्थ जाने पर अवश्य ही कोई संकट उपस्थित होगा। ऐसा समझकर ही यह सुनने वाला व्यक्ति उस वाक्य का अर्थ यही समझता है कि शत्रु के घर भोजन नहीं करना चाहिये।

इस स्थल में 'विषं भुङ्क्ष्व' इस समस्त वाक्य की 'शत्रुगृहे भोजननिवृत्तिः' रूप अर्थ में लक्षणा है। किन्तु इस लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ का यत्किंचित् भी भान अथवा अन्तर्भाव नहीं है। इसलिये यह शुद्ध-जहल्लक्षणा है। इसमें किसी का भी वैमत्य नहीं है।

प्रश्न—यहाँ शक्य सम्बन्ध कौन-सा है ? और यदि वह न हो तो लक्षण के न घट सकने से इसे लक्षणा ही नहीं कह सकते।

उत्तर—'विषं भुङ्क्ष्व' में विष शब्द मुख्य वृत्ति से (अभिधा शक्ति से) विषबोधक न होकर अपकारकत्वरूप शक्यसम्बन्ध से (लक्षणा से) 'शत्रु का अन्न' ही विष शब्द का अर्थ है। इसी प्रकार 'भुङ्क्ष्व' में भुज् धातु अपनी शक्तिवृत्ति से भोजनरूप अर्थ में न होकर वह वैपरीत्य अथवा लक्षणावृत्ति सम्बन्ध से भोजननिवृत्ति का बोधक है। अर्थात् यहाँ पर 'अपकारकत्व' और 'वैपरीत्य' साक्षात् शक्य सम्बन्ध है। इस कारण प्रकृति में लक्षणा का लक्षण अच्छी तरह से घटित हो जाता है। वाक्यार्थ में शब्द की शक्ति होने पर भी शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा का सम्भव ग्रन्थकार आगे बताने वाले हैं :

इस रीति से शत्रु-अन्न के भोजन की निवृत्तिरूप लक्ष्यार्थ में हालाहलादिरूप वाच्यार्थ का यत्किंचित् भी ज्ञान नहीं होता। इसलिए यह जहल्लक्षणा है।

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