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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 482 में से

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पृष्ठ 284
२२६वेदान्तपरिभाषा[ प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविध।

जहदजहल्लक्षणा चेति। तत्र¹ शक्यमनन्तर्भाव्य यत्रार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र² जहल्लक्षणा, यथा³ विषं भुङ्क्ष्वेति। अत्र⁴ स्वार्थं विहाय शत्रुगृहे भोजननिवृत्तिर्लक्ष्यते⁵।

अर्थ— अन्य प्रकार से यह लक्षणा—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा—त्रिविध है। उनमें से जिस लक्षणा में वाच्यार्थ का अन्तर्भाव लक्ष्यार्थ में न होकर अन्यार्थ (शक्यभिन्न अर्थ) की प्रतीति होती है (शक्यार्थ भासित न होकर केवल लक्ष्यार्थ भासित होता है) उसे जहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे—'विष खा' इस वाक्यगत पदों से विषभक्षण रूप वाच्यार्थ का ज्ञान न होकर 'शत्रु के घर मत जाओ' इस लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है, अतः यह जहल्लक्षणा है।

विवरण— १—लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ का यत्किञ्चित् भी अन्तर्भाव न होना अर्थात् वाच्यार्थ का सर्वथैव त्याग कर केवल लक्ष्यार्थ का स्वीकार करना, २—लक्ष्यार्थ के साथ वाच्यार्थ की भी प्रतीति होना अर्थात् वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग न कर उसका भी लक्ष्यार्थ में स्वीकार करना, ३—शक्यार्थ का कुछ विरुद्ध भाग त्याग कर केवल उसके अविरुद्ध भाग (अंश) का स्वीकार करना, इन तीन कारणों से लक्षण के जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा नामक तीन भेद होते हैं। लक्षणा के ये तीनों नाम अन्वर्थक हैं। 'ओहाक्—' त्यागे = त्याग करना, धातु से सर्वथा त्याग, अंशतः त्याग और विरुद्धांश का त्याग (अविरुद्ध का त्याग न करना) आदि अर्थों को लेकर लक्षणा के उपर्युक्त नाम रूढ़ हुए हैं। 'तत्र शक्य' इत्यादि ग्रन्थ से जहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण बताया गया है। शक्यार्थ का लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव न होकर केवल लक्ष्यार्थ की ही प्रतीति जहाँ होती है वहाँ वाच्यार्थ का सर्वथैव त्याग कर्तव्य होने से उस लक्षणा को जहल्लक्षणा कहते हैं। इसका प्रसिद्ध उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है। यहाँ 'गंगा' पद के प्रवाह रूप वाच्यार्थ का सर्वथा परित्याग कर अर्थात् लक्षणा के द्वारा बोध्य अर्थ से वाच्यार्थ को पृथक् कर केवल तत्संबंधी तीररूप लक्ष्यार्थ का ही ग्रहण किया जाता है। इसलिये गंगा पद जहल्लक्षणा का उदाहरण है। सभी लोगों के द्वारा जहल्लक्षणा के उदाहरण रूप में दिखाये गये 'गङ्गायां घोषः' से अतिरिक्त


१. 'तत्र'—इति पाठो नास्ति क्वचित्।
२. 'रस्य'—इति पाठान्तरम्।
३. 'विषं भुङ्क्ष्व' अत्र वाक्यलक्षणैव। पदलक्षणापरं केषाञ्चिद्व्याख्यानमनुचितमेव-तात्पर्यस्य प्रत्येकपदाऽज्ञाप्यत्वात्। तथा चोक्तमद्वैतसिद्धेरखण्डार्थत्वोपपत्तौ—"तथा च समुदाय एव लक्षणा, न प्रत्येकपदे, प्रत्येकं तात्पर्यज्ञापकत्वाऽभावात्।"
४. 'त्रहि०'—इति पाठान्तरम्।
५. 'लक्षिता' इति पाठान्तरम्।