वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्षितलक्षणाया गौण्यन्तर्भावः
है, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु 'गंगायां घोषः' यहाँ पर जैसे प्रवाहरूप शक्यार्थ का तीररूप लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् संयोग संबन्ध है, वैसे द्विरेफ पद का जो 'दो रेफरूप' वाच्यार्थ उसका भ्रमर या मधुकररूप अर्थ से साक्षात् कोई भी सम्बन्ध नहीं है, किन्तु द्विरेफ पद से लक्षित भ्रमर-पद के द्वारा 'दो रेफों का भ्रमर' अर्थ से संबन्ध होता है, इस कारण यह शक्य-परम्परासम्बन्धरूप लक्षितलक्षणा है। यहाँ पर शक्ययुक्त-भ्रमरपद-प्रतिपाद्यत्व ( वाच्यरूप रेफद्वयों से युक्त भ्रमरपद से प्रतिपाद्य = वाच्य ) ही 'द्विरेफ' पद का मधुकररूप अर्थ के साथ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में भ्रमर पद घटक ( अवयव ) है। इसलिये यह सम्बन्ध भ्रमरपद से घटित कहा जाता है। यहाँ पर दो लक्षणाएँ करनी होती हैं। उनमें 'द्विरेफ' पद की रेफद्वययुक्त भ्रमरपद में जो लक्षणा की जाती है उसे केवल लक्षणा कहते हैं। कारण यह है कि शक्य ( वाच्य ) रेफद्वय का रेफद्वययुक्त भ्रमरपद के साथ अवयवावयविभावरूप साक्षात् सम्बन्ध है और मधुकररूप अर्थ का उसके साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं है किन्तु भ्रमरपद के साथ वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध है। अर्थात् यहाँ शक्य के साथ सम्बन्ध न होकर लक्षित के साथ लक्ष्य का सम्बन्ध है। इस कारण शक्य के साथ लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध करना यदि अपेक्षित हो तो वह लक्षित के द्वारा ही होगा। इसलिये वहाँ संभवनीय परंपरासम्बन्ध अर्थात् स्वलक्ष्यपदवाच्यत्व ( स्व = रेफद्वय ) लक्ष्य भ्रमरपद का वाच्यत्व मधुकर अर्थ में है। यहाँ पर वाच्यार्थ का सम्बन्ध न होकर वाच्यार्थ से लक्षित 'भ्रमरपद' का 'मधुकररूप' लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध होने के कारण इस लक्षणा को 'लक्षितलक्षणा' यह अन्वर्थ संज्ञा दी गई है।
कुछ लोग शब्द की शक्ति, लक्षणा और गौणी रूप तीन वृत्तियों को मानकर शक्य लक्ष्य और गौण रूप से पदार्थ को भी त्रिविध बताते हैं। परन्तु उसका निराकरण 'पदार्थश्च द्विविधः' कहकर कर दिया गया है। उसी का विवरण करने के लिये गौणी वृत्ति का लक्षितलक्षणा वृत्ति में ही अन्तर्भाव होने से उस वृत्ति से युक्त गौण पदार्थ को पृथक्रूप से स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। इसी बात को बताते हैं-
गौण्यपि लक्षित-लक्षणैव । यथा सिंहो माणवक इति अत्र सिंह-शब्द-वाच्य-सम्बन्धि-क्रौर्य्यादि-सम्बन्धेन माणवकस्य प्रतीतिः¹ ।
अर्थ—गौणी भी लक्षितलक्षणा ही है। जैसे--'यह बटु सिंह है' इस वाक्य में 'सिंह' शब्द का वाच्यार्थ जो सिंह पशु उसके साथ सम्बद्ध रहने वाले क्रूरत्वादि धर्मरूप सम्बन्ध से माणवक ( बटु ) की प्रतीति होती है।
विवरण—'सिंहो माणवकः' यह बटु ( कुमार ) सिंह है, यहाँ पर 'सिंह' शब्द का 'सिंह पशु' वाच्यार्थ है। परन्तु उसके साथ 'बटु' का किसी प्रकार से सम्बन्ध नहीं है,
१. 'ते:'-इति पाठान्तरम् ।