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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२९

तत्र जहदजहल्लक्षणा¹, यथा सोऽयं देवदत्त इति । अत्र हि पदद्वय- वाच्ययोर्विशिष्टयोरैक्यानुपपत्त्या पदद्वयस्य विशेष्यमात्रपरत्वम् । यथा वा तत्त्वमसीत्यादौ तत् पद-वाच्यस्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य त्वंपद- वाच्येनान्तःकरण-विशिष्टेनैक्यायोगादैक्यसिद्धयर्थं स्वरूपे लक्षणेति साम्प्रदायिकाः ।

अर्थ— जिस वाक्य में विशिष्ट वाचक शब्द अपने विशेषणरूप एकदेश को ( एक अंश को ) छोड़कर विशेष्यरूप एक अंश का बोधक होता है, वहाँ जहदजहल्लक्षणा होती है । जैसे—'सोऽयं देवदत्तः'—वह यह देवदत्त—इस वाक्य में 'वह' पद का 'तत्कालविशिष्ट' और 'यह' पद का 'एतत्कालविशिष्ट' अर्थ है । परन्तु 'देवदत्त' परोक्ष और अपरोक्षरूप विरुद्ध उभय कालों से विशिष्ट होकर एक ही समय में स्थित नहीं हो सकता । इसलिये 'वह' और 'यह' दोनों पद केवल देवदत्त रूप विशेष्य अर्थ के ही बोधक हैं अर्थात् दोनों पद केवल विशेष्यपरक हैं । स्वार्थपरक ( वाच्यार्थपरक ) नहीं हैं । इसलिये यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है । अथवा 'तत् त्वमसि'—वह ब्रह्म तू है—आदि अभेदबोधक वाक्यों में 'तत्' पद का वाच्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट चैतन्य के साथ ऐक्य का संभव नहीं हो सकता । अतः चैतन्यों की एकता के लिये स्वरूप में ( शुद्ध चैतन्य में ) उनकी लक्षणा करनी पड़ती है ऐसा साम्प्रदायिक ( प्राचीन वेदान्ती ) कहते हैं ।

विवरण— व्यवहार में 'सोऽयं देवदत्तः' कहा जाता है । इस वाक्य का वाच्यार्थ है 'वह यह देवदत्त' । इसमें 'सः'—वह शब्द का वाच्यार्थ है 'पूर्वकाल में स्थित' अर्थात् वर्तमान में जिसका प्रत्यक्ष न हो । और 'अयम्'—यह शब्द का वाच्यार्थ है, जिसको उंगली से निर्देश कर सकें, ऐसा वर्तमान काल में स्थित व्यक्ति । तत्कालीन देवदत्त तत्काल से विशिष्ट होने से परोक्ष और एतत्कालीन देवदत्त, इस काल से युक्त होने से अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है । किन्तु एक ही देवदत्त का एक ही काल में, उस काल से और इस काल से विशिष्ट रहना सम्भव नहीं । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं । इस कारण पूर्वोक्त वाक्य से तथाकथित विरुद्ध धर्मों से युक्त देवदत्त का ऐक्य संभवनीय नहीं । किन्तु वह वाक्य ( सोऽयं देवदत्तः ) तत्कालविशिष्ट और एतत्कालविशिष्ट देवदत्त, एक ही है, भिन्न नहीं है—इस उद्देश्य से ही यह वाक्य कहा गया है । इस कारण जहाँ ऐसे विशिष्टों का ऐक्य सम्भव न हो वहाँ उनके विशेषणों का त्याग कर केवल विशेष्य ही दोनों पदों का अर्थ स्वीकृत किया जाता है । ऐसी लक्षणा को ही 'जहदजहल्लक्षणा' या 'भागत्यागलक्षणा' कहते हैं । इसमें विशेषण और


१. शक्यैकदेशमात्रवृत्तिः जहदजहल्लक्षणेत्यर्थः ।