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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

२३० वेदान्तपरिभाषा [ सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम्

विशेष्यवाचक पदों में से 'विशेषण' के भाग ( अंश ) को त्याग कर 'विशेष्य' भाग का ग्रहण किया जाता है इसलिए इस वृत्ति को भागत्याग या जहदजहल्लक्षणा कहना सर्वथा योग्य है । प्राचीन वेदान्तियों ने अभेदबोधक महावाक्यों का अर्थ लगाने के लिए इस लक्षणा को स्वीकार किया है । परन्तु वेदान्तपरिभाषाकार—श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र को यह साम्प्रदायिक मत मान्य नहीं है—यह अग्रिम ग्रन्थ से ही स्पष्ट होगा । तथापि उन्होंने सम्प्रदाय का अनुसरण कर 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों में इस लक्षणा के लक्षण को घटित कर दिखाया है । 'तत्' का अर्थ है सर्वज्ञत्वादिधर्मों से विशिष्ट ईश्वरचैतन्य, और 'त्वम्' का अर्थ है अन्तःकरणोपाधिविशिष्ट अल्पज्ञ चैतन्य । इनका अभेद ( ऐक्य ) होना सम्भव नहीं । क्योंकि मायोपाधिक जो सर्वज्ञ ईश्वर है वह अल्पज्ञ जीव कैसे हो सकेगा ? अर्थात् इस वाच्यार्थ का असंभव होने पर लक्षणा स्वीकार करनी पड़ती है । परन्तु पहले की तरह जहत् और अजहत् लक्षणाओं का लक्षण इसमें घटित न हो सकने से इस वाक्य में उनका ग्रहण नहीं किया जा सकता । क्योंकि उन शब्दों के वाच्यार्थ का त्याग पर चैतन्यरूप विशेष्यांश का भी त्याग करना पड़ता है, और उसके करने पर उस वाक्य का श्रुति को विवक्षित अभेदार्थ नहीं बन पाता और अजहल्लक्षणा के न्याय से वाच्यार्थ सर्वथा त्याग न करने पर भी विवक्षित ऐक्य का असंभव ही रहता है । अतः पूर्वोक्त दोनों लक्षणाओं से भिन्न ऐसी तीसरी जहदजहल्लक्षणा का ही स्वीकार करना पड़ता है । अर्थात् तत्पद के वाच्यार्थ में से सर्वज्ञत्वादि और त्वं पद के वाच्यार्थ में से किंचिज्ज्ञत्वादिरूप औपाधिक विशेषणों का त्याग कर केवल विशेष्यभूत चैतन्य अर्थ को ही दोनों पदों में से स्वीकार करना पड़ता है । इस कारण श्रुतिविवक्षित चैतन्याभेदरूप अर्थ सिद्ध होता है ।

इस प्रकार साम्प्रदायिक मत को बताकर अब अपने मत के अनुसार 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के अभेदार्थरूप वाक्यार्थ की उपपत्ति बताते हैं—

'वयन्तु ब्रूमः—सोऽयं देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादौ विशिष्टवाचकपदानामेकदेशपरत्वेऽपि न लक्षणा, शक्त्युपस्थितयोर्विशिष्टयोरभेदान्वयानुपपत्तौ विशेष्ययोः शक्त्युपस्थितयोरेवाभेदान्वयाऽविरोधात् ।


१. साम्प्रदायिकाः सर्वज्ञात्मपादादयो भागत्यागलक्षणामपादादयो भागत्यागलक्षणमाश्रित्य शुद्धचैतन्यस्वरूपे 'तत्-त्वम्' पदयोर्लक्षणेति वदन्ति । किन्तु ग्रन्थकारायैतन्नरोचत इति 'वयन्तु' इत्यनेन सूच्यते । यतः 'शक्त्यैव तात्पर्यविषयप्रतीत्युपपत्तौ लक्षणाश्रयणमन्याय्यम्' । तथा चोक्तमद्वैतसिद्धौ प्रत्यक्षस्य आगमबाध्यत्वप्रकरणे—"'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादिवाक्य इव शक्यैकदेशस्य अन्वयाभ्युपगमात्, विशेषणबाधेन विशेष्यमात्रान्वयस्यैव अत्र लक्षणाशब्देन व्यपदेशात्" ।