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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 482 में से

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पदशक्तिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २०९

उदा०—'घट' पद से प्रथमतः ही बड़े वर्तुल—मध्य भाग वाले, कृश कण्ठ वाले पदार्थ की उपस्थिति 'शक्ति' वृत्ति से होती है । परन्तु लक्ष्य पदार्थ के साथ पद का पहले जैसा साक्षात् सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् पद श्रवण होने के अनन्तर प्रथमतः ही लक्ष्य पदार्थ का ज्ञान नहीं होता, अपितु शक्य ( वाच्य ) पदार्थ के द्वारा, परम्परा से ( शक्य-पदार्थ-ज्ञान के व्यवधान से ) होता । इस कारण शक्ति का लक्षण लक्ष्य पदार्थ में अतिव्याप्त नहीं होता ।

प्राचीन नैयायिकों का कहना है कि 'पद' के साथ अर्थ का जो सम्बन्ध हो उसे शक्ति कहते हैं । यह शक्ति द्रव्य-गुणादि सात पदार्थों से पृथक् ( अतिरिक्त ) पदार्थ नहीं है । किन्तु 'इस पद से यह अर्थ समझना' इत्याकारक जो ईश्वरेच्छा ( आत्मगुणरूप पदार्थ ) उसी में शक्ति का अन्तर्भाव होता है । आधुनिक 'देवदत्तादि' नाम में भी शक्ति है ही । क्योंकि 'पिता ग्यारहवें दिन पुत्र का नाम रखे' ऐसी ईश्वरेच्छा वहाँ भी रहती ही है ।

और नवीन नैयायिक—"ईश्वरेच्छा को शक्तिरूप न मानकर उसे केवल इच्छारूप ही मानते हैं । इस कारण आधुनिक संकेत में शक्ति का होना सिद्ध है ।

नैयायिकों के मत का खण्डन करने के लिये ग्रन्थकार ने 'सा च शक्तिः' इत्यादि वाक्य से शक्ति को पृथक् पदार्थ सिद्ध किया है । तथाहि—प्राचीन नैयायिकों के मतानुसार शक्ति का ईश्वरेच्छारूप होना सम्बन्ध नहीं । क्योंकि मनुष्य की इच्छा से नदी-नगर आदिकों की जो संज्ञायें रूढ हुई हैं, उनमें ईश्वरेच्छा नहीं होती । अब नव्य नैयायिकों से कथनानुसार सामान्य इच्छारूप शक्ति को मानें तो वह भी संभव नहीं । क्योंकि मनुष्य पट आदि की इच्छा से घट आदि पद का उच्चारण करे तो वहाँ भी इच्छा के विद्यमान होने के कारण घट पद की पट में भी शक्ति का स्वीकार करना पड़ेगा । इसलिये इस वृत्तिरूप शक्ति को पृथक् पदार्थ के रूप में ही स्वीकार करना चाहिये । इतना ही नहीं, हम वेदान्तियों ने संसार की समस्त वस्तुओं के कारणों में विद्यमान कार्योत्पादानुकूलता ( कार्य उत्पन्न करने को योग्यता ) को ही शक्ति समझ, सामान्य शक्ति को भी अतिरिक्त पदार्थ के रूप में स्वीकृत किया है । तब पदनिष्ठ अर्थबोध रूप कार्य की जनक शक्ति हमारे मत में पृथक् पदार्थ है, यह तो अत्यन्त स्पष्ट है ।

हम लोग 'अर्थापत्ति' प्रमाण से शक्ति का पार्थक्य ( पृथक् पदार्थत्व ) सिद्ध करते हैं । तथाहि—केवल अग्नि, दाह करने में समर्थ है, किन्तु मणि के सान्निध्य से दाह नहीं होता । इस कारण मणि के सान्निध्य से दाहकारणीभूत अग्नि शक्ति नष्ट हो गई, यह कल्पना करनी पड़ती है । इसलिये यह भ्रष्ट होने वाला शक्तिरूप पदार्थ, अन्य सब पदार्थों की अपेक्षा विलक्षण ( पृथक् ) पदार्थ सिद्ध होता है । यदि यह कहें कि—प्रतिबन्धक का अभाव, कार्यमात्र के प्रति कारण होता है । यहाँ तो मणिरूप प्रतिबन्धक पदार्थ के विद्यमान होने से प्रतिबन्धकाभावरूप कारण नहीं है, इसलिये दाहरूप कार्य नहीं होता ।