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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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२०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पदार्थद्वैविध्यम् ]

**अर्थ—**और वह पदार्थ शक्य तथा लक्ष्य भेद से दो प्रकार का है ( उनमें शक्य का अर्थ है शक्ति रूप वृत्ति से युक्त और लक्ष्य का अर्थ है लक्षणा रूप वृत्ति से युक्त ) । पदों के वाच्य अर्थ में स्थित मुख्य वृत्ति को ही शक्यपद की घटक शक्ति कहते हैं । जैसे—'घट' पद की तल तथा मध्य भाग में वर्तुल आकार से युक्त वस्तु विशेष में रहने वाली वृत्ति ही शक्ति कही जाती है । वह शक्ति, पृथक् ( अतिरिक्त ) पदार्थ है । क्योंकि कारण में विद्यमान होती हुई कार्योत्पत्ति के अनुकूल ( जनक ) समस्त ( यावत् ) शक्ति को सिद्धान्त में पृथक् पदार्थ के रूप में स्वीकार किया है ।

**विवरण—**कुछ लोग शक्य, लक्ष्य और गौण भेद से तीन पदार्थ मानते हैं । किन्तु मूल में 'पदार्थ द्विविध है' कहकर उनका निराकरण किया है । गौण पदार्थ का लक्ष्य पदार्थ में ही अन्तर्भाव होता है, यह आगे चलकर ग्रन्थकार स्वयं कहेंगे । पद का अर्थ के साथ जो सम्बन्ध उसे वृत्ति कहते हैं । यह वृत्ति शक्तितथा लक्षणा भेद से द्विविध है । इनमें से 'शक्ति नामक वृत्ति से युक्त पदार्थ को शक्य या वाच्य और लक्षणा नामक वृत्ति से युक्त पदार्थ को लक्ष्य, यह शास्त्रीय संज्ञा है । इस कारण शक्य और लक्ष्य में से शक्य पदार्थ का निरूपण कर्तव्य होने पर पदार्थ को 'शक्य' संज्ञा जिस शक्ति के कारण प्राप्त होती है उस शक्ति का ही यहाँ निरूपण किया है । वृत्तिरूप सम्बन्ध साक्षात् और परम्परा भेद से दो प्रकार का है । उनमें से पद का पदार्थ के साथ मुख्य ( साक्षात् ) अर्थात् प्रथमोपस्थित जो सम्बन्ध = वृत्ति, उसे शक्ति कहते हैं—यह शक्ति का लक्षण है ।

शक्तत्वम् । स चेश्वरसंकेतो न ईश्वरसंकेतत्वेन गृह्यमाणः कारणम् । किन्तु संकेतत्वेन । अतः अविदुषामपि घटादिशब्दात् शाब्दबोधोपपत्तिः । आधुनिकसंकेतितानां चैत्रादिशब्दानां 'द्वादशेऽहनि पिता नाम कुर्यात्' इति सामान्यतः ईश्वरसंकेतितत्वमस्त्येवेति न दोष इति वदन्ति ।

तदिदं मीमांसका न सहन्ते । तेषामयमाशयः अभिधा नाम शक्तिः । सा च पदार्थान्तरम् । कारणेषु कार्यानुकूलशक्तिमात्रमतिरिक्तमङ्गीकरणीयम् । वह्निर्मणिसमवहितो दाहं न जनयति, मण्यसमवहितः उत्तेजकमण्यन्तरसमवहितो वा दाहं जनयति, इत्यत्र हि शक्तिसत्त्व-तद्विनाशौ एव नियामको सा च शक्तिः न द्रव्यं, गुणः, कर्मादिकं वा, तद्गुणराहित्यादित्यतिरिक्तः पदार्थः । एवं च शब्दनिष्ठा शक्तिरपि अतिरिक्तैव अंगीकरणीया । कस्मिन् पदे कीदृशार्थबोधनानुकूलशक्तिर्विद्यते इति नु व्यावहारादिसिद्धशक्तिविषयः पदार्थः शक्यः इति ज्ञेयम् । यदि सर्वत्रैव शक्तिः पदार्थान्तरम्, तदा किमु वक्तव्यं शक्तिविशेषस्य पदनिष्ठस्य पदार्थान्तरत्वे इति । एवं च मीमांसकसिद्धान्ते अद्वैतसिद्धान्ते च यथा कारणनिष्ठा कार्यानुकूला शक्तिः पदार्थान्तरं तथा पदनिष्ठा पदार्थोंपस्थित्यनुकूला शक्तिरपि पदार्थान्तरं, तस्या अपि कारणनिष्ठकार्यानुकूलशक्तित्वात् । कारणत्वात् पदार्थोंपस्थितेश्च कार्यत्वात् ।