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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

२०२ | वेदान्तपरिभाषा | [ योग्यतानिरूपणम्

है। इस प्रकार आकांक्षा का लक्षण बताकर अब योग्यतारूप (वाक्यार्थ ज्ञान के) कारण का निरूपण करते हैं—

योग्यता च तात्पर्यविषयीभूत-¹संसर्गाबाधः। वह्निना सिञ्चं-तीत्यादौ तादृशसंसर्गबाधान्न योग्यता। 'स प्रजापतिरात्मनोवपा-मुदखिदत्' इत्यादावपि तात्पर्य-विषयीभूत ³-पशुप्राशस्त्याबाधाद् योग्यता। तत्त्वमस्यादिवाक्येष्वपि वाच्याभेद-बाधेऽपि ⁴लक्ष्यस्वरूपा-भेदे बाधाभावाद् योग्यता।

अर्थ—'तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग का बाध न होना' ही योग्यता है। 'अग्नि से सिंचन करता है' आदि वाक्य में योग्यता नहीं है। क्योंकि उस वाक्य का अग्निकरणक आद्रीकरणरूप अर्थ प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है। 'उस प्रजापति ने अपनी वपा (पेट के भीतर की कोमल महीन वस्तु) को खींचकर निकाला और उससे अग्नि में हवन किया' आदि वाक्य का पशुप्राशस्त्य ही तात्पर्यविषयीभूत अर्थ है ओर वह किसी प्रमाण से बाधित न होने के कारण उस वाक्य में योग्यता है। उसी तरह 'वह ब्रह्म तू है' आदि वाक्य में भी योग्यता के लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि 'तत्' और 'त्वम्' इन पदों के वाच्य-अर्थ में अभेद का बाध होने पर भी लक्ष्यार्थभूत चैतन्य के अभेद रूप अर्थ का बाध नहीं होता।

विवरण—वाक्य के तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग का (कर्मत्वादि सम्बन्ध का) बाध न होना—योग्यता का लक्षण है। 'वत्सं बधान' बछड़े को बांधों, इस वाक्य में योग्यता है। क्योंकि यहाँ वत्सकर्मक बन्धन—तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग है। वह किसी प्रमाण से बाधित नहीं होता। परन्तु, यहाँ 'संसर्गाबाधः' न कहकर केवल 'तात्पर्यविषयीभूतसंसर्गः' इतना ही लक्षण यदि किया होता तो 'अग्निना सिञ्चेत्' आदि वाक्य में उसकी अतिव्याप्ति हुई होती। इस आशय से ग्रन्थकार ने 'वह्निना' इत्यादि कहा है। 'अग्नि से सिंचन करे, इस वाक्य का 'अग्नि-करणक सेचन' रूप अर्थ वक्ता के तात्पर्य का विषय है। परन्तु उस करणत्व संसर्ग का प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाध होता है। क्योंकि दाहक


१. अत्र संसर्गपदं न लक्षणघटकं तात्पर्यविषयाऽबाधस्यैव लक्षणत्वात्। तदुक्तमद्वैतसिद्धौ—'योग्यताऽपि तात्पर्यविषयाऽबाध एव" इति। अन्यथा अखण्डार्थपरे वाक्ये लक्षणस्य अव्याप्तिर्भवेत्।
२. ऽञ्चेदित्या०'—इति पाठान्तरम्।
३. तूवरपशु०'—इति पाठान्तरम्।
४. लक्ष्यस्वरूपाभेदे इति प्राचीनमतेन उक्तम्। स्वमते तत्वमसीत्यादौ लक्षणाभावस्य वक्ष्यमाणत्वात्।