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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 482 में से

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पृष्ठ 259

बलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः २०१

वाजिन में 'प्रदेयद्रव्यत्व' रूप विशेष्य तो है परन्तु 'अन्यबोधाभाव' रूप विशेषण नहीं है। कारण यह है कि याग का वाजिन के साथ अन्वय करते समय अपने साथ पढ़े गये आमिक्षा द्रव्य के साथ याग के अन्वय का ज्ञान हुआ रहता है। इसलिये विशेषण के न होने से 'विशिष्टद्रव्यत्व' वहाँ नहीं है। अर्थात् वाजिन में हमारा माना हुआ विशिष्टयोग्यतावच्छेदक न होने से वह (वाजिन) याग की जिज्ञासा के विषय होने योग्य नहीं है। इसलिये हमारे पक्ष में कोई दोष नहीं आने पाता।

इस पर यदि आप कहें कि इस प्रकार के विशिष्ट अवच्छेदक के मानने पर याग का आमिक्षा के साथ भी अन्वय न हो सकेगा। क्योंकि अमिक्षा के साथ अन्वित होते समय याग का अपने समीप में पठित वाजिन के साथ अन्वय होने का ज्ञान नहीं है, नहीं कहा जा सकता। (याग और वाजिन के अन्वय का ज्ञान तो रहता ही है) अर्थात् वाजिन के साथ उसके अन्वय का ज्ञान होते रहने से 'अन्वयबोधाभाव' रूप विशेषण वहाँ भी नहीं है, तब आपका विशिष्ट अवच्छेदक वहाँ कैसे होगा ? उसके न होने पर आमिक्षा, यागनिरूपित (याग की) जिज्ञासा का विषय भी कैसे बनेगी ? अर्थात् ऐसे अवच्छेदक के मानने पर याग की जिज्ञासा का विषय न 'वाजिन' होता है और न आमिक्षा' ही होती है। क्योंकि जैसे वाजिन से अन्वय होते समय आमिक्षान्वय उपस्थित रहता है उसी प्रकार आमिक्षा से अन्वय करते समय वाजिनान्वय भी उपस्थित रहता है।

परन्तु यह शंका ठीक नहीं है, कारण, वाजिनान्वय जैसी आमिक्षान्वय के समय स्थित नहीं है। 'आमिक्षा', श्रुतिप्रमाण से प्राप्त है, इसलिये वह वाक्य-प्रमाण से प्राप्त होने वाले वाजिन की अपेक्षा पूर्वोक्त बलाबलाधिकरण-न्याय से प्रबल है। प्रबल होने से 'आमिक्षा' का याग के साथ प्रथमतः अन्वय होता है, उस समय वाजिनान्वय की प्राप्ति भी नहीं रहती। क्योंकि वाक्य से प्राप्त 'वाजिन', प्रथम लिङ्ग की तदनन्तर श्रुति की कल्पना कर याग के साथ अन्वित होने के योग्य हो पाता है। परन्तु 'आमिक्षा' साक्षात् श्रुत होने से उसे अन्वित होने में अन्य प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रहती। इसलिये वह प्रथम क्षण में ही याग से अन्वित होती है। उस समय वाजिनान्वयबोध का अभाव रहता है। उससे (अभाव से) विशिष्ट अवच्छेदक का होना आमिक्षा में संभव है। अत एव याग को आमिक्षाविषयक जिज्ञासा होती है, और उसकी पूर्ति प्रत्यक्षश्रुत आमिक्षा से होती है। तत्पश्चात् वाजिनान्वय के समय में आमिक्षान्वयबोध के विद्यमान होने से उक्त योग्यतावच्छेदक का वाजिन होना सम्भव नहीं। इस कारण 'वाजिन से याग का अन्वय होने लगेगा' यह दोष हमारे पक्ष में नहीं होता।

इसी न्याय से जहाँ श्रुति-लिङ्गादिकों में से दो की प्राप्ति होगी वहाँ श्रुत होने से प्रबल हुए पदार्थ के साथ एक बार अन्वय होने के बाद, दुर्बल लिङ्गादिकों से प्राप्त पदार्थ के साथ याग का अन्वय नहीं होता, समझ लेना चाहिये। तस्मात् उक्त विशिष्ट-योग्यतावच्छेदक से युक्त आकांक्षा-लक्षण, जो पूर्वोत्तर-मीमांसा सम्मत है, सर्वथा समुचित

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