वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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बनने की योग्यता तो है ही। कारण यह है कि प्रकृत स्थल में याग की योग्यत्व रूप आकांक्षा का अवच्छेदक, प्रदेयद्रव्यत्व को ही मानना चाहिये। तथाहि--
याग का अर्थ है—देवता के उद्देश्य से द्रव्य का त्याग (दान)। उस त्याग (दातु) को देय पदार्थ (वस्तु) की अपेक्षा रहती है। अर्थात् 'किस वस्तु का त्याग (दान) करें, ऐसी द्रव्याकांक्षा याग को होती है, तब समीप में पठित प्रदेय-द्रव्य से वह आकांक्षा पूर्ण होती है। अतः जो द्रव्य सन्निहित होते हैं, वे 'देने के योग्य हैं' ऐसा निश्चित होते ही वे द्रव्य, याग की जिज्ञासा के विषय होते हैं। अर्थात् आमिक्षादि द्रव्यों में जिज्ञासा का विषय होने की योग्यता ही, योग्यता का अवच्छेदक धर्म है अर्थात् 'प्रदेयद्रव्यत्व' ही अवच्छेदक धर्म है, यह आपको मानना चाहिये। ऐसा मानने पर वह प्रदेय-द्रव्यत्व जैसे आमिक्षा में है वैसे ही वाजिन में भी है। क्योंकि वाजिन, आकाश जैसा अदेय (देने के अयोग्य) पदार्थ तो है नहीं। जिस प्रकार अामिक्षा प्रदेय-द्रव्य है उसी प्रकार 'वाजिन' भी है। इसलिये उस अवच्छेदक से अवच्छिन्न (युक्त) योग्यत्वरूप आकांक्षालक्षण, प्रकृत 'वाजिन' में अतिव्याप्त होता है। अतः हमारे पक्ष में जो दोष आपने दिया, वही आपके मत में भी आता है।
इस पूर्वपक्ष का 'इति चेत्' पदों से अनुवाद कर 'न' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान बताया है। उसका आशय इस प्रकार है—हम प्रदेय-द्रव्यत्व मात्र को ही यहाँ योग्यता का अवच्छेदक मानते होते तो आपके कथनानुसार वह दोष हमारे पक्ष में भी आया होता। परन्तु हम केवल प्रदेय-द्रव्यत्व को योग्यतावच्छेदक नहीं मानते और वैसा मानना उचित भी नहीं है। कारण यह है कि द्रव्य में, प्रदेयत्व धर्म के होने मात्र से ही वह द्रव्य (पदार्थ) याग की जिज्ञासा का विषय होने योग्य रहता ही है यह नियम यदि कर दिया जाय ('प्रदेयद्रव्यत्व' मात्र ही योग्यता का अवच्छेदक मानने पर) तो जिस वाक्य से एक बार शाब्दबोध हो गया है उसी से पुनः शाब्दबोध होने का प्रसंग प्राप्त होगा। अर्थात् 'वैश्वदेवी आमिक्षा' इस वाक्य से एक बार 'आमिक्षा से वैश्वदेव-याग करें' यह अर्थ प्रतीत होने पर भी आमिक्षा का प्रदेय-द्रव्यत्व रूप धर्म निवृत्त न होने से पुनः-पुनः उस वाक्य से वही अर्थ प्रतीत होने का अतिप्रसंग प्राप्त होगा। इसलिये प्रदेयद्रव्यत्वरूप धर्म को योग्यतावच्छेदक नहीं स्वीकार कर सकते। अतः हम 'प्रदेय-द्रव्यत्व में 'स्वसमानजातीय०' इत्यादि विशेषण देकर जो प्रदेयद्रव्यत्व, अपने सहित कहे गये अन्य प्रदेयद्रव्य के अन्वयबोधाभाव से युक्त होने का (जिस प्रदेय-द्रव्य का याग के साथ अन्वय होते समय यागसन्निधिपठित अन्य द्रव्य से अन्वित होने का) ज्ञान यदि न हो तो उस प्रदेय-द्रव्य में प्रदेयद्रव्यत्वरूप धर्म ही, योग्यता का अवच्छेदक होता है' ऐसा मानते हैं। यहाँ 'स्वसमानजातीयपदार्थान्वयबोधाभाव' विशेषण है और 'प्रदेयद्रव्यत्व' विशेष्य है। इस विशेषण से विशिष्ट हुए प्रदेयद्रव्यत्व को ही अवच्छेदक माना है। इस कारण उन विशेषण-विशेष्य में से एक के न होने पर भी विशिष्टाभाव सिद्ध होता है।