वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः १९९
द्रव्यानवयबोधसहकृतत्वेन तादृशावच्छेद^१काभावात् । ^२आमिक्षायां तु नैवम्, वाजिना^३ऽन्वयस्य तदाऽनुपस्थितत्वात् ।
उदाहरणात्तरेष्वपि दुर्बलत्वप्रयोजक आकाङ्क्षा-विरह एव द्रष्टव्यः ।
अर्थ—'तप्ते पयसि' इत्यादि वाक्य में भी वाजिन को—वैश्वदेव-याग की जिज्ञासा का विषयत्व न होने पर भी जिज्ञासा का विषय होने की योग्यता है ही । (वैश्वदेव याग को वाजिन की आकांक्षा होना रूप दोष आपके पक्ष में भी आता ही है) क्योंकि प्रकृत में यागनिरूपित (याग में जिज्ञासाविषयत्व होने की योग्यता का) अवच्छेदक 'प्रदेयद्रव्यत्व' (देने के योग्य द्रव्य होना) है, और वह प्रकृत वाजिन में भी है ।
परन्तु यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि हम केवल 'प्रदेयद्रव्यत्व' को ही योग्यता का अवच्छेदक नहीं मानते । किन्तु स्वसमानजातीय पदार्थ के अन्वयबोधाभाव से सहकृत (युक्त) प्रदेयद्रव्यत्व ही प्रकृत स्थल में योग्यता का अवच्छेदक है । इस कारण 'वाजिन' से अन्वय करते समय उक्त अवच्छेदक नहीं है, किन्तु 'आमिक्षा' से याग का अन्वय करते समय उक्त योग्यतावच्छेदक (प्रदेयत्व) उसमें रहता है । क्योंकि आमिक्षा से याग का अन्वय करते समय उसका वाजिन से अन्वय उपस्थित (प्राप्त) ही नहीं होता । इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी (श्रुति-लिंग आदि की युगपत्प्राप्तिरूप उदाहरणों में भी) श्रुति से अन्य लिंगादि प्रमाणों में 'पारदौर्बल्य' न्याय से आकांक्षा का अभाव रहता है, यह समझ लेना चाहिये ।
**विवरण—**शंका करने वाले का आशय यह है कि—आप 'जिज्ञासा के विषयत्व को तो आकांक्षा का लक्षण मानते नहीं, किन्तु आपके मत में 'जिज्ञासाविषयत्व-योग्यत्व' ही आकांक्षा का लक्षण है । परन्तु ऐसा मानने पर 'वाजिन का भी वैश्वदेव-याग से अन्वय होने लगेगा' इस प्रकार का दोष आपके पक्ष में भी स्थित है । क्योंकि वैश्वदेव-याग की आकांक्षा, श्रुति-प्रमाण से प्राप्त आमिक्षा से ही शान्त हो जाने के कारण उस याग की जिज्ञासा में 'वाजिन' के विषय न होने पर भी उसमें (वाजिन में) जिज्ञासा का विषय
जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकत्वाभावः, तादृशप्रदेयद्रव्यत्वस्यैव योग्यतावच्छेदकत्वात् तस्य चात्राभावात् ।
१. 'कत्वाभा'-इति पाठान्तरम् ।
२. आमिक्षायान्तु न स्वसमानजातीय-पदार्थान्वयबोधसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वमस्ति । यदा तत्र स्वसमानजातीयपदार्थान्वयबोधसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वं स्यात्, तदा तत्र स्वसमानजातीय-पदार्थान्वयबोधविरहसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वं न स्यात्, तादृशयोग्यतावच्छेदकस्य तादृशप्रदेय-द्रव्यत्वस्य अभावेन तादृशयोग्यत्वरूपाकांक्षाऽपि न स्यात्, किन्तु न तथास्ति ।
३. 'नोऽन्व'-इति पाठान्तरम् ।