भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 249

आकांक्षा लक्षणम् ] आगमपरिच्छेदः १९१

समाधान—घटादि पदार्थों में पारमार्थिक-सत्तारूप से बाधितत्व होने पर भी उनका व्यावहारिक प्रामाण्य अबाधित ही है। क्योंकि 'बाधित' शब्द से व्यवहारकालीन बाध ही विवक्षित है। इसी कारण 'नेह नानास्ति किंचन' श्रुति से स्वर्गादि-साध्य-साधन भाव का बाध होने पर भी उपर्युक्त दोष नहीं आता। इस रीति से शब्द-प्रमाण का लक्षण सिद्ध होता है। अतः 'शब्द का अनुमान में ही अन्तर्भाव होने से उसे पृथक् प्रमाण के रूप में मानने की आवश्यकता नहीं' कहने वाले वैशेषिकों का खण्डन हो जाता है। वैशेषिकों का कथन है कि—( १ ) 'वत्सं बधान' वत्स को बाँधो, आदि पद अर्थ-संसर्गज्ञानपूर्वक हैं। ( २ ) क्योंकि उनमें आकांक्षा आदिकों से युक्त पदसमूहत्व है। ( ३ ) 'दण्ड से गाय लाओ' आदि पदसमूह के समान। ऐसे अनुमान¹ से शब्द-प्रमाण गतार्थ होता है। इसलिए 'शब्द' को स्वतन्त्र प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं। दण्डादि पदों की शक्ति के अनुमान के लिए अन्य पदों का दृष्टान्त देकर उनकी शक्ति का अनुमान कर लेना चाहिये। इस पर वेदान्तादि शब्द-प्रामाण्यवादी शास्त्रकारों का कथन है कि—'ऐसे अनुमान से शब्द-प्रमाण गतार्थ होता है' कहने पर शाक्य, भिक्षु आदि के वाक्य में भी वह संसर्ग है ही, इस कारण वे भी प्रमाण होने लगेंगे। 'उनके वाक्यों में प्राप्त होना हमें इष्ट ही है' यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि श्रुति से तत्प्रतिपादित अर्थ का बाध होने से 'शाक्यादिकों के वाक्य अप्रमाण हैं। तस्मात् बौद्धादि नास्तिकों के मूल-प्रमाणरहित दर्शनों में अप्रामाण्य सिद्ध करने के लिये शब्द-प्रमाण को पृथक् स्वीकार करना ही चाहिये।

इसके अतिरिक्त यह ज्ञान, आकांक्षा, योग्यता आदि की सहायता से होता है, वहाँ अनुमान का नियत रूप से अनुभव नहीं आता। इससे भी अनुमान-प्रमाण की अपेक्षा शब्द-प्रमाण का पृथक् फल सिद्ध होता है। इस कारण भी शब्द रूप प्रमाण पृथक् सिद्ध होता है। यही प्रदर्शित करने के लिए ग्रन्थकार ने आकांक्षादिकों के निरूपण की 'वाक्यजन्यज्ञाने च' आदि वाक्य से प्रतिज्ञा की है। आकांक्षादि पदों के अर्थ और लक्षणों को ग्रन्थकार अग्रिम ग्रन्थ से स्वयं कथन करते हैं।

तत्र² पदार्थानां परस्पर-जिज्ञासा-विषयत्व-योग्यत्वमाकाङ्क्षा³ ।


१. 'वत्सं बधानेतिपदम् अर्थसंसर्गज्ञानपूर्वकम् आकांक्षादिमत्पदसमूहत्वात् दण्डेन-गामानयेति पदसमूहवत् । २. तत्र आकांक्षा-योग्यता-आसत्ति-तात्पर्यज्ञानानां मध्ये । ३. 'येन विना यस्य अन्वयाननुभावकत्वं तादृशपदवत्त्वमाकांक्षा' इति नैयायिकाः । किन्त्वदमभिहितान्वयवादे न संभवति, आकांक्षायां पदार्थधर्मत्वात्, पदधर्मत्वाऽभावात् । अन्विताभिधानवादेऽपि 'वाजिभ्यो वाजिनमि'त्यादौ वाजिनपदस्य वाजिनपदादि विना अन्वयानुभावकत्वाभावात् वैश्वदेवयागविवक्षायामपि आकांक्षासत्वात् द्वितीयाध्याये गुणात् तत्र कर्मभेदवर्णनमनुपपन्नं स्यात् । अतः मीमांसकमतानुसारेण आकांक्षास्वरूपं वर्णयति ग्रन्थकारः ।

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 249, कुल 482 में से · BharatKosha