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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 482 में से

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पृष्ठ 248

१९० वेदान्तपरिभाषा [ वाक्यजन्यज्ञाने कारणनिरूपणम्

**विवरण—**इस प्रकार उपमान-प्रमाण का निरूपण करने के अनन्तर अब शब्द प्रमाण का निरूपण करना क्रम से ही प्राप्त है। 'यस्य', इत्यादि वाक्य से शब्दप्रमाण का लक्षण बताया है। जिसका निष्कृष्ट अर्थ इस प्रकार है—जिसका पदार्थ-संसर्ग, किसी भी अन्य प्रमाण से बाधित नहीं होता ऐसे और वक्ता के तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग के बोधक वाक्य को ही शब्द-प्रमाण कहते हैं। यहाँ पर वाक्य के संसर्ग में 'मानान्तराबाधितत्व' और 'तात्पर्य-विषयीभूतत्व' ये दो विशेषण दिये गये हैं। इन दोनों की आवश्यकताओं का क्रम से विचार करें। 'मानान्तराबाधितत्व' विशेषण के न देने पर 'वह्निना सिञ्चेत्' = अग्नि से सेचन करे, इस वाक्य में अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि इस वाक्य का अग्नि-सेचन रूप अर्थ, वक्ता के तात्पर्य का विषय है। उपर्युक्त विशेषण के देने पर उसका निवारण हो जाता है। क्योंकि अग्निकरणक (अग्निसाध्य) सेचन, यद्यपि तात्पर्य का विषय है तथापि प्रत्यक्षप्रमाण से बाधित हो रहा है। सेचन का होना द्रव पदार्थ से ही संभव है। अग्नि जैसे अद्रव पदार्थ से द्रवद्रव्यकरणक-व्यापार रूप सेचन का होना संभव नहीं। इसी प्रकार 'तात्पर्यविषयीभूतत्व' विशेषण के देने पर 'स प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्' उस प्रजापति ने अपनी वपा को उपट (खरोंच) कर निकाला, इत्यादि श्रुतिवाक्य पर अव्याप्ति दोष आता है। क्योंकि अपनी वपा का स्वयं उच्छेद करना रूप अर्थ, प्रमाणान्तर से बाधित है, क्योंकि वपोत्खेद होने पर जीवित रहना ही असंभव है।

इस कारण ऐसे वाक्य को प्रमाण वाक्य नहीं कहा जा सकेगा। अन्यथा वेद का प्रामाण्य नष्ट होगा। अतः इस अव्याप्ति के निराकरणार्थ 'तात्पर्यविषयीभूतत्व' विशेषण देना आवश्यक है। यहाँ पर श्रुति के तात्पर्य का विषय, याग की अवश्यकर्तव्यता ही है। अर्थात् स्वयं ब्रह्मदेव ने भी इतनी श्रद्धा से याग (यज्ञ) किया, तब हम संसारी मनुष्यों को तो वह अवश्य ही कर्तव्य है—इस प्रकार बोधन कराना ही उस मंत्र का तात्पर्य है। जो किसी प्रमाण से बाधित नहीं होता। इसलिये वह श्रुतिवाक्य, वाक्य होने से उपर्युक्त अव्याप्ति नहीं होने पाती।

शब्द के लक्षण में 'वाक्यस्य' कहने की आवश्यकता यह है कि—शब्द-प्रमाण से जिस अर्थ का हमें ज्ञान होता है वही अर्थ, अन्य प्रमाणों से भी सिद्ध होता है। इसलिए अन्य प्रमाणों को भी शब्द या आगम कहना पड़ेगा। इसके निराकरणार्थ लक्षण में 'वाक्यस्य' अवश्य ही निविष्ट करना चाहिये। अन्यथा—'यह घट है' इस चक्षुरिन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय 'घट' है और वह बाधित भी नहीं है। ऐसे प्रत्यक्ष में, शब्द का लक्षण अतिव्याप्त होगा।

**शंका—**आपके मत में घटादि सभी जगत् मिथ्या है। तब शब्द से व्यक्त किया हुआ सभी अर्थ बाधित है। ऐसी स्थिति में 'अबाधितार्थकत्व' रूप विशेषण, संसर्ग में कभी संभव ही नहीं हो सकता। इसलिये यह लक्षण, असंभव दोष से दूषित है।