वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम्
प्रकार गो में भी उसका प्रत्यक्ष होना ही उचित है। इसलिये सादृश्य, प्रमाणान्तर नहीं है, उसका प्रत्यक्ष में ही अन्तर्भाव होता है।
परन्तु सांख्य का यह अभ्युपगम ठीक नहीं है, क्योंकि आपके कथनानुसार यद्यपि सादृश्य सर्वत्र एक सा ही है तथापि उसके धर्मी और प्रतियोगी सर्वत्र भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिये तत्तद्-विशेष-व्यक्ति पर रहने वाला सादृश्य भिन्न होता है, यह मानना ही पड़ेगा। सादृश्य जिसमें प्रतीत होता है, वह उस सादृश्य का धर्मी होता है, उसी को सादृश्य का अनुयोगी भी कहते हैं और जिसका सादृश्य भासित होता है उसे प्रतियोगी कहते हैं। ‘गोसदृशो गवय:’ इस ज्ञान में—गवय में, गो का सादृश्य भासित होता है, इसलिये इस सादृश्य का ‘गवय’ धर्मी या अनुयोगी और ‘गो’ प्रतियोगी है, यह कहना चाहिये। परन्तु यह धर्मि-प्रतियोगिभाव ‘गवय-सदृशी गो:’ गवय जैसी मेरी गाय है, इस ज्ञान में नहीं रहता। यहाँ पर ‘गो’ धर्मी और गवय प्रतियोगी होता है। इसलिए गोगत और गवयगत सादृश्य को एकरूप (समान) ही मान लेने पर जिस व्यक्ति को ‘गोसदृशो गवय:’ इस प्रकार गवयनिष्ठ गोसादृश्य का ज्ञान हुआ है उस व्यक्ति को ‘गोगतगवयसादृश्यं पश्यामि’ ‘मैं गोनिष्ठ गवयसादृश्य को देखता हूँ’ ऐसा अनुव्यवसाय होना चाहिये, परन्तु होता नहीं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में ‘सादृश्य’ पृथक्-पृथक् ही रहता है, यह अवश्य ही स्वीकार करना होगा। इसीलिए गवय-प्रत्यक्ष होने के कारण उसके साथ चक्षु का सन्निकर्ष होता है अतः ‘तद्गत-सादृश्य’ प्रत्यक्ष भासित होता है। परन्तु गोव्यक्ति, वहाँ पर उस समय समीप नहीं होने से उसके साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष नहीं रहता। इसलिये गोनिष्ठ-सादृश्य, प्रत्यक्ष का विषय हो नहीं सकता। तस्मात् ‘सादृश्य का प्रत्यक्ष में अन्तर्भाव होता है’ यह सांख्यमत, युक्ति तथा अनुभव के विरुद्ध होने से सर्वथा उपेक्षणीय है।
इस पर कदाचित् वैशेषिक कहे कि—प्रत्यक्ष में उपमान का अन्तर्भाव न होने पर भी अनुमान में उसका अन्तर्भाव हो सकेगा। इसका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—उपमान प्रमाण का ‘अनुमान’ में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता। क्योंकि ‘गो’ के साथ गवय के सादृश्य का ज्ञान, अनुमान-प्रमाण से होना सम्भव नहीं। ‘अनुमान से गवय-सादृश्य का ज्ञान होता है’ स्वीकार करनेवाले वैशेषिकों को यहाँ इस प्रकार अनुमान¹ करना चाहिए—(१) मेरी गौ, इस गवय से निरूपित (गवयप्रतियोगिक) सादृश्य से युक्त है। (२) क्योंकि वह गोनिरूपित (गोप्रतियोगिक अर्थात् ‘गो’ जिसका प्रतियोगी है अर्थात् ‘गवय’ जिसका अनुयोगी है) सादृश्य से युक्त है। (३) इस गवय के समान।
१. ‘मदीया गौ: एतद्गवयनिरूपितसादृश्यवती गोप्रतियोगिकगवयानुयोगिकसादृश्यविशिष्टत्वात्, एतद्गवयवत्।’