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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 482 में से

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पृष्ठ 243

उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम् ] उपमानपरिच्छेदः १८५

परन्तु ऐसा अनुमान होना संभव नहीं। क्योंकि उस पर 'स्वरूपासिद्धि' दोष आता है। 'हेतु का पक्ष पर न रहना' स्वरूपासिद्धि दोष कहलाता है। यहाँ पर हेतु है—'गोप्रतियोगिक सादृश्य'। वह (हेतु) 'गो' रूप पक्ष पर नहीं रहता। गो में गवय-निरूपित सादृश्य रहेगा, परन्तु गोनिरूपित (स्वयं गो का) सादृश्य कैसे रह सकेगा ? सादृश्य भेद-घटित होने से, दो पदार्थों में भेद के बिना उनमें सादृश्य है, नहीं कहा जा सकता। और जो हेतु अपने पक्ष पर रहता ही नहीं, वह वहाँ पर साध्य की सिद्धि कैसे कर सकेगा। इसलिये अनुमान से उपमान की गतार्थता नहीं होती। इस पर वैशेषिक ऐसा कहें कि—आपके कथनानुसार यदि हम अनुमान करें तो हमारे पक्ष में उपर्युक्त दोष आवेगा, परन्तु हम वैसा अनुमान नहीं करते। हम ^१अनुमान-प्रयोग इस प्रकार करते हैं—(१) मेरी गाय इस गवय जैसी है। (२) क्योंकि उसमें एतद्गवयनिष्ठ सादृश्य का प्रतियोगित्व है (यह गवय जिस सादृश्य का अनुयोगी है और यह गो जिस सादृश्य की प्रतियोगी है, अर्थात् गवय का सादृश्य गो पर रहता है)। (३) जो पदार्थ, जिस पदार्थगत सादृश्य का प्रतियोगी होता है वह पदार्थ उस पदार्थ के सदृश रहता है। जैसे—चैत्र, मैत्र में रहने वाले अपने सादृश्य का प्रतियोगी (आधेय) है, इसलिये वह मैत्रसदृश है। अर्थात् मैत्र व्यक्ति यदि चैत्र व्यक्ति जैसा है तो चैत्र भी मैत्र जैसा अवश्य ही होगा। ऐसा अनुमान करने पर कोई दोष नहीं आने पाता। इसलिए अनुमान से ही उपमान चरितार्थ हो जाता ।

परन्तु यह शंका भी ठीक नहीं है। क्योंकि इस अनुमान पर किसी प्रकार का दोष न आने पर भी प्रत्येक सादृश्य-प्रमा के समय ऐसा अनुमान किया ही जाय, यह कोई नियम नहीं है। बिना अनुमान के भी 'अनेन सदृशी मदीया गो:' ऐसी अबाधित प्रतीति होती है। इसलिए जहाँ पर साध्य (वह्नि आदि) प्रत्यक्ष है, वहाँ पर भी आप 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' अनुमान करते हैं, परन्तु उतने से ही प्रत्यक्ष-प्रमाण की व्यर्थता जैसे सिद्ध नहीं होती (अनुमान से प्रत्यक्ष अगतार्थ है), वैसे ही अनुमान से यद्यपि उक्त सादृश्य-ज्ञान सिद्ध होने पर भी उपमिति-प्रमा का पृथक् अनुभव होने से उपमान-प्रमाण, अनुमान से चरितार्थ नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त इस सादृश्यज्ञान के अनन्तर


१. 'मदीया गो एतद्गवयसदृशी (एतद्गवयप्रतियोगिक सादृश्यवती) गवयानुयोगिकसादृश्यप्रतियोगित्वात्। यत्र सादृश्यं, स तत्सादृश्यस्य अनुयोगी। यस्य सादृश्यं, स तत्सादृश्यस्य प्रतियोगी। यदा गवये गोसादृश्यं, तदा तत्सादृश्यस्य गवयः अनुयोगी गौश्च प्रतियोगीति तत् सादृश्यं गवयानुयोगिकं गोप्रतियोगिकमिति व्यवह्रियते। अत एव गवयानुयोगिक-सादृश्यप्रतियोगित्वस्य गवि विद्यमानत्वात् तस्य तल्लिङ्गत्वं युक्तमिति।