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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 482 में से

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उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम् ] उपमानपरिच्छेदः १८३

अर्थ—'यह गवयनिष्ठ सादृश्यज्ञान, प्रत्यक्ष से भी हो सकता है' यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि उस समय 'गो' व्यक्ति से इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं रहता। 'अनुमान'-प्रमाण से उसका ( सादृश्य का ) ज्ञान होता है, यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि 'गवय' में रहने वाला 'गो' का सादृश्य, 'गो' में रहने वाले 'गवय' के सादृश्य का लिङ्ग ( साधक हेतु ) बन नहीं सकता।

इस पर '( १ ) मेरी गाय इस गवय जैसी है। ( २ ) क्योंकि उसमें एतद्गवयनिष्ठ सादृश्य का प्रतियोगित्व है। ( ३ ) जो जिसमें रहने वाले सादृश्य का प्रतियोगी होता है वह उसके जैसा होता है।'¹

उदाहरण—'चैत्र, मैत्र में रहने वाले सादृश्य का प्रतियोगी है, इसलिये वह मैत्र जैसा है' ऐसे अनुमान से 'गवयनिष्ठ सादृश्य का ज्ञान हो सकेगा' यह शंका करना भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा अनुमान न करने पर भी 'इस गवय जैसी मेरी गाय है' यह ज्ञान होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है और इस ज्ञान के अनन्तर 'मैं इस बात को उपमान-प्रमाण से जानता हूँ' यही अनुव्यवसाय होता है। इसलिये 'उपमान' स्वतन्त्र प्रमाण है, यह सिद्ध होता है।

**विवरण—**सांख्य²-दर्शनकार 'प्रत्यक्ष' में ही उपमान-प्रमाण का अन्तर्भाव करते हैं। उनका कहना है कि 'गवय' के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने पर उसमें जो 'गोसादृश्य' का ज्ञान होता है और वह जैसे प्रत्यक्षात्मक ही रहता है, उसी प्रकार 'गो' का स्मरण होने के बाद 'गो' में जो गवयसादृश्य का ज्ञान ( जिसे आप उपमिति कहते हैं ) होता है वह भी प्रत्यक्ष रूप ही है, यह मानना चाहिये। क्योंकि गवय में भासित होने वाला सादृश्य, गो में भासित होने वाले सादृश्य से भिन्न नहीं है। जो सादृश्य गवयनिष्ठ है वही गोनिष्ठ है। क्योंकि किसी एक जाति का, अन्य जाति में रहने वाला जो भूयोऽवयवसामान्ययोग ( बहुत से अवयवों का साम्य ) रूप सम्बन्ध को सादृश्य कहते हैं। और ऐसे सादृश्य का गवय में जिस प्रकार प्रत्यक्षात्मक ज्ञान होता है उसी


संज्ञिसम्बन्धसिद्धिः न प्रयोजनम्। अपि तु सादृश्यज्ञानमेव फलम् तस्य च प्रतिनिध्यादिनिर्णयः वार्तिकोक्तं फलमित्यवगन्तव्यम्।

१. 'मदीया गौः एतद्गवयसदृशी एतद्गवयनिष्ठसादृश्यप्रतियोगितावत्त्वात्।'
२. सांख्याः उपमानं न प्रमाणान्तरं प्रमेयाभात्। यतः असन्निहिते गवि यद् गवयसादृश्यं, तत् न तस्य प्रमेयं, तस्य तु प्रत्यक्षविषयत्वात्। गवयनिष्ठसादृश्यस्य प्रत्यक्षत्वे गवि अपि तस्य प्रत्यक्षत्वौचित्यात्, गुणकर्मवयवसामान्ययोगरूपस्य तस्य एकरूपत्वात्। तथा चोक्तं तत्त्वकौमुद्याम्—"भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते। सामान्ययोगश्चैकः। स चेत् गवये प्रत्यक्षः गवि अपि तथेति नोपमानस्य प्रमेयान्तरमस्तीति वर्णयन्ति।