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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 482 में से

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भूमिका

अखिल-ब्रह्माण्ड की रची सृष्टि में सम्पूर्ण-प्राणिवर्ग सुख को ही परम्-पुरुषार्थ समझता है। सभी मनुष्य सुख की प्राप्ति के लिए ही सांसारिक तथा पारलौकिक कार्यों के सम्पादन में सदा लगे रहते हैं। वे समझते हैं कि इच्छाओं की पूर्ति होना

मानव की स्वाभाविक इच्छा तथा उसकी समस्त इच्छाओं की पूर्ति का स्वरूप तथा उपायही सुख की वास्तविक परिभाषा है। किन्तु समस्त इच्छाओं की पूर्ति होना उनके निःशेष होने में ही है, क्योंकि जब तक कोई इच्छा बनी रहेगी तब तक सुख की न्यूनता ही भासित होती रहेगी सांसारिक या पारलौकिक सुख के साधनों से तो इच्छा की वृद्धि होती दिखाई देती है,कमी नहीं, निःशेष होने की बात तो दूर रही। सांसारिक सुखसाधनों की प्राप्ति से कामनाओं की वृद्धि-अतिवृद्धि होती जाती है, यानी 'निन्यानबे के चक्र में' आदमी

फँस जाता है। पारलौकिक सुखसाधनों से उत्तमोत्तम स्वर्गादि सुख की प्राप्ति होने पर भी 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके विशन्ति' पुण्य के क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ता है। एवञ्च 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्' अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में कामनाएं नाचती रहती हैं। अतः वास्तविक सच्चा सुख तभी समझना चाहिये जब कामनाओं का अन्त हो जाय और उसका होना पूर्णकाम होने पर ही संभव हो सकता है। अतएव श्रीगौड़पादाचार्य ने कहा है—'आप्तकामस्य का स्पृहा'। पूर्णकाम होना आत्मसाक्षात्कार के बिना कथमपि संभव नहीं, क्योंकि आत्मा ही सुख एवं आनन्द का सागर है। उसके अतिरिक्त सुख या आनन्द अन्य किससे उपलब्ध हो सकता है ? यह केवल कल्पना नहीं है, शास्त्र, युक्ति तथा अनुभव से भरा हुआ तथ्य है। जिस व्यक्ति के पास अखण्ड प्रकाश देनेवाली मणि ( रत्न ) हो, उसे किसी भी दीपक आदि बाह्यसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसके समीप तो रात-दिन एक-सा प्रकाश रहता है। एक बार सर राधाकृष्णन् ने अपने व्याख्यान में बताया था कि उनके पास किसी महाराजा से उपहार-प्राप्त छोटा-सा हीरा है, जिसके दिव्य प्रकाश में उन्हें अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं रहती। उसी के प्रकाश में वे पुस्तक अच्छी तरह से पढ़ लेते हैं और लेखनादि कार्य करते रहते हैं। अतः यह स्वीकार करना ही होगा कि सुख या आनन्द-स्वरूप ब्रह्मात्मा का प्रत्यक्ष ( अपरोक्ष ) ज्ञान अर्थात् ब्रह्म ( आत्म ) साक्षात्कार होने पर बहिर्भूत साधनों की कोई अपेक्षा या आवश्यकता नहीं रह जाती। उस स्थिति में

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