वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
पृष्ठ 22, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 22
( १४ )
| आत्मीयता सांसारिक सुख का मूल | उस व्यक्ति को कौन-सी कामना घेर सकती है ? बाह्य साधनों से जो सुख-सा प्रतीत होता है, वह सब आत्मीयता के सम्बन्ध से ही प्रतीत होता है। जिस स्थावर-जङ्गम सम्पत्ति के साथ आत्मीयता के लेश का भी सर्वथा अभाव हो, उसके द्वारा सुख-प्राप्ति की आशा कभी भी नहीं की जा सकती। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि जिसके साथ जिस तारतम्य से आत्मीयता का सम्बन्ध रहता है, तदनुसार ही उसमें सुख की मात्रा पाई जाती है। |
| भारतीय चिन्तन की अखण्ड दृष्टि और वेदान्तदर्शन का मूल स्रोत | भारतीय-मनीषा नितान्त कुशाग्र (सूक्ष्म) तथा मर्मस्पशिनी है। आत्मद्रष्टा भारतीय ऋषिवर्ग इसीके बल पर विश्वद्रष्टा हो पाया। इसी मनीषा के बल पर विश्वरूप से स्थित पदार्थ की केवल आकृति का ज्ञान ही नहीं, अपितु उसकी प्रकृति एवं संचालिका चेतना-शक्ति के संयोगात्मक ज्ञान का दर्शन भी उसने पाया। भारतीय-चिन्तन की अखण्ड-दृष्टि के मूल-अंकुर आज भी उपनिषद्वार्ड्मय में उपलब्ध हैं। उस आनन्दमय ब्रह्मात्मा के साक्षात्कार में एकमात्र उपायभूत उपनिषद् भाग का अपनी दिव्यदृष्टि द्वारा प्रकाश पाकर हमारे भारतीय ऋषियों ने वेदान्तदर्शन का आविर्भाव किया। |
| ब्रह्मसूत्रों की निर्मिति की आवश्यकता तथा उस पर विभिन्न आचार्यों के दृष्टिकोण | शास्त्र की गम्भीरता तथा शनैः शनैः बुद्धि की क्षीणता होती देखकर परम-कारुणिक बादरायण वेदव्यास ने वेदान्तशास्त्र के तात्पर्यनिर्णयार्थ वेदान्तमीमांसा (ब्रह्ममीमांसा) के रूप में ब्रह्मसूत्रों का निर्माण किया, जिनपर भगवत्पूज्यपाद आचार्य श्रीशङ्कर ने भाष्य की रचना की। उसी तरह भगवान् रामानुज, निम्बार्क, मध्व और भगवान् वल्लभ आदि आचार्यों ने भी अपनी दृष्टि से गम्भीर भाष्यों की रचना की। आचार्य शङ्कर ने 'ब्रह्माद्वैत', आचार्य रामानुज ने 'विशिष्टाद्वैत', आचार्य निम्बार्क ने 'द्वैताद्वैत', आचार्य मध्व ने 'द्वैत' और आचार्य वल्लभ ने 'शुद्धाद्वैत' का प्रतिपादन बड़े ऊहापोह के साथ किया है। तदनन्तर उस पर अनेक व्याख्याएँ, टीका-टिप्पणियों एवं स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना भी हुई। |
| सभी वेदान्तियों का एक लक्ष्य | मोक्षप्राप्ति और उसके उपाय बताना ही सभी का एकमात्र लक्ष्य रहा। सभी ने आत्मसाक्षात्कार को ही मोक्ष का साधन बताया है। 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादि श्रुतिवाक्यों ने आत्मसाक्षात्कार को लक्ष्य कर श्रवणादि का विधान किया है। वह श्रवण अन्य कुछ न होकर 'वेदान्त-विचार' ही है। श्रीमद् बादरायणव्यास ने भी |