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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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प्रथमसूत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' के द्वारा उक्त तथ्य की ओर ही संकेत किया है । स्मृतियों ने भी 'श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः । मत्वा च सततं ध्येय एते दर्शनहेतवः ॥' कहकर उक्त तथ्य का समर्थन किया है ।

वेदान्त-विचार में प्रमाण-प्रमेयादि की आवश्यकता

उक्त श्रवणादिरूप वेदान्तविचार के लिये प्रमेय एवं प्रयोजन की भी आवश्यकता रहती है । प्रमेय एवं प्रयोजन का निश्चय करके ही सब लोग विचार किया करते हैं। इस तथ्य को भट्टपाद कुमारिल ने अपने श्लोकवार्तिक में—

"ज्ञातार्थं ज्ञातसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥"

के द्वारा स्पष्ट रूप से बताया है । उस प्रमेय, प्रयोजन का ज्ञान प्रमाणाधीन है । अतः प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजन का ज्ञान प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये ।

वेदान्तपरिभाषा ग्रन्थ-निर्माण की आवश्यकता तथा महत्त्व

वेदान्त के सूत्र-भाष्य उसके व्याख्यानादि ग्रन्थों में वेदान्तसम्मत प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजन आदि का प्रतिपादन किया गया है, किन्तु सुकुमार शेमुषी-सम्पन्न मानवों के लिये उन ग्रन्थों से उनकी अवगति होना कठिन है, क्योंकि उन ग्रन्थों में 'यह प्रमाण है', 'यह प्रमेय है', 'यह प्रयोजन है' इस प्रकार से स्पष्टतया प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजनों को नहीं बताया गया है । इस कठिनाई को देखते हुए सुकुमार मतिवाले वेदान्तजिज्ञासु छात्रों पर करुणार्द्र हुए पण्डित-पुण्डरीक श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र ने प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजन को स्पष्टतया बताने के लिये प्रस्तुत 'वेदान्त-परिभाषा' नामक प्रकरण ग्रन्थ की रचना की है । यद्यपि यह स्वल्पकाय ग्रन्थ है, तथापि इसमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, भाष्यादि ग्रन्थों के अध्ययनोपयोगी अनेक विषयों का प्रतिपादन सुचारुतया किया गया है, जिसके अध्ययन से जिज्ञासु छात्रों को अद्वैतवेदान्त में सुलभता से प्रवेश पाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । यही कारण है कि सम्पूर्ण विश्व में इस ग्रन्थ का अध्ययन-अध्यापन अक्षुण्ण रूप से होता आ रहा है ।

रहस्यपूर्ण ग्रन्थों पर व्याख्याओं की आवश्यकता

इस ग्रन्थ पर अनेक मूर्धन्य विद्वानों ने संस्कृत तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक उत्तमोत्तम व्याख्याएँ एवं टिप्पणियाँ भी लिखी हैं । जैसे रत्नपरीक्षक (जौहरी) बिखरे रत्नों में से एक-एक को चिमटी से पकड़-पकड़कर एक जगह रख देता है तब प्राकृत लोग उन रत्नों को अच्छी तरह देख पाते हैं, उसी तरह रहस्यपूर्ण ग्रन्थों में बिखरे तत्त्व-रत्नों को व्याख्याकाररूप जौहरी जब तक व्याख्यानरूपी चिमटी से पकड़-पकड़कर अपनी व्याख्या में एकत्रित नहीं करता, तब तक जिज्ञासु साधारणजन उन तत्त्व-रत्नों को समझ नहीं पाते । अतः रहस्यपूर्ण ग्रन्थों पर व्याख्याओं का होना अत्यन्त अपेक्षणीय माना जाता है ।