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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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सभ्यता तथा संस्कृति को गौरवान्वित करने का श्रेय 'दर्शन' को प्राप्त है।

संस्कृति के कारण प्रायः सभी दर्शनों का समान लक्ष्यविद्वत्समाज में प्रचलित विचारों पर ही दर्शन की उत्पत्ति का होना निर्भर है। भिन्न-विभिन्न दर्शनों में मतभेद रहने पर भी उनपर भारतीय-संस्कृति का प्रभाव रहने के कारण उनमें समानता भी पाई जाती है। हम पहले बता चुके हैं कि सभी का लक्ष्य एकमात्र परम-पुरुषार्थ-मोक्ष की प्राप्ति करा देना है। बन्धन से छूटने के अनेक उपाय भिन्न-भिन्न प्रकार से बताये गये हैं। मानवजीवन में 'दर्शन' का महान् उपयोग है। जीवन का लक्ष्य 'दर्शन' के परिशीलन से ही अवगत हो पाता है।

विचारशील मानव सृष्टि को देखकर आश्चर्य-चकित हो उठता है और सृष्टि की पहेली को सोचने लगता है कि यह सृष्टि किसने की ? कैसे की ? कब की ?

और क्यों की ? प्रायः सभी दर्शनों ने इन पहेलियों पर अपनी-अपनी दृष्टियों से विस्तृत विचार किया है।

न्यायदर्शन का दृष्टिकोणन्याय, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन दर्शनों का अपना मत है कि अत्यन्त सूक्ष्म 'परमाणु' ही इस सृष्टि के आदि कारण हैं।

सांख्य दर्शन का कहना है कि उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि दर्शनों का मत इसलिये उचित नहीं है, कि भौतिक परमाणुओं से स्थूल सृष्टि की उत्पत्ति यद्यपि हो सकती है, तथापि मन, बुद्धि, अहंकार जैसे सूक्ष्म पदार्थों की उत्पत्ति नहीं हो सकती।

सांख्य-योग दर्शन का दृष्टिकोणअतः उसका (सांख्य और योग दर्शन का) अपना मत है कि 'प्रकृति' इस स्थूल-सूक्ष्म 'सृष्टि' का आदि कारण है। सम्पूर्ण सृष्टि के निर्माण में प्रकृति ही पर्याप्त है। ईश्वर को भी सृष्टि का कारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह शाश्वत तथा अपरिवर्तनशील है। और कारण ही परिणाम में परिणत होता है, अतः कारण को परिणाम से अभिन्न माना जाता है। ईश्वर परिवर्तनशील न होने से वह सृष्टि में परिणत नहीं हो सकता। सांख्यदर्शन ने 'प्रत्ययसर्ग और 'तन्मात्र ( भौतिक ) सर्ग' के भेद से दो प्रकार की 'सृष्टि' कही है और पुरुष को 'भोगापवर्गरूपी पुरुषार्थ' प्राप्त करा देना उसका प्रयोजन बताया है।

किन्तु वेदान्तदर्शन को उपर्युक्त दर्शनों में से किसी का भी सिद्धान्त अभिमत नहीं है। उसका अपना मत है कि 'ब्रह्म' ही सम्पूर्ण स्थूल-सूक्ष्म सृष्टि का उपादान

वेदान्तदर्शन का दृष्टिकोणकारण तथा निमित्तकारण भी है। इसके मत का समर्थन श्रुति तथा युक्ति से भी होता है। इस विषय में उपनिषद् ने 'ऊर्णनाभि' का दृष्टान्त भी प्रस्तुत किया है। जैसे मकड़ी बिना किसी उपकरण के अपने शरीर