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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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से अभिन्नतन्तुओं को अपने शरीर के बाहर फैलाती है और फिर उन्हें अपने शरीर में मिलाकर अभिन्न बना देती है, उसी प्रकार यह सृष्टि (विश्व) उस 'ब्रह्म' से उत्पन्न हुई है। अतः वह 'ब्रह्म' उपादानकारण तथा निमित्तकारण भी है।

वेदान्तदर्शन के अनुसार 'जगत्' नितान्त मिथ्या है। नित्य परिवर्तनशील है।

वेदान्तदर्शन के अनुसार जगत् की असत्यताआचार्य शंकर के द्वारा की गई 'सत्य' की परिभाषा—'यद्रूपेण यन्निश्चितं तद् रूपं न व्यभिचरति तत् सत्यम्'—जिस रूप से जो पदार्थ निश्चित होता है, यदि वह रूप सतत समभाव से विद्यमान रहे तो उसे सत्य कहते हैं।—के अनुसार 'संसार की कोई भी वस्तु' सत्य की कोटि में नहीं आ सकती।
अन्यदर्शनों की दृष्टि में जगत् की सत्यता का आधारकिन्तु अन्य दर्शन प्रत्यक्षज्ञान की यथार्थता के आधार पर 'जगत्' और उसके 'समस्त विषयों' को सत्य मानते हैं। वे बौद्धों के 'शून्यवाद' और 'क्षणिकवाद' को तथा अद्वैतमत के 'मायावाद' को नहीं मानते।

वेदान्तदर्शन की दृष्टि से 'सृष्टि की रचना' और 'संहार' मानव-शरीर के 'श्वास-निःश्वास' की तरह चलता रहता है। इसीलिये पूर्वमीमांसादर्शनने 'धाता यथा पूर्वमकल्पयत्' इस श्रुति के आधार पर कहा है कि 'न कदाचिदनीदृशं जगत्'।

वेदान्तदर्शन के अनुसार सृष्टि की रचना और संहारयह सृष्टिरचना तो वेदान्त की दृष्टि से उस 'ब्रह्म' की लीलामात्र है। अर्थात् ब्रह्म की माया का विलासमात्र है। 'अज्ञान' को तमोगुण प्रधान विक्षेप शक्ति के द्वारा 'ब्रह्म' इस सृष्टि की रचना करता है। अज्ञान की आवरण-शक्ति से ब्रह्म आवृत होता है और विक्षेपशक्ति से भ्रमरूप सृष्टि (जगत्) की उत्पत्ति होती है। यही बात 'विक्षेप-शक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत् सृजेत्' के द्वारा कही गई है।
आचार्य शंकर की दृष्टि में सृष्टिआचार्य शंकर 'सृष्टि' को 'ब्रह्म' का 'विवर्त' मानते हैं। अतएव उनका 'विवर्तवाद' है। किन्तु सांख्य का 'परिणामवाद' है। क्योंकि वह 'सृष्टि' को प्रकृति का परिणाम मानता है। विवर्तवाद को समझने के लिये वेदान्त ने रज्जु-सर्प का दृष्टान्त दिया है।

लोगों को यह जिज्ञासा होती है कि आनन्दमय चेतन ब्रह्म से दुःखमय, अचेतन (जड) जगत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? इस जिज्ञासा के समाधान में जैसे 'अचेतन गोमय' से 'चेतन वृश्चिक' आदि की तथा 'चेतन शरीर से' अचेतन केश, नखादि की उत्पत्ति होती है, वैसे ही 'चेतन ब्रह्म' से 'जड सृष्टि'

२ वे० प० भ०