भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 26

( १८ )

[माया से मोहित न होनेवाला व्यक्ति] की उत्पत्ति होती है, यह बताया गया है । माया से मोहित यदि संपूर्ण विश्व होता है तो ज्ञानी लोग उस माया से मोहित क्यों नहीं होते ? यह शंका मन में उठती है, किन्तु जादूगर और उसके जादू पर सोचें तो समाधान हो जाता है । जादूगर के जादू से उसके रहस्य को न जाननेवाले समस्त दर्शक व्यामोह में पड़ जाते हैं, लेकिन जादू के रहस्य को जाननेवाला व्यक्ति व्यामोहित नहीं होता । उसी तरह अद्वैत तत्त्व को न जाननेवाले लोग, माया से मोहित होते हैं, किन्तु अद्वैत तत्त्व को जाननेवाले ज्ञानी लोग उस माया से मोहित नहीं हो पाते ।

वेदान्तदर्शन ने प्रातिभासिक, व्यावहारिक और पारमार्थिक भेद से तीन प्रकार की सत्ता मानी है ।

[वेदान्त की दृष्टि से तीन सत्ताएं] प्रातिभासिकसत्ता — जैसे—रज्जु-सर्प प्रतिभास ( प्रतीति ) काल में सर्प की सत्यतया प्रतीति होती है । व्यावहारिकसत्ता — जैसे—जगत् के सभी पदार्थ । पारमार्थिकसत्ता — जैसे—ब्रह्म ।

[प्रातिभासिक सत्ता (भ्रमस्थल) के संबन्ध में दार्शनिकों के अपने-अपने विचार : अद्वैत वेदान्त] शुक्ति में रजत का जो प्रतिभास ( प्रतीति ) होता है, उसके सम्बन्ध में विभिन्न दार्शनिकों ने अपनी-अपनी दृष्टि से विचार किया है । अद्वैत वेदान्त ने 'रज्जु + सर्प' जैसे स्थलों पर अनिर्वचनीयताख्याति को माना है । रज्जु पर 'सर्प' के ज्ञान को 'सत्' इसलिये नहीं कह सकते कि दीपक के प्रकाश में वह बाधित हो जाता है । उसे 'असत्' इसलिये नहीं कह सकते कि उस ज्ञान से भय पैदा होता है । अतः उस सर्पज्ञान को उभयविलक्षण होने से अनिर्वचनीय अथवा मिथ्या कहते हैं । अविद्या के कारण वैसा ज्ञान होता है । मिथ्या का अर्थ 'असत्' नहीं है किन्तु 'अनिर्वचनीय' है । उसी तरह 'जगत् की कल्पना' भी अनिर्वचनीय है ।

[कार्यकारण-संबंध पर दार्शनिकों में दृष्टिभेद] अद्वैत वेदान्ती की दृष्टि से 'आरम्भवाद तथा परिणामवाद' दोनों भ्रम पर अधिष्ठित हैं । 'कार्य-कारण सम्बन्ध' पर दार्शनिकों ने अपनी-अपनी दृष्टि से यथेष्ट ऊहापोह किया है । बौद्धों ने 'असत् से सत् की उत्पत्ति', सांख्य ने 'सत् से सत् की उत्पत्ति', नैयायिकों ने सत् से असत् की उत्पत्ति बताई है ।

[न्यायदर्शन की दृष्टि में कार्य-कारण सम्बन्ध] न्यायदर्शन का कथन है कि 'कारण' में कार्य की सत्ता उत्पत्ति से पूर्व नहीं रहती, किन्तु सहायक कारण सामग्री का उपयोग करने पर मृत्तिका में 'घट' संज्ञक एक 'नवीन वस्तु' की उत्पत्ति होती है । सभी कार्य अपने-अपने 'उपादान कारणों' से नितान्त भिन्न हैं । कोई कार्य अपने कारणव्यापार के पूर्व कारण में