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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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विद्यमान नहीं रहता। इस सिद्धान्त को 'असत्कार्यवाद' या 'आरम्भवाद' कहते हैं।

सांख्यदर्शन का कहना है कि 'सभी कार्य' अपनी उत्पत्ति से पूर्व अपने-अपने कारण में अव्यक्तरूप से विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार 'कार्य-कारण में अभेद है।'

सांख्यदर्शन की दृष्टि से कार्य-कारण सम्बन्ध: 'कार्य की' अव्यक्तावस्था का ही दूसरा नाम 'कारण' है। उसी तरह 'कारण' की व्यक्तावस्थाका नाम 'कार्य' है। अतः 'कार्य-कारण' का भेद व्यावहारिक है और उनका 'अभेद' वास्तविक है। इस सिद्धान्त को सत्कार्यवाद या परिणामवाद कहते हैं। यह 'सत्कार्यवाद' ही परिणामवाद और विवर्तवाद के आकार में अभिव्यक्त होता है। परिणामवाद के अनुसार कार्य की उत्पत्तिका अर्थ होगा कि कारण का वास्तविकरूप से रूपान्तरित होना। जैसे—दूध से दही या मिट्टी से घड़े का होना वास्तविक परिणाम है।

यह परिणाम—धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणाम के भेद से तीन प्रकार का होता है। धर्मी के धर्मों का परिणाम होना—धर्मपरिणाम है।

त्रिविध परिणाम: जैसे—धर्मी चित्त की वृत्ति का कभी नीलाकार तो कभी पीताकार, कभी श्वेताकार होना धर्मपरिणाम है। सुवर्ण का कटकधर्म-तिरोहित होकर मुकुटधर्म का प्रादुर्भाव होना अथवा मृत्तिका के पिण्डधर्म का तिरोहित होकर घटधर्म का प्रादुर्भाव होना, ये सब धर्मपरिणाम के ही उदाहरण हैं।

उसी प्रकार प्रत्येक धर्मी का क्रमशः भविष्यत्व, वर्तमानत्व और भूतत्वरूप लक्षणों के (काल के) पात्र होना—लक्षणपरिणाम है। यह धर्मी का लक्षण परिणाम है। अर्थात् अवस्थित धर्मी एक लक्षण तिरोहित होकर उसकी जगह दूसरे लक्षण का प्रादुर्भाव होना—यह लक्षणपरिणाम है। सांख्य-योग दर्शन में भविष्यत्व, वर्तमानत्व और भूतत्व—इन तीनों को 'लक्षण' या 'अध्व' कहते हैं। उसी प्रकार नीलाकार, पीताकार आदि वृत्तियों के वर्तमानत्व लक्षण में अस्पष्टतरत्व, अस्पष्टत्व, स्पष्टत्व, स्पष्टतरत्व आदि अवस्थाओं के कारण तारतम्य का अनुभव होता है। वैसे ही सुवर्ण कटकादि धर्मों की या मृत्तिका के पिण्डादि धर्मों की नवत्व, पुराणत्व आदि भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का अनुभव होता है। सत्त्वादि गुणों का चञ्चल-स्वभाव होने से यह अवस्थाभेद प्रतिक्षण होता रहता है। इसी को लक्षणों का अवस्थाभेद कहते हैं। किसी लक्षण के एक अवस्था को छोड़कर दूसरी अवस्था को प्राप्त होना ही अवस्थापरिणाम है। ये सब परिणाम धर्मी (द्रव्य) में ही होते हैं। अतः धर्मी के इन त्रिविध परिणामों में केवल आकार में ही अन्यथात्व होता है। द्रव्य में किसी प्रकार का अन्यथात्व नहीं होता। उसके आकार में बदलाव होता है, स्वरूप में नहीं। इस कारण धर्म और धर्मी में अत्यन्त भेद भी नहीं और अत्यन्त अभेद भी नहीं।