वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें( २० )
सांख्य का कहना है कि तीनों गुण निरन्तर परिवर्तनशील हैं। विकार या परिणाम उनका स्वभाव ही है। अतः वे एक क्षण भी अविकृत रूप में नहीं रहते प्रलयावस्था में प्रत्येक गुण दूसरों से खिंचकर स्वतः अपने में परिणत हो जाता है।
सांख्यसम्मत प्रकृति अर्थात् गुणों का सरूप परिणाम — अर्थात् सत्त्व-सत्त्व में, रजस्-रजस् में, और तमस्-तमस् में परिणत हो जाता है इस परिणाम को सरूप-परिणाम कहते हैं। इस अवस्था में गुणों से कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि वे पृथक्-पृथक् रहकर कुछ नहीं कर सकते। जब तक गुण आपस में नहीं मिलते और उनमें एक प्रबल नहीं हो पाता, तब तक उनसे किसी विषय की उत्पत्ति नहीं हो पाती। सृष्टि के पूर्व तीनों गुण साम्यावस्था में रहते हैं अर्थात् अस्फुटित रूप से ऐसे अव्यक्त पिण्ड रूप में रहते हैं जिसमें न गति होती है न शब्द, स्पर्श, रूप, रस या गन्ध होता है और न कोई विषय होता है। यही साम्यावस्था 'प्रकृति' है।
दूसरे प्रकार का परिणाम तब उत्पन्न होता है, जब गुणों में एक प्रबल हो उठता है और शेष दो उसके अधीन रहते हैं। इस स्थिति में विषयों की उत्पत्ति होती है। इस परिणाम को विरूपपरिणाम कहते हैं।
गुणों का विरूप परिणाम — इसी से सृष्टि का आरम्भ होता है। सांख्य ने सत्त्व, रजस् और तमस् के लिये 'गुण' संज्ञा का प्रयोग किया है। तथापि नैयायिक, वैशेषिकों के सम्मत 'गुण,' ये नहीं हैं। ये संयोग विभागशाली और लघुत्वादि धर्मों से युक्त होने के कारण द्रव्यरूप हैं। वाचस्पति मिश्र के के अनुसार इन्हें गुण इस लिये कहा जाता है कि ये तीनों प्रकृति के स्वरूपाधायक अङ्गरूप हैं और पुरुष के अर्थ (प्रयोजन) को सिद्ध करनेवाले हैं।
सांख्य-सम्मत 'गुण' द्रव्यरूप हैं — विज्ञानभिक्षु के अनुसार पुरुष को बन्धन में डालने वाले त्रिगुणात्मक महत्तत्त्वादि के निर्माता होने से इन्हें 'गुण' कहा गया है। क्योंकि गुण का अर्थ रस्सी भी है।
सृष्टि दशा में 'परिणाम' को नहीं किन्तु 'विकार' को उत्पन्न करते हैं विकार गुण 'परिणाम' हो सकता है, किन्तु परिणाम 'विकार' नहीं हो सकता।
परिणाम और विकार में भेद — समानभाव से परिवर्तन को परिणाम कहते हैं और विषमभाव से परिवर्तन को 'विकार' कहते हैं। परिणामनित्यता में बौद्ध और सांख्य की समानता है। चित्त शक्ति को छोड़कर भौतिक जगत् के समस्त पदार्थ प्रति-क्षण परिवर्तित होते रहते हैं—यह सांख्य का सिद्धान्त है।
आचार्य शंकर भी इस सत्कार्यवाद को स्वीकार करते हैं। क्योंकि कार्य,—'कारण' से भिन्न वस्तु नहीं है। क्योंकि सुवर्ण का अलंकार या मिट्टी का बर्तन