वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१ )
सुवर्ण से या मिट्टी से पृथक् कुछ नहीं है, वह भी सुवर्ण या मिट्टी मात्र ही है। सभी कार्य अपने उपादान कारण से अविच्छेद्य हैं। अपने-अपने उपादान कारण के बिना वे रह नहीं सकते। सुवर्ण या मिट्टी आदि द्रव्य केवल रूपान्तरित हो जाते हैं। सांख्य और वेदान्त दोनों ही सत्कार्यवाद के अनुयायी होने पर भी दोनों में अन्तर इतना ही है कि सांख्य "उपादान' में वास्तविक विकार या परिणाम मानता है क्योंकि
सत्कार्यवादी सांख्य और शंकर की विचारसरणि में अन्तर
वह नवीनरूप धारण करता है। अर्थात् जो आकार असत् था वह सत् हो जाता है। आचार्य शंकर का कहना है कि सांख्य की इस विचार-प्रक्रिया से 'सत्कार्यवाद' के सिद्धान्त का भंग हो जाता है। आचार्य शंकर का कहना है कि आकार का वास्तविक परिवर्तन तब कह सकते हैं कि यदि 'आकार' अपनी सत्ता अलग रख पाता। आकार तो उपादानरूप द्रव्य की एक अवस्थामात्र है जो उस द्रव्यरूप उपादान से अविच्छेद्य है। अतः आकार के पृथक् अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एवंच आकार या आकृति के परिवर्तन को देखकर उसे वास्तविक परिवर्तन समझना उचित नहीं है। जैसे कोई व्यक्ति सोते, उठते, बैठते हुए भी वही समझा जाता है, अन्य नहीं। अतः भिन्न-भिन्न आकारों का जो प्रत्यक्ष होता है, उसे प्रत्यक्षाभास ही समझना चाहिये। इस युक्ति से विवर्तवाद सिद्ध होता है। इस विवर्तवाद के अनुसार हमें यह समझ में आता है कि प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला अवास्तविक आकार-परिवर्तन केवल मानसिक आरोप या विक्षेपमात्र है। इसी को आचार्य शंकर ने 'अध्यास' शब्द से कहा है। इस 'अध्यासरूप मिथ्या कल्पना' का कारण एकमात्र 'अविद्या' है जो हमें भ्रम में डाल देती है और असत् में सत् का आभास कराती है। इसी को आचार्य शंकर अविद्या, अज्ञान या माया कहते हैं। इसी के कारण संसार की प्रतीति होती है।
विवर्तवाद की सिद्धि में युक्ति
अध्यास और उसका कारण
संसार का मूल कारण
भिन्न-भिन्न आकारों के रूप में दिखाई देनेवाली एक 'शुद्ध सत्ता' ही पारमार्थिकसत्ता है जो सम्पूर्ण संसार का मूल कारण है। वह नाना रूपों में प्रकट होने पर भी स्वयं 'निराकार' है। भिन्न-भिन्न भागों में विभक्त होने पर भी यथार्थतः 'निरवयव' है। सान्त विषयों में भासमान होने पर भी वह वास्तव में 'अनन्त' है। इस रीति से आचार्य शंकर अनन्त 'निर्विशेष शुद्धसत्ता' को ही संसार का मूल कारण अर्थात् 'उपादान कारण' कहते हैं। इसी सत्ता को 'ब्रह्म' कहते हैं।
अद्वैतवेदान्तियों का भ्रम-विषयक सिद्धान्त बौद्धों के 'शून्यवाद' या 'विज्ञानवाद' से भिन्न है। शून्यवादी का कहना है कि 'शून्य' ( असत् ) ही