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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 482 में से

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भ्रम के सम्बन्ध में बौद्ध और शंकर के भिन्न विचार

संसार 'भ्रम' के समान

अज्ञान के दो भेद

जगत् के रूप में दीखता है। विज्ञानवादी कहता है कि 'मानसिक विज्ञान' ही जगत् के रूप में दीखता है। किन्तु आचार्य शंकर कहते हैं कि प्रत्येक विषय का आधार 'शुद्धसत्ता' है। वह आधार न तो 'शून्य' है और न 'मन की भावना' ही है। यद्यपि यह दृश्यमान 'अविद्या' का परिणाम माना गया है तथापि अद्वैतवादी 'यथार्थ प्रत्यक्ष' और 'प्रत्यक्षाभास' का भेद करते हैं। इस कारण अज्ञान के भी दो प्रकार माने जाते हैं। जिस 'मूल अविद्या' के कारण व्यावहारिक जगत् का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, उसे 'मूलाविद्या' कहते हैं। उसी के सदृश जिस अविद्या के कारण तात्कालिक भ्रम होता है, उसे 'तूलाविद्या' कहते हैं।

शंकर का अनिर्वचनीय ख्यातिवाद

संसार-विषयक सभी प्रश्नों के उत्तर आचार्य शंकर के द्वारा स्वीकृत पारमार्थिक, व्यावहारिक, प्रातिभासिक—इन तीन सत्ताओं के द्वारा दे दिये जाते हैं। इस रीति से संसार एकरूप नहीं है। जो यह जानना चाहता है कि समष्टि रूप में संसार क्या है? उसके लिये उनका यह उत्तर है कि सत् और असत् दोनों से विलक्षण अनिर्वचनीय है। यदि संसार को व्यावहारिक सत्ता के अर्थ में लिया जाय तो कहते हैं कि व्यावहारिक दृष्टि से वह सत्य है। अर्थात् प्रातिभासिक सत्ता की अपेक्षा अधिक सत्य और पारमार्थिक की अपेक्षा कम सत्य है। यदि पारमार्थिक दृष्टि से जगत् को देखा जाय तो वह सत्य ही है, क्योंकि कारणरूप 'ब्रह्म' की सत्ता त्रिकाल में रहती है अर्थात् त्रिकालाबाधित है। कार्यरूपी जगत् में उस सत्ता का कभी अभाव नहीं रहता। नानारूप-नानात्मक विषय निर्विशेष रूप में 'सत्' है और सविशेषरूप में 'असत्' है। अतएव अद्वैतवादियों ने 'सृष्टि' को अनिर्वचनीय कहा है। इनके 'मायावाद' को अनिर्वचनीयख्यातिवाद भी कहते हैं। और 'मिथ्याज्ञान' को ही अविद्या कहते हैं।

व्यावहारिक भ्रम सभी को हुआ करता है। तथापि उसकी उत्पत्ति में भिन्न-भिन्नमत हैं

ख्यातिवाद : शून्यवादी माध्यमिक बौद्ध

शून्यवादी बौद्धों ने भ्रम का कारण असत्-ख्याति को माना है। उनका कहना है कि निद्रा की अवस्था में अर्थ का प्रतिभास नहीं होता। अर्थ का जो प्रतिभास होता है, वह भ्रम से होता है। उस प्रतिभास का विषय बाह्य 'सत्' नहीं है, अतः वह 'असत्' (निःस्वभाव) ही हो सकता है। 'माध्यमिक शून्यवादी बौद्ध' पदार्थों की व्यावहारिक सत्ता मानकर उसकी परीक्षा करते हैं और अन्त में उनको 'असत्' सिद्ध करते हैं। वे समस्त सविषयक ज्ञान को मिथ्या कहते हैं। रज्जु-सर्प आदि स्थलों