वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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पर 'सर्प' अत्यन्त असत् है । वहाँ पर जो उसकी प्रतीति हो रही है वह 'असत्य-ख्याति' है । जिसका अर्थ अत्यन्त असत्य सर्प का भास है ।
विज्ञानवादी बौद्ध 'आत्मख्याति मानते हैं । विज्ञानवादी योगाचार बौद्ध के मत से भ्रम दो प्रकार का होता है । एक मुख्य और दूसरा प्रातिभासिक । व्यवहार में हम इन्द्रियों की प्रायः एक-सी शक्ति का अनुभव करते हैं । उसी
| विज्ञानवादी बौद्ध | कारण हमारे कुछ ज्ञानों में भ्रमशून्यता रहती है । और कुछ ज्ञान भ्रान्त रहते हैं । व्यावहारिक अभ्रान्त ज्ञान भी पारमार्थिक दृष्टि से भ्रान्त ही है । भ्रान्त- |
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अभ्रान्त का विवेक तो व्यावहारिक दृष्टि से किया जाता है । 'योगाचार' का कहना है कि सभी प्रतिभासों में ज्ञान की अपनी ही ख्याति होती है । सम्पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान, 'वासना' से जन्य है, अतः वह सब मिथ्या है । इनके मत में बुद्धि ही समस्त पदार्थों के आकार को धारण करती है । रज्जु-सर्पस्थल में रज्जु में सर्प है ही नहीं । यह बुद्धि ( ज्ञान ) क्षणिक विज्ञानरूप है । यह क्षणिक विज्ञानरूप बुद्धि ही प्रतिक्षण सर्प रूप से प्रतीत होती है । इसे ही "आत्मख्याति' कहते हैं । आत्मख्याति का अर्थ है—क्षणिक विज्ञानरूप बुद्धि ( ज्ञान ) का सर्परूप में भाव या कथन ।
न्याय-वैशेषिक—अन्यथाख्याति ( विपरीतख्याति ) मानते हैं न्याय-वैशेषिक और जैन दार्शनिकों का कहना है कि बाह्य पदार्थ को 'शून्यरूप' या 'ज्ञानरूप'
| न्याय-वैशेषिक | या 'सत् रूप' कहना उचित नहीं है । इन्द्रिय के गुण-दोष के बल पर पदार्थ ( वस्तु ) के यथार्थ या अयथार्थ ज्ञान का निर्णय किया जाता है । इनके मत |
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में भ्रम विषयीमूलक है, विषयमूलक नहीं । तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति होती है, किन्तु पदार्थ ज्यों-का-त्यों बना रहता है । उद्योतकर ने कहा है कि मृग-मरीचिक स्थल में रवि किरणों का सद्भाव तथा स्पन्दन व्यापार भी यथार्थ है । अतः 'अर्थ' का व्यभिचार नहीं है । बल्कि 'ज्ञान' का ही व्यभिचार होता है । मरीचि में जल की कल्पना करने में बौद्धों की 'असत्ख्याति' या 'आत्मख्याति का' कोई उपयोग नहीं होगा । किन्तु इन्द्रियदोष के कारण मरीचि में जल के धर्मों का स्मरण होता है । जल के धर्म का मानसिक उदय होते ही जहाँ-जहाँ जल का पूर्वानुभव हुआ है, वहाँ-वहाँ के जल का अलौकिक प्रत्यक्ष हो जाता है । इस अलौकिक प्रत्यक्ष से देखे हुए जल के गुणों का आरोप समीप-वर्ती मरीचि में कर दिया जाता है । इसी को 'अन्यथाख्याति' अर्थात् दूसरे के ( अन्य वस्तु के ) धर्मों ( गुणों ) का दूसरी ( अन्य ) वस्तु में प्रतीत होना कहते हैं ।
सांख्यदर्शन सदसत्-ख्याति मानता है । सांख्यदर्शन के मत में बाह्य. पदार्थ का अनुभव बुद्धिवृत्ति के द्वारा होता है, किन्तु बाह्य पदार्थ की सत्ता उसे मान्य