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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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है। वह विज्ञानवादियों के समान बाह्य पदार्थ की सत्ता का निषेध नहीं करता। सांख्य उसी ज्ञान को 'यथार्थ' कहता है जहाँ बुद्धि में आरोपित पदार्थ का स्वरूप बाह्य जगत् में विद्यमान उस पदार्थ के रूप के साथ एकाकार रहता है। 'भ्रम' के सम्बन्ध में सांख्य का कहना है कि माध्यमिक बौद्ध, प्राभाकरमीमांसक, वेदान्ती और नैयायिकों के सिद्धान्त अनुचित हैं। शुक्ति में रजत का ज्ञान 'इदं रजतम्' के रूप में होता है, तब 'इदम्' का 'सत्' और 'रजत' का ज्ञान 'असत्' होता है।

सांख्य

'इदम्' ज्ञान का आश्रय चाक्षुष-प्रत्यक्ष का विषय रहता है। इसलिये वह 'सत्' ( विद्यमान ) है। और 'रजत ज्ञान' का आश्रय हमारे इन्द्रियों के परे है अर्थात् उनका विषय नहीं है। तथा 'नेदं रजतम्' इत्याकारक ज्ञान के द्वारा उत्तरकाल ( अग्रिम क्षण ) में बाधित भी होता है, इसलिये वह 'असत्' है। एवं च भ्रम-ज्ञान, सत्-असत् उभयविध पदार्थों पर आश्रित रहता है। यह सदसत्ख्यातिवाद अनिरुद्ध के अनुसार है। किन्तु विज्ञानभिक्षु के अनुसार सभी पदार्थ नित्य होने से स्वरूपतः उनका बाध नहीं है, परन्तु 'चैतन्य' में आरोपित होने पर संसर्गतः उनका बाध होता है। जैसे—सराफा बाजार में रजत सद्रूप से विद्यमान होने के कारण स्वरूपतः अबाधित है। परन्तु शुक्ति में 'अध्यस्त रजत' असत् है, क्योंकि संसर्गतः उसका बाध होता है। उसी तरह जगत् भी स्वरूपतः सत् है, परन्तु चैतन्य में अध्यस्त होने पर वह असत् है, एवं च जगत् सदसदात्मक है। इस तरह सांख्य का सदसत्ख्यातिवाद है।

प्राभाकर मीमांसक अख्याति मानते हैं। 'अख्यातिवाद' को स्वीकार कर इन्होंने 'शून्यवादी' तथा 'क्षणिकविज्ञानवादियों' का खण्डन किया है। शून्यवादियों के द्वारा प्रतिपादित 'असत् ( असत्य ) ख्याति' शशशृङ्ग या आकाश-पुष्प या वन्ध्या-पुत्र के समान ही है। क्षणिकविज्ञानवादी के मत से यदि क्षणिक विज्ञान ही सर्प के आकार में प्रतीत होता है तो क्षणमात्र से अधिक उसकी प्रतीति नहीं होनी चाहिये। अतः उनकी आत्मख्याति भी उचित नहीं है।

प्राभाकर मीमांसक

प्राभाकर मीमांसकों का कहना है कि सभी ज्ञान यथार्थ ही होते हैं। तथापि शुक्ति में रजत का भ्रम अथवा रस्सी पर सर्प का भ्रम जो होता है, उसका कारण 'विवेकाऽग्रह' ( भेद का अज्ञान ) है। 'इदं रजतम्' इस भ्रम में 'इदम्' अंश तो प्रत्यक्षज्ञान का विषय है। चक्षुरिन्द्रिय तो 'इदम्' पदार्थ के अस्तित्व की सूचना देकर अपना काम समाप्त कर देता है। वहाँ पर 'रजत' पदार्थ के विद्यमान न रहने से 'रजत' अंश तो प्रत्यक्ष का विषय नहीं हो पाता। तथापि वहाँपर 'रजत' का भान जो हो रहा है, वह वास्तव में अन्यत्र देखे गये रजत का स्मरण है। दोनों अपनी-अपनी जगह सत्य हैं, किन्तु स्मृतिप्रमोष ( स्मरण-शक्ति के दोष ) के कारण दृश्यमान 'इदम्' पदार्थ तथा स्मर्यमाण 'रजत' पदार्थ के पारस्परिक