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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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विवेकाग्रह अर्थात् भेदग्रहण न हो सकने से (भेद के ज्ञान का अभाव होने से) ही यह 'भ्रम' उत्पन्न होता है। अर्थात् प्रत्यक्षज्ञान के तुल्य ही रजत तथा शुक्तिरूप विषयों में विवेक-ग्रहण न हो पाने से भ्रमज्ञान को अवसर मिल जाता है। शुक्तिज्ञान तथा रजतज्ञान दोनों अपने-अपने विषयों में यथार्थ हैं। यह विवेकाग्रहरूप दोष केवल अभावात्मक है अर्थात् उभय ज्ञानों के भेद का अभाव-मात्र है। इसलिये इसे भ्रम नहीं कहा जा सकता। यदि इसे भ्रम कहा जाय तो इसकी भावात्मक (वास्तविक) प्रतीति होती। उसके न होने से उसे 'भ्रम' नहीं कह सकते। अतः प्राभाकरमीमांसक इस स्थिति को अख्यातिवाद के नाम से कहते हैं। इन्हें भ्रम की सत्ता मान्य नहीं है।

किन्तु भाट्टमीमांसक, और मुरारिमिश्र, दोनों 'नैयायिकों' के मत को स्वीकार करते हैं। वे प्राभाकर मत से सहमत नहीं हैं। भाट्ट मीमांसकों का कहना है कि 'भ्रम' केवल विवेकाग्रह (भेदज्ञान का अभाव) मात्र नहीं है। 'शुक्ति-रजत' स्थल में शुक्ति का ज्ञान शुक्तित्वप्रकारक होता है। और 'रजत का ज्ञान' रजतत्व प्रकारक होता है। 'शुक्तित्व' और 'रजतत्व ये धर्म-विशेष हैं। ये शुक्ति और रजत में तादात्म्य सम्बन्ध से रहते हैं। उन्हें अपने अपने धर्मों से कथमपि पृथक् नहीं किया जा सकता। किन्तु शुक्ति में रजतत्व प्रकारक ज्ञान होने लगता है अर्थात् अन्य विषय में अन्य प्रकारक ज्ञान होता है। वास्तव में विषय के अनुरूप ही प्रकार का ज्ञान होना चाहिये। इसलिये अन्यथा (भिन्न रूप से ज्ञान होने से इस 'ज्ञान' को अन्यथाख्याति नाम से नैयायिकों ने कहा है, इसे ही भाट्टमीमांसकों ने विपरीतख्याति नाम दिया है। क्योंकि इसमें 'अकार्य का कार्य रूप से' भान होता है। इसी को हम और सरल एवं स्पष्ट भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं कि कभी कभी मिथ्याविषय (रज्जु में कल्पित सर्प) भी प्रत्यक्ष की तरह भासित होने लगता है। नेत्र की कनीनिका (पुतली) को दबाकर देखने से दो चाँद दिखाई देने लगते हैं। अथवा मन्दान्धकार में 'रज्जु' में 'सर्प का भास' होने लगता है। भाट्टमीमांसक कहते हैं कि जब कोई 'रज्जु' में 'सर्प को देखता है और कहता है कि 'यह सर्प' है, तो वहाँ उद्देश्य और विधेय दोनों ही सत्य हैं। संसार में 'रज्जु' और 'साँप' दोनों की सत्ता विद्यमान है। फिर भी भ्रम इस कारण होता है कि हम पृथक् पृथक् रहनेवाले 'दो सत् पदार्थों' में उद्देश्य-विधेय का सम्बन्ध जोड़ देते हैं। इसी 'संसर्ग को लेकर भ्रम होता है। विषयों को लेकर भ्रम नहीं होता। क्योंकि विषय (पदार्थ) तो वास्तविक हैं। 'द्विचन्द्र ज्ञान' में भी 'आकाश' के दो वास्तविक भागों का सम्बन्ध 'चन्द्रमा' के साथ जोड़ दिया जाता है। उस कारण एक ही चन्द्रमा दो जगह भासित होने लगता है। इस विपर्यय के कारण लोग विपरीत आचरण कर बैठते हैं। इसलिये भाट्टमीमांसकों ने ऐसे स्थलों