भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

( २६ )

पर होनेवाले ज्ञान को विपरीतख्याति नाम से कहा है। इस विपरीतख्याति ( ज्ञान ) के कारण अकार्य में कार्यता का भान ( अकार्यस्य कार्यतया भानम् अर्थात् जो नहीं करना चाहिये वह करने योग्य प्रतीत होता है) होने लगता है।

भाट्ट और प्राभाकर मत में अन्तर भ्रमज्ञान के सम्बन्ध में भाट्ट और प्राभाकर मत में अन्तर यह है कि प्राभाकर मीमांसक किसी भी ज्ञान में 'भ्रम' की सत्ता स्वीकार नहीं करते किन्तु भाट्टमीमांसक भ्रम की सत्ता' स्वीकार करते हैं। भाट्टमीमांसकों का कहना है कि 'भ्रम' विषयों को लेकर नहीं, अपितु उनके संसर्ग को लेकर होता है। इनकी विपरीतख्याति और नैयायिकों की अन्यथाख्याति में बहुत कुछ सादृश्य उपलब्ध होता है। भाट्ट का कहना है कि भ्रम का प्रभाव ज्ञान की अपेक्षा व्यवहार पर अधिक पड़ता है। भ्रमज्ञान एक अपवाद है। सर्वसाधारण नियम तो यही है कि 'ज्ञान' सत्य का दर्शन कराता है। इसी विश्वास पर संसार के दैनिक व्यवहार चलते रहते हैं।

वेदान्ती वेदान्त अनिर्वचनीयख्याति मानता है। इसका कहना है कि अन्तःकरण की वृत्ति चक्षुरिन्द्रिय के मार्ग से निकलकर विषय के साथ सम्बद्ध होती है और विषयाकार बन जाती है। रज्जु-सर्प स्थल में 'अन्तःकरण' की वृत्ति चक्षुरिन्द्रिय के मार्ग से निकलकर रज्जु के साथ सम्बद्ध होती है, किन्तु 'मन्दान्धकार' प्रतिबन्धक होने से वह 'वृत्ति' रज्जु के वास्तविक स्वरूप को ग्रहण नहीं कर पाती। इसलिये रज्जु का 'आवरण' दूर नहीं हो पाता। 'आवरण दूर न हो पाने से' रज्जु से अवच्छिन्न चैतन्य में स्थित अविद्या में क्षोभ होकर वह 'अविद्या' ही सर्पाकार में परिणत हो जाती है। अविद्या से प्रतीयमान 'सर्प' यदि सत् होता तो रज्जु का ज्ञान होने पर उसका बाध न होता। बाध तो होता है। अतः वह सत् नहीं है। यदि वह सर्प असत् है तो शशशृङ्ग की तरह इसकी प्रतीति नहीं होती, किन्तु प्रतीति तो होती है। इसलिये उसे असत् भी नहीं कह सकते। एवं च 'सत्-असत् उभय विलक्षण' होने से वह अनिर्वचनीय है। इस प्रकार से 'पांच ख्यातियों' को दार्शनिकों ने बनाया है। इनका संग्रह एक पद्य में भी किया गया है—

"आत्मख्यातिरसतख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथाऽनिर्वचनख्यातिरित्युतख्यातिपञ्चकम् ॥'
योगाचारा माध्यमिकास्तथा मीमांसका अपि ।
नैयायिका मायिनश्च पञ्च ख्यातीः क्रमाज्जगुः ।।

आचार्य शंकर ने 'जगत्' का मिथ्यात्व 'माया' के आधार पर ही सिद्ध किया है। वेदान्त में माया अविद्या और अज्ञान इन तीन शब्दों का प्रयोग अनेक बार होता दिखाई देता है। ये तीनों शब्द समानार्थक है, फिर भी

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 34, कुल 482 में से · BharatKosha