वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २७ )
शंकर के मत में जगत् के मिथ्यात्व का आधार कुछ वेदान्तियों ने माया और अविद्या में भेद बताया है। ईश्वर की उपाधि को 'माया' कहते हैं। 'माया' में शुद्ध सत्त्व की प्रधानता रहती है। 'जीव' की उपाधि को 'अविद्या' कहते हैं। 'अविद्या' में मलिन सत्त्व की प्रधानता रहती है। 'ईश्वर' की उपाधि रूप माया दृश्यमान संसार का उपादान कारण है। जीव की उपाधि रूप अविद्या एक अज्ञानावरण है, यह अज्ञानावरण जगत् के आधार ब्रह्म के अनुपहित (असली) स्वरूप को ढक लेता है। ढक जाने (आवृत होने) के कारण वह 'ब्रह्म' नित्यमुक्त होता हुआ भी अपने को बद्ध सा समझने लगता है। किन्तु कतिपय वेदान्तियों ने माया और अविद्या दोनों को समानार्थक ही माना है। ऐन्द्रजालिक की तरह 'ईश्वर' अविद्या (माया) के द्वारा दृश्यमान नामरूपात्मक संसार को पैदा करता है। इसी 'माया अथवा अविद्या' को 'संसार' का उपादान कारण कहते हैं। इस माया से हम सब लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। किन्तु ईश्वर के लिये वह एक इच्छा मात्र है। ईश्वर स्वयं उस माया से प्रभावित नहीं होता। और हम जैसे अज्ञानी उसे देखकर भ्रम में पड़ जाते हैं और ब्रह्म के बदले अनेक विषय देखने लग जाते हैं। इस प्रकार माया हम लोगों के भ्रम का कारण है। इस अर्थ में माया को अज्ञान या अविद्या भी कहते हैं।
अविद्या की दो शक्तियां इस अविद्या की आवरण और विक्षेप नाम की दो शक्तियां हैं। आवरण शक्ति से वह ब्रह्म के असली स्वरूप को छिपा देती है और विक्षेप शक्ति से उस 'आवृत ब्रह्म को दूसरी वस्तु (संसार) के रूप में आभासित कर देती है। इस विक्षेप शक्ति के कारण 'माया' को भावरूप अज्ञान कहते हैं। यह माया शक्तिरूप में ब्रह्म से भिन्न नहीं है। यह ब्रह्म से उसी तरह अभिन्न है जैसे अग्नि से उष्णता और मन से संकल्प।
शङ्कर के मत में ब्रह्म का अविकारित्व आचार्य शङ्कर के मत से 'ब्रह्म' में कोई वास्तविक विकार (परिवर्तन) नहीं होता, 'विकार केवल प्रातिभासिक होता है किसी द्रव्य के विकार का आभास ही विवर्त' शब्द से कहा जाता है। और वास्तविक विकार को 'परिणाम' शब्द से कहा जाता है।
वेदान्त और सांख्य की प्रकृति में भेद आचार्य शङ्कर ने इस 'माया' को कहीं कहीं 'अव्यक्त' या 'प्रकृति' भी कहा है जो त्रिगुणात्मक है, किन्तु उसे सांख्य की प्रकृति नहीं समझनी चाहिये। सांख्य की प्रकृति का स्वतन्त्र अस्तित्व माना गया है। और वेदान्त की प्रकृति ईश्वर की माया है, और उसी ईश्वर पर सर्वथा आश्रित है।
निर्विशेष शुद्ध ब्रह्म 'माया' के द्वारा अवच्छिन्न होने पर सविशेष या गुण हो जाता है। तब उसे ईश्वर कहते हैं। संसार की उत्पत्ति (सृष्टि) स्थिति,