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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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है। वह विज्ञानवादियों के समान बाह्य पदार्थ की सत्ता का निषेध नहीं करता। सांख्य उसी ज्ञान को 'यथार्थ' कहता है जहाँ बुद्धि में आरोपित पदार्थ का स्वरूप बाह्य जगत् में विद्यमान उस पदार्थ के रूप के साथ एकाकार रहता है। 'भ्रम' के सम्बन्ध में सांख्य का कहना है कि माध्यमिक बौद्ध, प्राभाकरमीमांसक, वेदान्ती और नैयायिकों के सिद्धान्त अनुचित हैं। शुक्ति में रजत का ज्ञान 'इदं रजतम्' के रूप में होता है, तब 'इदम्' का 'सत्' और 'रजत' का ज्ञान 'असत्' होता है।

सांख्य

'इदम्' ज्ञान का आश्रय चाक्षुष-प्रत्यक्ष का विषय रहता है। इसलिये वह 'सत्' ( विद्यमान ) है। और 'रजत ज्ञान' का आश्रय हमारे इन्द्रियों के परे है अर्थात् उनका विषय नहीं है। तथा 'नेदं रजतम्' इत्याकारक ज्ञान के द्वारा उत्तरकाल ( अग्रिम क्षण ) में बाधित भी होता है, इसलिये वह 'असत्' है। एवं च भ्रम-ज्ञान, सत्-असत् उभयविध पदार्थों पर आश्रित रहता है। यह सदसत्ख्यातिवाद अनिरुद्ध के अनुसार है। किन्तु विज्ञानभिक्षु के अनुसार सभी पदार्थ नित्य होने से स्वरूपतः उनका बाध नहीं है, परन्तु 'चैतन्य' में आरोपित होने पर संसर्गतः उनका बाध होता है। जैसे—सराफा बाजार में रजत सद्रूप से विद्यमान होने के कारण स्वरूपतः अबाधित है। परन्तु शुक्ति में 'अध्यस्त रजत' असत् है, क्योंकि संसर्गतः उसका बाध होता है। उसी तरह जगत् भी स्वरूपतः सत् है, परन्तु चैतन्य में अध्यस्त होने पर वह असत् है, एवं च जगत् सदसदात्मक है। इस तरह सांख्य का सदसत्ख्यातिवाद है।

प्राभाकर मीमांसक अख्याति मानते हैं। 'अख्यातिवाद' को स्वीकार कर इन्होंने 'शून्यवादी' तथा 'क्षणिकविज्ञानवादियों' का खण्डन किया है। शून्यवादियों के द्वारा प्रतिपादित 'असत् ( असत्य ) ख्याति' शशशृङ्ग या आकाश-पुष्प या वन्ध्या-पुत्र के समान ही है। क्षणिकविज्ञानवादी के मत से यदि क्षणिक विज्ञान ही सर्प के आकार में प्रतीत होता है तो क्षणमात्र से अधिक उसकी प्रतीति नहीं होनी चाहिये। अतः उनकी आत्मख्याति भी उचित नहीं है।

प्राभाकर मीमांसक

प्राभाकर मीमांसकों का कहना है कि सभी ज्ञान यथार्थ ही होते हैं। तथापि शुक्ति में रजत का भ्रम अथवा रस्सी पर सर्प का भ्रम जो होता है, उसका कारण 'विवेकाऽग्रह' ( भेद का अज्ञान ) है। 'इदं रजतम्' इस भ्रम में 'इदम्' अंश तो प्रत्यक्षज्ञान का विषय है। चक्षुरिन्द्रिय तो 'इदम्' पदार्थ के अस्तित्व की सूचना देकर अपना काम समाप्त कर देता है। वहाँ पर 'रजत' पदार्थ के विद्यमान न रहने से 'रजत' अंश तो प्रत्यक्ष का विषय नहीं हो पाता। तथापि वहाँपर 'रजत' का भान जो हो रहा है, वह वास्तव में अन्यत्र देखे गये रजत का स्मरण है। दोनों अपनी-अपनी जगह सत्य हैं, किन्तु स्मृतिप्रमोष ( स्मरण-शक्ति के दोष ) के कारण दृश्यमान 'इदम्' पदार्थ तथा स्मर्यमाण 'रजत' पदार्थ के पारस्परिक

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विवेकाग्रह अर्थात् भेदग्रहण न हो सकने से (भेद के ज्ञान का अभाव होने से) ही यह 'भ्रम' उत्पन्न होता है। अर्थात् प्रत्यक्षज्ञान के तुल्य ही रजत तथा शुक्तिरूप विषयों में विवेक-ग्रहण न हो पाने से भ्रमज्ञान को अवसर मिल जाता है। शुक्तिज्ञान तथा रजतज्ञान दोनों अपने-अपने विषयों में यथार्थ हैं। यह विवेकाग्रहरूप दोष केवल अभावात्मक है अर्थात् उभय ज्ञानों के भेद का अभाव-मात्र है। इसलिये इसे भ्रम नहीं कहा जा सकता। यदि इसे भ्रम कहा जाय तो इसकी भावात्मक (वास्तविक) प्रतीति होती। उसके न होने से उसे 'भ्रम' नहीं कह सकते। अतः प्राभाकरमीमांसक इस स्थिति को अख्यातिवाद के नाम से कहते हैं। इन्हें भ्रम की सत्ता मान्य नहीं है।

किन्तु भाट्टमीमांसक, और मुरारिमिश्र, दोनों 'नैयायिकों' के मत को स्वीकार करते हैं। वे प्राभाकर मत से सहमत नहीं हैं। भाट्ट मीमांसकों का कहना है कि 'भ्रम' केवल विवेकाग्रह (भेदज्ञान का अभाव) मात्र नहीं है। 'शुक्ति-रजत' स्थल में शुक्ति का ज्ञान शुक्तित्वप्रकारक होता है। और 'रजत का ज्ञान' रजतत्व प्रकारक होता है। 'शुक्तित्व' और 'रजतत्व ये धर्म-विशेष हैं। ये शुक्ति और रजत में तादात्म्य सम्बन्ध से रहते हैं। उन्हें अपने अपने धर्मों से कथमपि पृथक् नहीं किया जा सकता। किन्तु शुक्ति में रजतत्व प्रकारक ज्ञान होने लगता है अर्थात् अन्य विषय में अन्य प्रकारक ज्ञान होता है। वास्तव में विषय के अनुरूप ही प्रकार का ज्ञान होना चाहिये। इसलिये अन्यथा (भिन्न रूप से ज्ञान होने से इस 'ज्ञान' को अन्यथाख्याति नाम से नैयायिकों ने कहा है, इसे ही भाट्टमीमांसकों ने विपरीतख्याति नाम दिया है। क्योंकि इसमें 'अकार्य का कार्य रूप से' भान होता है। इसी को हम और सरल एवं स्पष्ट भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं कि कभी कभी मिथ्याविषय (रज्जु में कल्पित सर्प) भी प्रत्यक्ष की तरह भासित होने लगता है। नेत्र की कनीनिका (पुतली) को दबाकर देखने से दो चाँद दिखाई देने लगते हैं। अथवा मन्दान्धकार में 'रज्जु' में 'सर्प का भास' होने लगता है। भाट्टमीमांसक कहते हैं कि जब कोई 'रज्जु' में 'सर्प को देखता है और कहता है कि 'यह सर्प' है, तो वहाँ उद्देश्य और विधेय दोनों ही सत्य हैं। संसार में 'रज्जु' और 'साँप' दोनों की सत्ता विद्यमान है। फिर भी भ्रम इस कारण होता है कि हम पृथक् पृथक् रहनेवाले 'दो सत् पदार्थों' में उद्देश्य-विधेय का सम्बन्ध जोड़ देते हैं। इसी 'संसर्ग को लेकर भ्रम होता है। विषयों को लेकर भ्रम नहीं होता। क्योंकि विषय (पदार्थ) तो वास्तविक हैं। 'द्विचन्द्र ज्ञान' में भी 'आकाश' के दो वास्तविक भागों का सम्बन्ध 'चन्द्रमा' के साथ जोड़ दिया जाता है। उस कारण एक ही चन्द्रमा दो जगह भासित होने लगता है। इस विपर्यय के कारण लोग विपरीत आचरण कर बैठते हैं। इसलिये भाट्टमीमांसकों ने ऐसे स्थलों

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पर होनेवाले ज्ञान को विपरीतख्याति नाम से कहा है। इस विपरीतख्याति ( ज्ञान ) के कारण अकार्य में कार्यता का भान ( अकार्यस्य कार्यतया भानम् अर्थात् जो नहीं करना चाहिये वह करने योग्य प्रतीत होता है) होने लगता है।

भाट्ट और प्राभाकर मत में अन्तर भ्रमज्ञान के सम्बन्ध में भाट्ट और प्राभाकर मत में अन्तर यह है कि प्राभाकर मीमांसक किसी भी ज्ञान में 'भ्रम' की सत्ता स्वीकार नहीं करते किन्तु भाट्टमीमांसक भ्रम की सत्ता' स्वीकार करते हैं। भाट्टमीमांसकों का कहना है कि 'भ्रम' विषयों को लेकर नहीं, अपितु उनके संसर्ग को लेकर होता है। इनकी विपरीतख्याति और नैयायिकों की अन्यथाख्याति में बहुत कुछ सादृश्य उपलब्ध होता है। भाट्ट का कहना है कि भ्रम का प्रभाव ज्ञान की अपेक्षा व्यवहार पर अधिक पड़ता है। भ्रमज्ञान एक अपवाद है। सर्वसाधारण नियम तो यही है कि 'ज्ञान' सत्य का दर्शन कराता है। इसी विश्वास पर संसार के दैनिक व्यवहार चलते रहते हैं।

वेदान्ती वेदान्त अनिर्वचनीयख्याति मानता है। इसका कहना है कि अन्तःकरण की वृत्ति चक्षुरिन्द्रिय के मार्ग से निकलकर विषय के साथ सम्बद्ध होती है और विषयाकार बन जाती है। रज्जु-सर्प स्थल में 'अन्तःकरण' की वृत्ति चक्षुरिन्द्रिय के मार्ग से निकलकर रज्जु के साथ सम्बद्ध होती है, किन्तु 'मन्दान्धकार' प्रतिबन्धक होने से वह 'वृत्ति' रज्जु के वास्तविक स्वरूप को ग्रहण नहीं कर पाती। इसलिये रज्जु का 'आवरण' दूर नहीं हो पाता। 'आवरण दूर न हो पाने से' रज्जु से अवच्छिन्न चैतन्य में स्थित अविद्या में क्षोभ होकर वह 'अविद्या' ही सर्पाकार में परिणत हो जाती है। अविद्या से प्रतीयमान 'सर्प' यदि सत् होता तो रज्जु का ज्ञान होने पर उसका बाध न होता। बाध तो होता है। अतः वह सत् नहीं है। यदि वह सर्प असत् है तो शशशृङ्ग की तरह इसकी प्रतीति नहीं होती, किन्तु प्रतीति तो होती है। इसलिये उसे असत् भी नहीं कह सकते। एवं च 'सत्-असत् उभय विलक्षण' होने से वह अनिर्वचनीय है। इस प्रकार से 'पांच ख्यातियों' को दार्शनिकों ने बनाया है। इनका संग्रह एक पद्य में भी किया गया है—

"आत्मख्यातिरसतख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथाऽनिर्वचनख्यातिरित्युतख्यातिपञ्चकम् ॥'
योगाचारा माध्यमिकास्तथा मीमांसका अपि ।
नैयायिका मायिनश्च पञ्च ख्यातीः क्रमाज्जगुः ।।

आचार्य शंकर ने 'जगत्' का मिथ्यात्व 'माया' के आधार पर ही सिद्ध किया है। वेदान्त में माया अविद्या और अज्ञान इन तीन शब्दों का प्रयोग अनेक बार होता दिखाई देता है। ये तीनों शब्द समानार्थक है, फिर भी

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शंकर के मत में जगत् के मिथ्यात्व का आधार कुछ वेदान्तियों ने माया और अविद्या में भेद बताया है। ईश्वर की उपाधि को 'माया' कहते हैं। 'माया' में शुद्ध सत्त्व की प्रधानता रहती है। 'जीव' की उपाधि को 'अविद्या' कहते हैं। 'अविद्या' में मलिन सत्त्व की प्रधानता रहती है। 'ईश्वर' की उपाधि रूप माया दृश्यमान संसार का उपादान कारण है। जीव की उपाधि रूप अविद्या एक अज्ञानावरण है, यह अज्ञानावरण जगत् के आधार ब्रह्म के अनुपहित (असली) स्वरूप को ढक लेता है। ढक जाने (आवृत होने) के कारण वह 'ब्रह्म' नित्यमुक्त होता हुआ भी अपने को बद्ध सा समझने लगता है। किन्तु कतिपय वेदान्तियों ने माया और अविद्या दोनों को समानार्थक ही माना है। ऐन्द्रजालिक की तरह 'ईश्वर' अविद्या (माया) के द्वारा दृश्यमान नामरूपात्मक संसार को पैदा करता है। इसी 'माया अथवा अविद्या' को 'संसार' का उपादान कारण कहते हैं। इस माया से हम सब लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। किन्तु ईश्वर के लिये वह एक इच्छा मात्र है। ईश्वर स्वयं उस माया से प्रभावित नहीं होता। और हम जैसे अज्ञानी उसे देखकर भ्रम में पड़ जाते हैं और ब्रह्म के बदले अनेक विषय देखने लग जाते हैं। इस प्रकार माया हम लोगों के भ्रम का कारण है। इस अर्थ में माया को अज्ञान या अविद्या भी कहते हैं।

अविद्या की दो शक्तियां इस अविद्या की आवरण और विक्षेप नाम की दो शक्तियां हैं। आवरण शक्ति से वह ब्रह्म के असली स्वरूप को छिपा देती है और विक्षेप शक्ति से उस 'आवृत ब्रह्म को दूसरी वस्तु (संसार) के रूप में आभासित कर देती है। इस विक्षेप शक्ति के कारण 'माया' को भावरूप अज्ञान कहते हैं। यह माया शक्तिरूप में ब्रह्म से भिन्न नहीं है। यह ब्रह्म से उसी तरह अभिन्न है जैसे अग्नि से उष्णता और मन से संकल्प।

शङ्कर के मत में ब्रह्म का अविकारित्व आचार्य शङ्कर के मत से 'ब्रह्म' में कोई वास्तविक विकार (परिवर्तन) नहीं होता, 'विकार केवल प्रातिभासिक होता है किसी द्रव्य के विकार का आभास ही विवर्त' शब्द से कहा जाता है। और वास्तविक विकार को 'परिणाम' शब्द से कहा जाता है।

वेदान्त और सांख्य की प्रकृति में भेद आचार्य शङ्कर ने इस 'माया' को कहीं कहीं 'अव्यक्त' या 'प्रकृति' भी कहा है जो त्रिगुणात्मक है, किन्तु उसे सांख्य की प्रकृति नहीं समझनी चाहिये। सांख्य की प्रकृति का स्वतन्त्र अस्तित्व माना गया है। और वेदान्त की प्रकृति ईश्वर की माया है, और उसी ईश्वर पर सर्वथा आश्रित है।

निर्विशेष शुद्ध ब्रह्म 'माया' के द्वारा अवच्छिन्न होने पर सविशेष या गुण हो जाता है। तब उसे ईश्वर कहते हैं। संसार की उत्पत्ति (सृष्टि) स्थिति,

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संसार का कारण सगुण ब्रह्म और लय का कारण यही ईश्वर है। सर्वकाम, सर्वज्ञ ईश्वर का यह सृष्टि व्यापार केवल उसका लीला-विलासमात्र है। नैयायिकों ने 'ईश्वर' को जगत् का केवल निमित्त कारण माना है, किन्तु वेदान्तियों ने 'ईश्वर' को जगत् का उपादान एवं निमित्तकारण दोनों ही माना है। उपादान कारण होने से एकता रहने पर भी दोनों (आत्मा-

ब्रह्म और जगत् में व्यावहारिक भेद जगत्) में भोक्तृ-भोग्य भाव का समुद्र-लहरियों के समान या मिट्टी-घड़े के समान व्यावहारिक भेद भी रहता है। एवं च ब्रह्म और जगत् में वस्तुतः अभेद रहने पर भी व्यावहारिक भेद रहता ही है। अतएव आचार्य शंकर कहते हैं— 'यद्यपि भेदाऽपगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥' एवञ्च जीव-ईश्वर की कल्पना व्यावहारिक होने से दोनों मायिक हैं। यह सब उपाधि का खेल है।

'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य' को जीव कहते हैं। आचार्य शंकर के शब्दों में शरीर तथा इन्द्रियसम्मूह के अध्यक्ष और कर्मफलके भोक्ता आत्माको जीव कहते हैं।

वैशेषिकदर्शनकार ने चैतन्य को आत्मा का कादाचित्क गुण माना है किन्तु वेदान्त ने आत्मा को चैतन्यरूप ही माना है। क्योंकि उपाधि के सम्पर्क से परब्रह्म ही जीवभाव को प्राप्त होता है। आत्मा का ब्रह्म के साथ स्वाभाविक ऐक्य है। कुछ लोग आत्मा को अणु कहते हैं। किन्तु

चैतन्य के सम्बन्ध में वैशेषिक और वेदान्तियों का मतभेद आचार्य शंकर परब्रह्म के विभु होने से तद् व्यपदेश आत्मा का भी विभुपरिमाण मानते हैं। आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होने से कहीं-कहीं उसे सूक्ष्म के अर्थ में अणु कहा गया है। यह आत्मचैतन्य जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में तथा अन्नमय, मनोमय प्राणमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय इन पांच में उपलब्ध होता है। किन्तु शुद्ध निर्विशेष चैतन्य उक्त पांचों कोषों से परे है। यह शुद्ध निर्विशेष चैतन्य

आत्मचैतन्य और शुद्ध चैतन्य की स्थिति (शुद्धसत्ता) अपरिणामी रहता हुआ भी अनिर्वचनीय शक्ति के द्वारा अपने को अनेक रूपों में उद्भासित करता है। उसी को मायाशक्तिसम्पन्न सृष्टिकर्ता ईश्वर कहते हैं। यही सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर सगुण ब्रह्म है। समस्त संसार का यही ईश्वर संहारकर्ता भी है। सगुण ब्रह्म की तीन अवस्थाएँ और उनसे परे निर्गुण ब्रह्म की अवस्था समझनी चाहिये।

चैतन्य की चार अवस्थाएं इस रीति से ब्रह्म चैतन्य की चार अवस्थाएं होती हैं:— (१) परब्रह्म (शुद्ध सत्-चित्स्वरूप), (२) ईश्वर,

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( ३ ) हिरण्यगर्भ और ( ४ ) वैश्वानर। आपाततः ये चार अवस्थाएँ क्रमिक-सी लगती हैं। तथापि ये एक साथ ही कही जा सकती हैं। क्योंकि शुद्धचैतन्य (शुद्धसत्ता) का कभी लोप नहीं होता।

शांकर का विशुद्ध अद्वैतवाद
आचार्य शंकर का विशुद्ध अद्वैतवाद' है। इनके अनुसार एक विषय का दूसरे विषय से भेद, ज्ञाता-ज्ञेय का भेद, जीव-ईश्वर का भेद—ये सब माया के खेल हैं। इनके मत से 'एक ही सत् तत्त्व' है और 'अनेकत्व' मिथ्या है। अतएव जीव-ब्रह्म की एकता को बार-बार बताया गया है।

प्रत्यक्ष दृश्यमान यह शरीर अन्यान्य भौतिक विषयों के समान माया की सृष्टि है, यह ज्ञात हो जाने पर आत्मा और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं, यह समझ में आ जाता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ जब समझ में आ जाता है तब जीवात्मा और ब्रह्म में अभेद सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है। अर्थात् जीवात्मा, ब्रह्म से अभिन्न है, यह ज्ञात हो जाता है। अतएव 'त्वम्' से जीव का अधिष्ठान शुद्ध-चैतन्य और 'तत्' से परोक्ष तत्त्व का अधिष्ठान भी शुद्ध-चैतन्य है। अतः दोनों में पूर्णतया अभिन्नता है, यही वेदान्त का सिद्धान्त है।

वेदान्त का सिद्धान्त
जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' यहाँ पर तत्कालिक और एतत्कालिक दो विरुद्ध विशेषणों से रहित देवदत्त आदि मनुष्य एक ही है, उसी तरह 'तत्' अर्थात् परोक्षत्व, सर्वज्ञत्व आदि उपाधियों (विशेषणों) से विशिष्ट चैतन्य (ब्रह्म) और 'त्वम्' अर्थात् अल्पज्ञत्व, अपरोक्षत्व आदि उपाधियों (विशेषणों) से विशिष्ट चैतन्य (जीव) इन दोनों के विरुद्ध अंशों को त्याग कर उभयनिष्ठ शुद्धचैतन्य का अभेद (ऐक्य) है—यही 'तत्त्वमसि' महावाक्य का तात्पर्य समझना चाहिये। जीव और ब्रह्म आपाततः भिन्न प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः अभिन्न हैं। इस तादात्म्य का ज्ञान कराने के लिये ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य का उपदेश दिया जाता है।

'तत्त्वमसि' महावाक्य का तात्पर्य

असीम का ससीम के समान भान होने में हेतु
अनन्त (असीम) आत्मा सीमित जीवात्मा की तरह भासित होने का कारण, शरीर के साथ उसका सम्बन्ध है, जो अविद्या का कार्य है। दृश्यमान स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है, जो अन्तःकरण, प्राण और इन्द्रियों का समूह है। मृत्यु से स्थूल शरीर का नाश होता है, सूक्ष्म शरीर का नहीं। सूक्ष्म-शरीर आत्मा के साथ दूसरे स्थूल शरीर में चला जाता है। ये दोनों स्थूल-सूक्ष्म शरीर, माया के कार्य हैं। अनादि अविद्या के कारण आत्मा भ्रमवश अपने को ही स्थूल-सूक्ष्म शरीर समझ लेता है। इसी समझ को बन्धन कहते हैं। इस स्थिति में आत्मा अपने

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यथार्थ स्वरूप (वास्तविक स्वरूप) को भूल जाता है, और क्षणभंगुर सांसारिक विषयों के पीछे भागता फिरता है। उन विषयों की उपलब्धि होने पर अपने को सुखी और उपलब्धि न होने पर अपने को दुःखी समझता है। वह आत्मा अपने को शरीर या अन्तःकरण समझकर सोचता है कि 'मैं मोटा हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ।' इस तरह आत्मा में अहंकार (मैं हूँ) उत्पन्न होता है। यह अहम् (मैं) अपने को शेष संसार से पृथक् समझता है। इसी कारण इस 'अहम्' को शुद्ध आत्मा नहीं समझना चाहिये। उस शुद्ध आत्मा का यह एक अविद्याकृत बन्धनमात्र है। शुद्ध आत्मा तो नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त माना जाता है। यही उसका स्वरूप है। ऐसे शुद्ध आत्मा की उत्पत्ति जहाँ कहीं सुनाई देती है, उसका तात्पर्य शरीरादि उपाधियों की उत्पत्तियों से है। नित्य आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होता।

'आत्मस्वरूप के विषय में विभिन्न दार्शनिकों के विभिन्न मत हैं। निद्रित, मूच्छित, ग्रहाविष्ट पुरुषों में कुछ समय तक 'चैतन्याभाव' को देखकर प्रत्यक्ष अनुभव के पक्षपाती वैशेषिक ने 'चैतन्य' को आत्मा का कादाचित्क गुण माना है।

किन्तु वेदान्तदर्शन तो आत्मा को चैतन्यरूप ही मानता है। क्योंकि 'परब्रह्म' ही उपाधि के सम्पर्क से 'जीवभाव' को प्राप्त होता है। अतः 'आत्मा' और 'ब्रह्म' का स्वाभाविक ऐक्य होने के कारण नित्य-चैतन्य का अनंगीकार नहीं किया जा सकता। भेद तो केवल उपाधि से प्रतीत होता है। जैसे—'स्थूल शरीर', 'सूक्ष्म शरीर', और 'कारण शरीर', की व्यष्टि के अभिमानी जीव को 'विश्व', 'तैजस', और 'प्राज्ञ' कहा जाता है। और इन्हीं शरीरों की समष्टि के अभिमानी ईश्वर को 'वैश्वानर' (विराट्) 'सूत्रात्मा' (हिरण्यगर्भ), और 'ईश्वर' कहा जाता है। इसी स्थूल शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'अन्नमयकोष' और 'जाग्रत अवस्था' कहते हैं। सूक्ष्म-शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'मनोमय', 'प्राणमय' 'विज्ञानमयकोष', और 'स्वप्न अवस्था' कहते हैं। कारण शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'आनन्दमयकोष', और 'सुषुप्तिअवस्था' कहते हैं। वास्तव में 'व्यष्टि' तथा 'समष्टि' के अभिमानी पुरुष आपस में अभिन्न हैं। किन्तु 'आत्मा' इन तीनों से परे स्वतन्त्र सत्ता है। यह साक्षी आत्म-चैतन्य, 'अहङ्कार', 'विषय' तथा 'बुद्धि' को प्रकाशित करता है और इनके अभाव में स्वतः प्रकाशित होता है।

'जीव' और 'ईश्वर' के स्वरूप का निरूपण वेदान्तियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। कुछ लोग 'जीव'-'ईश्वर' में सामान्य रूप से रहनेवाले चैतन्य

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जीव और ईश्वर के स्वरूप पर वेदान्तियों के भिन्न-भिन्न मत<br><br>संक्षेप शारीरककार...को बिम्ब मानकर उसी का प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न 'उपाधियों' में गिरने से उन बिम्ब-प्रतिबिम्बोंको भिन्न-भिन्न संज्ञाओं से कहते हैं । बिम्ब चैतन्य का वह 'प्रतिबिम्ब जो माया या अविद्या में गिरता है, उसे 'ईश्वर चैतन्य कहा है और जो प्रतिबिम्ब अन्तःकरण में गिरता है उसे 'जीव-चैतन्य' कहा है। इस मत में जीव और ईश्वर में वही अन्तर है जो 'घट तथा 'जलाशय के जल में गिरनेवाले सूर्य-प्रतिबिम्ब में है। अर्थात् 'अज्ञान में प्रतिबिम्बित चैतन्य को ईश्वर तथा बुद्धि में प्रतिबिम्ब चैतन्य को जीव कहा गया है। किन्तु अज्ञानरूप उपाधि से रहित 'बिम्बचैतन्य' शुद्ध है । यह संक्षेप शारीरककार का मत है ।
विवरणकार प्रतिबिम्बवादकिन्तु विवरणकार कहते हैं— 'स्वतन्त्रतादिगुणों' से विशिष्ट होने के कारण ईश्वर चैतन्य बिम्बस्थानापन्न है और 'परतन्त्रतादिगुणों से विशिष्ट होने के कारण अविद्या में चिदाभास 'जीव' है। अर्थात् ईश्वर बिम्बरूप है और जीव प्रतिबिम्बरूप है। इसी को प्रतिबिम्बवाद कहते हैं ।
भामतीकार का अवच्छेदवादभामतीकार वाचस्पति मिश्र का अवच्छेदवाद है। उनका कहना है कि 'प्रतिबिम्बवाद' के स्वीकार करने में यह दोष है कि 'जीवों का नाश' ही मुक्ति का अर्थ होगा । क्योंकि 'ज्ञान' के द्वारा 'अविद्या' का विनाश होने पर दर्पण के नष्ट होने से प्रतिबिम्ब के विनाश के समान 'अविद्या'-प्रतिबिम्बित जीव' भी नष्ट हो जायेंगे । अतः 'जीव' की सत्ता के सुरक्षार्थ घटाकाश का दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं। जैसे आकाश एक और सर्वव्यापक है, किन्तु भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण घटाकाश ( घड़े के बीच का आकाश ) मठाकाश आदि अनेक रूपों में भासित होता है और व्यवहारसम्पादनार्थ उसके विभाग की कल्पना कर लेते हैं। उसी तरह 'ब्रह्म' एक और सर्वव्यापक है। वही ब्रह्म 'अविद्यारूप उपाधिभेद के कारण नाना जीवों और विषयों के रूप में प्रतीत होता है । वास्तव में विषय-विषय में तथा जीव-जीव में कोई भेद नहीं है । क्योंकि सर्वत्र मूलभूत एक ही शुद्ध चैतन्य की सत्ता स्थित है । नानात्व का केवल भ्रम हैं, क्योंकि उपाधिभूत माया के कारण उस अनन्त का सान्तरूप में आभास होता रहता है। प्रत्येक जीव सान्तरूप में प्रतीत होते हुए भी वास्तव में 'ब्रह्म' से अभिन्न है। अविद्या-रूप उपाधि को तोड़कर सान्तरूप को पा लेना ही मुक्ति ( मोक्ष ) हैं। इसी को अवच्छेदवाद कहते हैं ।

कुछ वेदान्ती आभासवाद मानते हैं । इस मत में एक आत्मा ही सत्य है । आत्मा से भिन्न कोई वस्तु सत्य नहीं है । अतः आत्मा न अन्तर्यामी है, न साक्षी और न जगत्कारण है । तथापि अज्ञानरूप उपाधि से युक्त हुआ आत्मा

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आभासवाद
अज्ञान के साथ तादात्म्य प्राप्त कर उसमें पड़े चिदाभास के कारण अन्तर्यामी, साक्षी, ईश्वर कहलाता है। इसे बुद्धि-उपहित तादात्म्य को प्राप्त कर बुद्धिगत 'स्वकीय चिदाभास' को न जानकर जीव कर्ता, भोक्ता, तथा प्रमाता कहा जाता है। इसे आभासवाद कहते हैं। इस मत के अनुसार 'जीव नाना' हैं और ईश्वर एक है।

कुछ वेदान्ती जीवैक्यवाद मानते हैं। इनका कहना है कि 'अज्ञानरूप उपाधि से रहित शुद्धचैतन्य ईश्वर है, और अज्ञानरूप उपाधि से उपहित ( युक्त ) चैतन्य' जीव है। 'जीव' ही अपने अज्ञान के अधीन होकर जगत् का उपादान तथा निमित्त कारण बनता है। देहभेद से जीवभेद ( नाना जीव ) की प्रतीति केवल भ्रम है। वास्तव में जीव एक ही है। इस एक ही आत्मा (जीव) की गुरूपदेश से तथा शास्त्रविहित श्रवण-मननादि उपायों से मुक्ति ( मोक्ष ) होती है। शुक-वामदेवादि की मुक्ति का वर्णन अर्थवाद मात्र है। इस जीवैक्यवाद को ही 'दृष्टिसृष्टिवाद' कहते हैं। उक्त प्रतिबिम्बवाद में भी कतिपय वेदान्तियों के प्रतिबिम्ब के सम्बन्ध में विभिन्न मत पाये जाते हैं। विद्यारण्य 'प्रतिबिम्ब' को मिथ्या मानते हैं। क्योंकि इनके मत से दर्पण में अनिर्वचनीय मुखाभास की उत्पत्ति होती है उसे न छाया कह सकते हैं और न स्वतन्त्र द्रव्य ही कह सकते हैं तथा तद्गत 'तूला अविद्या' उसका उपादान कारण है। अतः आभास का ही नामान्तर प्रतिबिम्ब है, दर्पणावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है किन्तु विवरणकार प्रकाशात्मयति का कहना है कि 'प्रतिबिम्ब' का बिम्ब के साथ अभेद होने से प्रतिबिम्ब का स्वरूप सत्य है। इनके मत में मुखावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है

( जीवैक्यवाद दृष्टि-सृष्टिवाद )
और तद्गत 'तूला अविद्या' प्रतिबिम्ब का उपादान कारण है। आभासवाद और प्रतिबिम्बवाद में भेद इतना ही है कि आभासवाद में प्रतिबिम्ब अनिर्वचनीय है और उसका अधिष्ठान दर्पणादि उपाधि है, और विवरणकार के प्रतिबिम्बवाद में दर्पणस्थत्व और विपरीतदेशाभिमुखत्वादि धर्म अनिर्वचनीय हैं और उनका अधिष्ठान मुखादिक बिम्ब हैं इसलिये दोनों पक्षों में अनिर्वचनीयों का परिणामी उपादानकारण 'अज्ञान' ही है। यद्यपि प्रतिबिम्बवादी दोनों हैं तथापि प्रतिबिम्ब के मिथ्यात्व सत्यत्व के भेदमात्र से विद्यारण्यस्वामी 'आभासवादी' कहलाते हैं और प्रकाशात्मयति विवरणकार 'प्रतिबिम्बवादी' कहलाते हैं। संक्षेपशारीरककार सर्वज्ञात्म मुनि भी प्रतिबिम्बवादी हैं। इनके मत में अज्ञान एक ही है नाना नहीं। जैसे अनेक अनित्य व्यक्तियों में एक नित्य जाति रहती है अर्थात् जो-जो व्यक्ति नष्ट होती जाती है, उस-उस व्यक्ति को छोड़कर जाति अन्य व्यक्तियों के आश्रित टिकी रहती है, वैसे ही अनेक व्यक्तियों में एक ही अज्ञान रहता है। अतः एक अज्ञान के पक्ष में एक जीव के ज्ञानी हो जाने पर सभी जीवों के ज्ञानी हो जाने की शंका नहीं की जा सकती।

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जो-जो व्यक्ति ज्ञानी होता जाता है, उस-उस को छोड़कर अन्य व्यक्तियों में अज्ञान बना रहता है। अर्थात् एक के ज्ञानी हो जाने पर सभी ज्ञानी नहीं होते।

कतिपय वेदान्तियों ने एक अज्ञान के होने पर भी उसके कार्य अनन्त माने हैं। उनका कहना है कि जैसे एक आकाश में पक्षी का भाव और अभाव दोनों रहते हैं, वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्म में अज्ञान है और नहीं भी। अज्ञान एक होने पर भी वह सांश है। ज्ञान से उसका अंश नष्ट हो जाता है और अंशान्तर शेष रह जाता है। अतः बद्ध-मुक्त व्यवस्था बन जाती है। कुछ लोगों का मत है कि ईश्वर बद्धजीवों के प्रति मायाजाल फैलाता है और मुक्तपुरुषों के प्रति उसे समेट लेता है। माया का संकोच और विकास स्वाभाविक है। वस्तुतः एक ही अखण्ड वस्तु सत् है। बद्ध-मुक्त व्यवस्था अविद्या का विलासमात्र है। विवरणकार ईश्वर को ही बिम्ब मानते हैं। अतः इनके अनुसार अविद्यागत प्रतिबिम्ब जीव और बिम्बचैतन्य 'ईश्वर' है। इस मत में जीव की स्वतन्त्रता और सर्वज्ञता पर कोई आंच नहीं आने पाती। जो लोग ईश्वर को प्रतिबिम्ब मानते हैं, वे ईश्वर की सर्वज्ञता आदि की सुरक्षा नहीं कर पाते। क्योंकि उपाधि का प्रभाव सर्वदा प्रतिबिम्ब पर पड़ा करता है, बिम्ब पर नहीं। अतः ईश्वर को प्रतिबिम्ब मानने के पक्ष में उसे नित्य निर्दोष कैसे कहा जा सकेगा? अवच्छेदवादी वाचस्पति मिश्र के मत से मायावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है। वेदान्त-परिभाषाकार ने विवरणकार के प्रतिबिम्बवाद का ही आश्रय लिया है। क्योंकि जैसे जल में एक व्यापक रूप आकाश स्वतः रहता है और दूसरा महाकाश का प्रतिबिम्बरूप आकाश भी है, वैसे ही देहधारी प्राणियों में भी जीव और अन्तर्यामी रूप द्विगुणित चैतन्य की उपपत्ति हो सकती है। इस पक्ष में एक जीववाद को लेकर प्रतिकर्म की व्यवस्था जलसूर्यकादि दृष्टान्त से हो जाती है। एवम् इस मत में 'शब्द' से अपरोक्ष ज्ञान होता है। किन्तु वह होता है केवल अधिकारी को ही। अतएव 'दशमस्त्वमसि' आदि वाक्यों से ही भ्रान्त हुए दशम ने अपना प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) किया। दुर्योधन ने द्रौपदी के अन्धे का पुत्र अन्धा' इस वाक्य से ही उसके या पाण्डवों के अभिमान का तत्काल ही साक्षात्कार किया था।

भामतीकार वाचस्पति मिश्र का कहना है कि 'गन्धरसस्पर्शादीनां कीदृशी प्रतिबिम्बता' के अनुसार नीरूप ब्रह्म का प्रतिबिम्बत होना संभव नहीं। अतः घटाकाश के दृष्टान्त से अवच्छेदवाद ही उचित है।

यद्यपि ग्रीवा-स्थित मुख और दर्पणगत मुख में भिन्नता दीखती है, जैसे बिम्बभूत मुख पूर्वाभिमुख हो तो दर्पणगत पश्चिमाभिमुख दीख पड़ता है। तथापि दर्पणगत मुख के लिये 'यह मेरा ही मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। अतः उसमें भेद-प्रत्यक्ष को भ्रम मानना उचित है। क्योंकि दर्पण में बिम्ब से

३ वे० प० भ०

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अतिरिक्त मुख की उत्पत्ति का कोई साधन नहीं है। दर्पणादि उपाधि के अवयवों का वैसा परिणाम होना संभव नहीं। प्रथम तो प्रतिबिम्ब में दीखता हुआ निम्नोन्नत भाव दर्पण का स्पर्श करने से नहीं मालूम होता है, और बिम्ब की अपेक्षा उपाधि के तारतम्य के अनुसार छोटे या बड़े प्रतिबिम्ब दीख पड़ने से बिम्ब की मुहर भी प्रतिबिम्ब को नहीं कह सकते। मुहर की छाप में न्यूनाधिक परिणाम नहीं आ सकता। और बिम्ब से दर्पणादि उपाधि का मुहर की तरह अत्यन्त व्यवधानशून्य संयोग न होने पर भी प्रतिबिम्ब दीख पड़ता है। मुहर की छाप छिद्रशून्य संयोग के बिना नहीं हो सकती। किञ्च बिम्बसन्निधान के हटते ही प्रतिबिम्ब भी नहीं रह जाता। अतः प्रतिबिम्ब को बिम्ब से अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। परन्तु शुक्तिरजत की तरह उसे मिथ्या भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रतीयमान वस्तु का मिथ्यात्व, बाध के पश्चात् ही सिद्ध होता है। शुक्तिरजत स्थल में तो 'यह रजत नहीं है' ऐसा बाध होता है। प्रकृत में 'यह मेरा मुख नहीं है' ऐसा बाध नहीं होता, किन्तु दर्पण में मेरा मुख नहीं है' इस प्रकार देशविशेष के संबन्ध का ही बाध होता है। अतः जीव और ब्रह्म के वास्तविक ऐक्य का होना असङ्गत नहीं है। अमूर्त आकाश का भी प्रतिबिम्ब दीखता है। अतः नीरूप होने पर भी आत्मा का प्रतिबिम्ब हो सकता है। ग्रीवास्थ मुख का दर्पण में दीख पड़ना स्वप्न में अपने शिरश्छेद के दीखने के तुल्य मायामय होने से असंभव नहीं है। जीव तथा ब्रह्म का ऐक्य होते हुए भी जैसे देवदत्त आदि द्रष्टा प्रतिबिम्बगत मलिनतादि दोषों के सद्भाव का अपने बिम्बभूत मुख में अनुभव नहीं करता, वैसे ही जीवगत भ्रम आदि दोषों का अनुभव या संसर्ग ब्रह्म में नहीं हो सकता। उपाधि का स्वभाव प्रतिबिम्ब में ही दोषों का संसर्ग कर सकता है, बिम्ब में नहीं। इस उपाधि के विनाश से शुद्ध (बिम्ब-प्रतिबिम्बभावरहित) ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। इस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य से सिद्ध जीव-ब्रह्मैक्य की सिद्धि हो जाती है। प्रतिबिम्बवाद का समर्थन 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' इत्यादि श्रुति तथा 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जल-चन्द्रवत्' इत्यादि स्मृति एवं 'अतएव चोपमा सूर्यकादिवत्' इत्यादि सूत्ररूप प्रमाणों से होता है। प्रतिबिम्बवाद के आगमप्रमाण द्वारा सिद्ध होने से 'नीरूप का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता' इत्यादि प्रत्यक्षादि विरोध बाधित हो जाते हैं, क्योंकि श्रुत्यादिरूप आगमप्रमाण सबसे प्रबल माना जाता है। आकाशादि दृष्टान्त का तात्पर्य तो केवल ब्रह्म की असंगता का बोधन करने के लिये है। प्रतिबिम्बवाद का खण्डन करके अवच्छेदवाद के समर्थन में नहीं है। यद्यपि सोपाधिक भ्रमस्थल में उपाधिरूप दोष की निवृत्ति से ही भ्रम की निवृत्ति देखी गई है, अधिष्ठान के ज्ञान से नहीं। अतः जीव और ब्रह्म के भेद की

[प्रतिबिम्बवाद का उपपादन]

( ३५ )

निवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म साक्षात्कार से मानना संगत न होगा। यह आशंका करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रकृत में अहंकाररूप उपाधि, जिसके कारण कर्तृत्व आदि धर्मविशिष्ट जीव की कल्पना होती है वह अधिष्ठान तत्त्वसाक्षात्कार से ही निवृत्त होने योग्य है, क्योंकि अहंकार मूल-अविद्या का कार्य होने से निरुपाधिक भ्रम ही है। इसलिये अहंकारोपाधिक कर्तृत्व आदि सोपाधिकभ्रम की निवृत्ति अधिष्ठान तत्त्वस्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार से अवश्य हो सकती है।

वस्तुतः प्रतिबिम्बवाद और अवच्छेदवाद दोनों कल्पनामात्र है। आत्मा की वास्तविक असंगता घटाकाशादि दृष्टान्त से अधिक स्पष्ट हो जाती है। इसलिये अवच्छेदवाद की कल्पना की गई है। और अल्पज्ञत्व, सर्वज्ञत्व, सांसारिकत्व, मुक्तत्वादि व्यवस्था प्रतिबिम्ब पक्ष में सुगम होती है, इसलिये प्रतिबिम्बवाद की कल्पना की गई है।

जीव ब्रह्मैक्यज्ञान की प्राप्ति के लिये साधन चतुष्टय-सम्पन्न होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि साधन-चतुष्टय-सम्पन्न हुआ व्यक्ति ही वेदान्त श्रवण का अधिकारी है। वह अधिकारी व्यक्ति जब किसी शान्त, दान्त अहेतुककृपाकारी,

साधन चतुष्टय सम्पत्ति की आवश्यकता तथा अध्यारोप और अपवाद का निरूपणब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में जाता है और आत्मविषयक प्रश्न करता है, तब वे गुरु 'अध्यारोप और अपवाद' विधि से ब्रह्म का उपदेश करते हैं। निष्प्रपञ्च ब्रह्म में जगत् का आरोप करना अध्यारोप है। और आरोपित वस्तु का एक-एक करके निराकरण करना अपवाद है।<br>आत्मा पर प्रथमतः शरीर का आरोप कर दिया जाता

है। पश्चात् युक्तिपूर्वक आत्मा को अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पंचकोशों से अतिरिक्त अर्थात् स्थूल-सूक्ष्म कारण शरीरों से पृथक् सिद्ध करता है। इस रीति से आत्मस्वरूप का ज्ञान गुरु कराता है। गुरु अपने शिष्य को 'तत् त्वमसि' आदि महावाक्यों के द्वारा बताता है कि तुम (जीव) वही (ब्रह्म) हो। इस वाक्य से सोपाधिक अर्थात् क्लेशकर्मादिकों से बद्ध जीव की निरुपाधिक अर्थात् शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ब्रह्म के साथ एकता बताई जाती है। परन्तु यहाँ यह जिज्ञासा पैदा होती है कि ब्रह्म और जीव दोनों विरुद्धधर्मों के आधार हैं, अतः उनमें एकता कैसे हो सकती है। उसका समाधान वेदान्तिगण करते हैं कि अविद्या वृत्ति के द्वारा उक्त वाक्य का यथार्थ बोध नहीं हो सकता। अतः अगत्या तात्पर्य की अनुपपत्ति होने से लक्षणा करनी पड़ती है, जिससे यथार्थ बोध होता है।

लक्षणा भी तीन प्रकार की होती है—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा, और जहदजहल्लक्षणा (भागत्यागलक्षणा)। उक्त वाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' पद अपने अर्थ 'चैतन्य' का त्याग नहीं करते। अतः इस जहल्लक्षणा के द्वारा

( ३६ )

'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं हो सकता। अजहल्लक्षणा के द्वारा 'अभेद' अर्थ इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि इस लक्षणा में मुख्यार्थ का त्याग नहीं किया जाता। अतः मुख्यार्थ का त्याग न करने पर 'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं होगा। इसलिये तीसरे प्रकार की लक्षणा यहाँ की जाती है। यहाँ 'तत्' का अर्थ परोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है, और 'त्वम्' का अर्थ अपरोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है। यहां चैतन्यांश में विरोध नहीं है। केवल परोक्षत्व और अपरोक्षत्व इन अंशों में ही परस्पर विरोध है। अतः इन विरुद्ध अंशों का परित्याग कर अखण्ड चैतन्यांश का परिग्रह कर लिया जाता है। इस कारण इस लक्षणा को जहद्-अजहद्-लक्षणा कहते हैं तथा एक ही भाग (अंश) के ग्रहण या त्याग करने के कारण भाववृत्ति या भाग-त्याग लक्षणा भी कहते हैं।

वार्तिककार सुरेश्वराचार्य के मत से तीन सम्बन्धों की सहायता से यह महावाक्य अखण्डार्थ का बोध कराता है। ( १ ) पदों का सामानाधिकरण्य, ( २ ) पदार्थों का विशेषण-विशेष्यभाव, ( ३ ) आत्मा और ब्रह्म का लक्ष्य-लक्षण भाव।

किन्तु वेदान्त परिभाषाकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने बिना लक्षणा के ही 'तत्त्व-मसि' महावाक्य से अखण्डार्थ का बोध माना है। उनका कहना है कि 'तत्त्व-मसि' महावाक्य में विशिष्टवाचक पदों को एकदेशपरत्व रहने पर भी लक्षणा की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि शक्तिवृत्ति से उपस्थित हुए विशिष्टों का जब अभेदान्वय ( अभेद ) नहीं बन सकेगा तो शक्तिवृत्ति से ही उपस्थित हुए विशेष्य भागों में अभेदान्वयबोध का स्वयं पर्यवसान होगा, जैसे—'घटोऽनित्यः'

[परिभाषाकार के मत में लक्षणा के बिना ही महावाक्यार्थ का बोध] इस स्थल में घटपद के वाच्य का एक देश जो घटत्व, वह अनित्य पदार्थ के साथ अन्वित होने के योग्य न होने पर भी अन्वय के योग्य जो घटव्यक्ति, उसके साथ 'अनित्यत्व' का अन्वय स्वयं हो जाता है। अतः लक्षणा की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। पदार्थ के एक देश की विशेषण रूप से स्वातन्त्र्येण उपस्थिति कराने के लिये लक्षणा की आवश्यकता होती है। जैसे 'घटो नित्यः' में केवल घट पद से शक्तिवृत्ति द्वारा स्वतन्त्र रूप से 'घटत्व' धर्म की उपस्थिति न होने से उसे उपस्थित कराने के लिए 'घट' पद की 'घटत्व' में लक्षणा करनी पड़ती है। एवं च 'तत्त्वमसि' महावाक्य में शक्ति-वृत्ति से स्वातन्त्र्येण उपस्थित हुए तत्त्व पदार्थों के अभेदान्वय बोधन में कोई अड़चन नहीं है।

'तत् त्वम्' पदार्थ का अभेदज्ञान होने पर, जीव-ब्रह्म की भेदबुद्धि से पैदा हुए सम्पूर्ण क्लेशों की निवृत्ति ही नहीं, अपितु 'आनन्दरूपमोक्ष' की प्राप्ति होती है। एवं च 'सत्, चित्, आनन्दरूप ब्रह्म' की अनुभूति होती है। मुक्तात्मा

( ३७ )

महावाक्यार्थ के ज्ञान से मोक्ष-प्राप्ति तथा मुक्त की चर्यापुरुष को किसी प्रकार की आकांक्षा न रहने पर भी वह लोक-कल्याणार्थ अनासक्त भाव से कर्म करता रहता है। क्योंकि आसक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म ही 'बन्धन' का हेतु होता है। पूर्ण ज्ञानी एवं पूर्ण आनन्द को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति आसक्ति से रहित हो जाता

है। उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती। वह लाभ, हानि, हर्ष, विषाद से प्रभावित नहीं होता। किन्तु जिसे पूर्णज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई हो उसे आत्म-शुद्धि के लिये निष्काम कर्म का अनुष्ठान अत्यावश्यक है। अहङ्कार और स्वार्थ के बन्धन से मुक्त होने के लिये निष्काम कर्म करना आवश्यक है, न कि निष्क्रियता। जीव ब्रह्मैक्य साक्षात्कार के होने से मोक्ष हो जाने पर भी शरीर रह सकता है, क्योंकि वह प्रारब्धकर्मों का फल है। संसाररूप मिथ्या प्रपञ्च उसके सामने रहने पर भी वह उससे ठगा नहीं जाता। सांसारिक विषयों में उसे तृष्णा नहीं रहती। अतएव उसे कोई दुःख नहीं होता। वह अपने को शरीररूप नहीं समझता। वह संसार में रहते हुए भी उससे बाहर है। ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त कहते हैं। अर्थात् जीवित अवस्था में ही वह मुक्ति पा जाता है। स्वर्ग की तरह यह मुक्ति अज्ञात तथा भविष्य की कोई अलौकिक वस्तु नहीं है। शास्त्र में निष्ठा रखकर साधक को आगे बढ़ना पड़ता है, उसके विश्वास का फल उसे इसी जीवन में मिल जाता है।

ये कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं ( १ ) सञ्चित ( पूर्वकाल के वे कर्म जो जमा हैं ) ( २ ) प्रारब्ध ( पूर्वकाल के वे कर्म जिनका फलभोग हो रहा है) ( ३ ) क्रियमाण या सञ्चीयमान ( वे नये कर्म जो इस जीवन में जमा हो रहे हैं )।

तत्त्वज्ञान से सञ्चित-क्रियमाण कर्मों का विनाश किन्तु प्रारब्धकर्म का भोग से ही विनाश और विदेह मुक्तितत्त्वज्ञान से अनारब्ध फलक का सञ्चित तथा अनारब्धफलक क्रियमाणकर्म का विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा मिल जाता है परन्तु प्रारब्ध कर्म का निवारण नहीं किया जा सकता। उसका फलभोग करने के लिये यह शरीर ( जो प्रारब्ध का फल है ) विद्यमान रहता है। जब प्रारब्धफलभोग के द्वारा प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है तब शरीर का भी अन्त हो जाता है। जैसे कुलाल चक्र, दण्ड के हटा लेने पर भी कुछ देर तक

घूमता रहता है और घूमते घूमते वेग शान्त होने पर अपने आप रुक जाता है, उसी तरह प्रारब्धकर्म का भोग के द्वारा विनाश हो जाने पर स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अन्त हो जाता है तब विदेह मुक्ति कही जाती है।

वस्तुतः मुक्ति न तो उत्पन्न होती है और न पहले से अप्राप्त है। वह तो प्राप्त ही की प्राप्ति है। बन्धन की अवस्था में जो सत्त्व, अज्ञात रूप से विद्यमान

( ३८ )

रहता है, उसका साक्षात् अनुभव ही मुक्ति है। जैसे कण्ठस्थित मुक्ताहार को विस्मरणवश इधर उधर ढूँढ़ते फिरते हैं अन्त में अपनी ओर देखनेपर वह हार मिल जाता है उसी तरह मुमुक्षु को मोक्षप्राप्ति के लिए इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपने को समझने की आवश्यकता है। बन्धन अज्ञानकृत है। उस अज्ञान रूप आवरण को दूर कर देना ही मुक्ति है।

वेदान्त परिभाषा ग्रन्थ का स्वरूप परिचय

प्रस्तुत वेदान्तपरिभाषा नामक प्रकरण ग्रंथ में आठ परिच्छेद हैं। उनमें से छः परिच्छेदों में छः प्रमाणों का तथा सप्तम परिच्छेद में जीव-ब्रह्मैक्यरूप प्रमेय का और अष्टम परिच्छेद में सपरिकर मोक्ष का निरूपण किया गया है।

विवरण और भामती प्रस्थान में भेद

वेदान्त-शास्त्र में मुख्यतया विवरण प्रस्थान और भामती प्रस्थान प्रसिद्ध हैं। ये दोनों प्रस्थान व्याख्या उपव्याख्याओं से अच्छी तरह सुसमृद्ध हैं। दोनों का लक्ष्य अद्वैततत्त्व का निर्धारण करना ही है। तथापि उस अद्वैततत्त्व के निर्धारण में उपायभूत प्रसिद्ध व्यावहारिक प्रमेयों में कहीं-कहीं ऐकमत्य परिलक्षित नहीं होता है।

विवरणकार के मत सेभामतीकार के मत से
१. ब्रह्म-विचार श्रवण विधि प्रयुक्त है।ब्रह्म-विचार अध्ययन-विधि प्रयुक्त है।
२. कर्म, विचार्य है।कर्म, विविदिषार्थ है।
३. मन, इन्द्रिय नहीं है।मन, इन्द्रिय है।
४. श्रवण-मनन-निदिध्यासन में श्रवण विधेय और मनन-निदिध्यासन उसके अंग हैं।श्रवण, विधेय नहीं है और श्रवण-मनन, निदिध्यासन के अङ्ग हैं।
५. जीव, प्रतिबिम्बरूप है।जीव, अन्तःकरणावच्छिन्न है।
६. शुद्ध चैतन्य में अज्ञानाश्रयता है।जीव में अज्ञानाश्रयता है।
७. अज्ञान, एक है।अज्ञान, अनेक है।
८. शुद्ध ब्रह्म, वृत्ति का विषय है।उपहित ब्रह्म, वृत्ति का विषय है।
९. अध्ययन-विधि का प्रयोजन अक्षर-ग्रहण है।अध्ययन-विधि का प्रयोजन अर्थ-ज्ञान है।
१०. भौतिक पदार्थ पञ्चीकृत हैं।भूतों को त्रिवृत्कृत बताया है।
११. सादृश्य, अध्यास के कारण नहीं है।सादृश्य, अध्यास में कारण है।
१२. शब्द से अपरोक्ष ज्ञान होता है।शब्द से अपरोक्ष ज्ञान नहीं होता है।
१३. स्वप्नप्रपञ्च अविद्या का परिणाम है।स्वप्नप्रपञ्च, मन का परिणाम है।

इसके अतिरिक्त और भी कितने ही स्थलों पर वैमत्य है। किन्तु इस वैमत्य से अद्वैत सिद्धान्त की कोई हानि नहीं है। सभी प्रस्थानों का उपेय तो एक ही है। उपाय मात्र भिन्न-भिन्न हैं। इसी अभिप्राय से वार्तिककार ने कहा है—

( ३६ )

"यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता ॥"

वेदान्तपरिभाषाकार की विवरणानुगामिता तथा क्वचित्-क्वचित् अननुगामिता

यह वेदान्त-परिभाषा नामक प्रकरणग्रन्थ विवरणप्रस्थान को आधार मानकर रचा गया है। कहीं-कहीं भामतीकार के मत को भी प्रदर्शित किया है किन्तु उधर ग्रन्थकार का झुकाव नहीं है। क्योंकि 'मन की अनिन्द्रियता', 'ज्ञान का प्रत्यक्षत्व' 'शाब्दापरोक्षत्व', 'जीवप्रतिबिम्बत्व', 'श्रवणविधेयत्व', आदि का विशेष रूप से समर्थन करना ही विवरणानुयायित्व को प्रकट कर रहा है। परन्तु कहीं-कहीं विवरणमत से वैमत्य भी दिखलाई पड़ता है।

विवरणकारपरिभाषाकार
१. अनधिगतार्थविषयकबोध ही 'प्रमा' है।अनधिगत-अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही 'प्रमा' है।
२. स्मृति, प्रमारूप नहीं है।स्मृति, प्रमारूप है।
३. अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्य ही 'जीव' है।अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य 'जीव' है।
४. अन्तःकरण दो प्रकार का है।अन्तःकरण चार प्रकार का है।
५. सादृश्य, अध्यास के होने में कारण नहीं है।सादृश्य, अध्यास के कारण है।
६. प्रातिभासिक अध्यासों की अवस्था, अज्ञान का कार्य है।प्रातिभासिक अध्यास, तूलाज्ञान का कार्य है।
७. स्फटिकगतलौहित्य, अनिर्वचनीय है।स्फटिकगत लौहित्य सत्य है।
८. व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण नहीं है।व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण है।
९. शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है।तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध में हेतु है।
१०. अभावज्ञान की अप्रत्यक्षता।अभावज्ञान की प्रत्यक्षता।

इस ग्रन्थ की प्रमाण-प्रमेय प्रतिपादन की शैली अपने ढंग की अनोखी है। इस स्वल्पकाय ग्रन्थ में सभी आवश्यक विषयों को बताया गया है। उनमें भी कतिपय विशिष्ट विषय—जैसे 'मन का' अनिन्द्रियत्व। 'वह्निमान् पर्वतः' में पर्वतांश की प्रत्यक्षत्वव्यवस्था। ज्ञानगतप्रत्यक्ष और विषयगतप्रत्यक्ष के भिन्न-भिन्न प्रयोजक। शब्द से भी प्रत्यक्षज्ञान की उत्पत्ति। जातिशक्तिवाद। अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि का पृथक् प्रमाणत्व। स्वतः प्रामाण्यवाद। महावाक्य में लक्षणा का खण्डन। एक अविद्यापक्ष का स्वीकार आदि विशिष्ट विषयों का प्रतिपादन इस ग्रन्थ में किया गया है।

( ४० )

आचार्य शंकर के अद्वैत सिद्धान्तों को हृदयंगम करने में यह 'वेदान्त-परिभाषा' नामक प्रकरणग्रन्थ नितान्त उपकारक है। आचार्य शंकर के अद्वैत-सिद्धान्त से भारतीयजीवन अत्यधिक प्रभावित है। जड-चेतन पदार्थों को, मनुष्यों

आचार्य शंकर के अद्वैतसिद्धान्त का समर्थनतथा देवताओं को उस परमपुरुष का अंग माना गया है। उसी परमपुरुष को सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म बताया गया है। सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म ये सभी शब्द एकार्थक हैं। इस सत् से ही संसार की उत्पत्ति हुई है, उसी पर यह संसार आश्रित है तथा प्रलय होने पर इसी में विलीन हो जाता है।

संसार का नानात्व असत्य है और उसकी एकता ही एकमात्र सत्य है। १ अर्थात् संसार में एक ही सत्ता है। आत्मा या ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है, वह अनन्त ज्ञान तथा अनन्त आनन्द है। उसके अन्तर्गत कोई दूसरी सत्ता नहीं है। ब्रह्म ही एकमात्र विशुद्ध सत्ता है। तथापि अविद्या के कारण उसमें अनेक की प्रतीति होती है। अर्थात् अविद्या के कारण ब्रह्म का सत्य स्वरूप न जानकर हम उसे नानारूप में देखते हैं। यदि अज्ञान न होता तो हमें ब्रह्म की अनेकरूपता का भ्रम न होता। माया; अविद्या, अज्ञान वास्तव में एक ही हैं। दृष्टिभेद से यह भिन्न सी लगती हैं। माया (अज्ञान) और ब्रह्म दो शब्दों का प्रयोग करने पर भी विशुद्ध अद्वैत के प्रतिपादन में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो पाती। क्योंकि माया को उस परमेश्वर ब्रह्म की ही एक शक्ति कहा है। आचार्य शंकर ने अद्वैत को हृदयंगम कराने के लिये दो दृष्टियाँ बताई हैं—एक व्यावहारिक-दृष्टि और दूसरी पारमार्थिक-दृष्टि। पहिली दृष्टि साधारण मनुष्यों के लिये है जो संसार को सत्य मानते हैं; हमारा व्यावहारिक जीवन इसीपर निर्भर है। इस दृष्टि के अनुसार आचार्य शंकर ब्रह्म को सगुण या ईश्वर कहते हैं। दूसरी दृष्टि ज्ञानियों की है, जो संसार को मायिक और ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, ऐसा समझते हैं। इस दृष्टि के अनुसार ब्रह्म निर्गुण है। इस दृष्टि के अनुसार आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं रह जाता। यह पारमार्थिक दृष्टि अविद्या के दूर होने पर ही संभव है। अविद्या का नाश वेदान्त के ज्ञान से ही होता है। इस अज्ञान के कारण ही यह जीव अपने को ब्रह्म से पृथक् समझता है। मिथ्याज्ञान (अज्ञान) के दूर होने पर उसके दुःखों का भी अन्त हो जाता है। जिस तरह ब्रह्म आनन्दमय है उसी तरह आत्मा भी आनन्दमय हो जाती है। इति शम्।

गजाननशास्त्री मुसलगांवकर


१. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किञ्चन ।'

॥ श्रीः॥

विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला

१००

श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचिता

वेदान्तपरिभाषा

सविवरण 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेता

व्याख्याकार
वेदान्त-मीमांसा-साहित्याचार्य-

डॉ० श्रीगजानन शास्त्री मुसलगांवकर

एम. ए., पी-एच. डी.

अध्यक्ष—
मीमांसा-धर्मशास्त्रविभाग, प्राच्यविद्या-धर्मविज्ञान-संकाय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

सम्पादक
श्री श्रीरामशास्त्री मुसलगाँवकर


चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१

१९८३

विषय-विन्यास

प्रत्यक्ष-परिच्छेदः

विषयपृष्ठ
मंगलाचरण
ग्रन्थारम्भ-प्रतिज्ञा
मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है और ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय
प्रमाण और प्रमा का लक्षण—प्रमा के भेद और उसके सम्बन्ध में विचार
प्रमाण के भेद तथा प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण२०
प्रत्यक्ष प्रमा के सिद्धान्त पर शंका-समाधान२४
प्रत्यक्ष में अन्तःकरण की परिणामात्मक वृत्ति पर विचार२६
अन्तःकरण के सावयव होने का प्रतिपादन२७
कामादिक मनोधर्म हैं—इस पर शंका समाधान३०
मन के इन्द्रियत्व का खण्डन३१
मन की अनिन्द्रियता पर शंका-समाधान३५
ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक कौन है३७
वृत्ति के बहिर्निर्गमन का प्रकार३६
प्रत्यक्षप्रमा में प्रत्यक्षलक्षण का समन्वय४१
विचार का निष्कर्ष४२
सुखादिकों के प्रत्यक्ष में चक्षुरादिसन्निकर्ष की अनपेक्षता४३
स्मर्यमाण सुख में प्रत्यक्षलक्षण की अतिव्याप्ति और उसका निरास४४
पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने से दूसरा समाधान४५
धर्माधर्मविषयक शाब्द ज्ञान में पुनः अतिव्याप्ति और उसका निरसन"
'त्वं सुखी' इस ज्ञान पर पुनः शंका-समाधान४८
वह्नि की अनुमिति में 'पर्वत' अंश का प्रत्यक्ष होता है५०
न्यायमत में लोक-प्रसिद्धि का अतिक्रमण"
असन्निकृष्टपक्षक अनुमिति में ज्ञान सभी अंशों में परोक्ष होता है५२
'सुरभि चन्दनम्' इस ज्ञान में भी 'चन्दन खण्ड' का प्रत्यक्ष और 'सौरभ' अंश का प्रत्यक्ष होता है"
प्रसङ्गप्राप्त जातिखण्डन५४
समवायखण्डन( टीका ) ५७

( ४२ )

विषयपृष्ठ
एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप—परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है६१
ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण,,
विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक६२
उस पर शंका-समाधान६३
लक्षण में 'प्रमातृचैतन्य' क्यों नहीं कहा६५
इसी पर अनेक शंकाएँ और समाधान६६
विषयप्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण७३
वृत्ति के चार प्रकार७४
सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्ष के दो प्रकार७६
'सोऽयम्' इत्याकारक शब्द ज्ञान में निर्विकल्पक प्रत्यक्षत्व का व्यवस्थापन७८
वेदान्तवाक्यों की अखण्डार्थपरता८३
जीवसाक्षी और ईश्वरसाक्षी के भेद से प्रत्यक्ष के पुनः दो भेद८५
विशेषण और उपाधि के लक्षण,,
नैयायिक लोग उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं,,
प्रत्येक जीवात्मा का साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न होता है८७
ईश्वरसाक्षिचैतन्य तथा माया की एकता और अनादिता८८
ईश्वर का स्वरूप और वही ब्रह्मादि शब्दों से वाच्य है९२
औपाधिक सादित्व होने पर की चैतन्य के स्वाभाविक अनादित्व बाध नहीं९४
ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का सामान्य लक्षण९६
शुक्ति-रजत के प्रत्यक्ष पर विचार९७
उस पर अन्यथाख्यातिवादी का शंका-समाधान९९
अनिर्वचनीय रजत की उत्पत्ति१०३
तूलाविद्या और मूलाविद्या में अन्तर ( टीका१०४
परिणाम और विवर्त के लक्षण१०७
प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है,,
रजत का साक्षी में अध्यास तथा विविध आध्यासिक प्रत्यय१०८
रजतविषयक अविद्यावृत्ति के निष्प्रयोजनत्व की शंका समाधान११४
रजतवृत्ति और इदंवृत्ति की भिन्नविषयता के स्वीकार करने पर गुरुमत के प्रवेश की आशंका११६
प्रातिभासिक और व्यावहारिक पदार्थों में भेद११८