वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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( ३ ) हिरण्यगर्भ और ( ४ ) वैश्वानर। आपाततः ये चार अवस्थाएँ क्रमिक-सी लगती हैं। तथापि ये एक साथ ही कही जा सकती हैं। क्योंकि शुद्धचैतन्य (शुद्धसत्ता) का कभी लोप नहीं होता।
शांकर का विशुद्ध अद्वैतवाद
आचार्य शंकर का विशुद्ध अद्वैतवाद' है। इनके अनुसार एक विषय का दूसरे विषय से भेद, ज्ञाता-ज्ञेय का भेद, जीव-ईश्वर का भेद—ये सब माया के खेल हैं। इनके मत से 'एक ही सत् तत्त्व' है और 'अनेकत्व' मिथ्या है। अतएव जीव-ब्रह्म की एकता को बार-बार बताया गया है।
प्रत्यक्ष दृश्यमान यह शरीर अन्यान्य भौतिक विषयों के समान माया की सृष्टि है, यह ज्ञात हो जाने पर आत्मा और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं, यह समझ में आ जाता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ जब समझ में आ जाता है तब जीवात्मा और ब्रह्म में अभेद सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है। अर्थात् जीवात्मा, ब्रह्म से अभिन्न है, यह ज्ञात हो जाता है। अतएव 'त्वम्' से जीव का अधिष्ठान शुद्ध-चैतन्य और 'तत्' से परोक्ष तत्त्व का अधिष्ठान भी शुद्ध-चैतन्य है। अतः दोनों में पूर्णतया अभिन्नता है, यही वेदान्त का सिद्धान्त है।
वेदान्त का सिद्धान्त
जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' यहाँ पर तत्कालिक और एतत्कालिक दो विरुद्ध विशेषणों से रहित देवदत्त आदि मनुष्य एक ही है, उसी तरह 'तत्' अर्थात् परोक्षत्व, सर्वज्ञत्व आदि उपाधियों (विशेषणों) से विशिष्ट चैतन्य (ब्रह्म) और 'त्वम्' अर्थात् अल्पज्ञत्व, अपरोक्षत्व आदि उपाधियों (विशेषणों) से विशिष्ट चैतन्य (जीव) इन दोनों के विरुद्ध अंशों को त्याग कर उभयनिष्ठ शुद्धचैतन्य का अभेद (ऐक्य) है—यही 'तत्त्वमसि' महावाक्य का तात्पर्य समझना चाहिये। जीव और ब्रह्म आपाततः भिन्न प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः अभिन्न हैं। इस तादात्म्य का ज्ञान कराने के लिये ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य का उपदेश दिया जाता है।
'तत्त्वमसि' महावाक्य का तात्पर्य
असीम का ससीम के समान भान होने में हेतु
अनन्त (असीम) आत्मा सीमित जीवात्मा की तरह भासित होने का कारण, शरीर के साथ उसका सम्बन्ध है, जो अविद्या का कार्य है। दृश्यमान स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है, जो अन्तःकरण, प्राण और इन्द्रियों का समूह है। मृत्यु से स्थूल शरीर का नाश होता है, सूक्ष्म शरीर का नहीं। सूक्ष्म-शरीर आत्मा के साथ दूसरे स्थूल शरीर में चला जाता है। ये दोनों स्थूल-सूक्ष्म शरीर, माया के कार्य हैं। अनादि अविद्या के कारण आत्मा भ्रमवश अपने को ही स्थूल-सूक्ष्म शरीर समझ लेता है। इसी समझ को बन्धन कहते हैं। इस स्थिति में आत्मा अपने