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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 482 में से

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यथार्थ स्वरूप (वास्तविक स्वरूप) को भूल जाता है, और क्षणभंगुर सांसारिक विषयों के पीछे भागता फिरता है। उन विषयों की उपलब्धि होने पर अपने को सुखी और उपलब्धि न होने पर अपने को दुःखी समझता है। वह आत्मा अपने को शरीर या अन्तःकरण समझकर सोचता है कि 'मैं मोटा हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ।' इस तरह आत्मा में अहंकार (मैं हूँ) उत्पन्न होता है। यह अहम् (मैं) अपने को शेष संसार से पृथक् समझता है। इसी कारण इस 'अहम्' को शुद्ध आत्मा नहीं समझना चाहिये। उस शुद्ध आत्मा का यह एक अविद्याकृत बन्धनमात्र है। शुद्ध आत्मा तो नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त माना जाता है। यही उसका स्वरूप है। ऐसे शुद्ध आत्मा की उत्पत्ति जहाँ कहीं सुनाई देती है, उसका तात्पर्य शरीरादि उपाधियों की उत्पत्तियों से है। नित्य आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होता।

'आत्मस्वरूप के विषय में विभिन्न दार्शनिकों के विभिन्न मत हैं। निद्रित, मूच्छित, ग्रहाविष्ट पुरुषों में कुछ समय तक 'चैतन्याभाव' को देखकर प्रत्यक्ष अनुभव के पक्षपाती वैशेषिक ने 'चैतन्य' को आत्मा का कादाचित्क गुण माना है।

किन्तु वेदान्तदर्शन तो आत्मा को चैतन्यरूप ही मानता है। क्योंकि 'परब्रह्म' ही उपाधि के सम्पर्क से 'जीवभाव' को प्राप्त होता है। अतः 'आत्मा' और 'ब्रह्म' का स्वाभाविक ऐक्य होने के कारण नित्य-चैतन्य का अनंगीकार नहीं किया जा सकता। भेद तो केवल उपाधि से प्रतीत होता है। जैसे—'स्थूल शरीर', 'सूक्ष्म शरीर', और 'कारण शरीर', की व्यष्टि के अभिमानी जीव को 'विश्व', 'तैजस', और 'प्राज्ञ' कहा जाता है। और इन्हीं शरीरों की समष्टि के अभिमानी ईश्वर को 'वैश्वानर' (विराट्) 'सूत्रात्मा' (हिरण्यगर्भ), और 'ईश्वर' कहा जाता है। इसी स्थूल शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'अन्नमयकोष' और 'जाग्रत अवस्था' कहते हैं। सूक्ष्म-शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'मनोमय', 'प्राणमय' 'विज्ञानमयकोष', और 'स्वप्न अवस्था' कहते हैं। कारण शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'आनन्दमयकोष', और 'सुषुप्तिअवस्था' कहते हैं। वास्तव में 'व्यष्टि' तथा 'समष्टि' के अभिमानी पुरुष आपस में अभिन्न हैं। किन्तु 'आत्मा' इन तीनों से परे स्वतन्त्र सत्ता है। यह साक्षी आत्म-चैतन्य, 'अहङ्कार', 'विषय' तथा 'बुद्धि' को प्रकाशित करता है और इनके अभाव में स्वतः प्रकाशित होता है।

'जीव' और 'ईश्वर' के स्वरूप का निरूपण वेदान्तियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। कुछ लोग 'जीव'-'ईश्वर' में सामान्य रूप से रहनेवाले चैतन्य