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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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जो-जो व्यक्ति ज्ञानी होता जाता है, उस-उस को छोड़कर अन्य व्यक्तियों में अज्ञान बना रहता है। अर्थात् एक के ज्ञानी हो जाने पर सभी ज्ञानी नहीं होते।

कतिपय वेदान्तियों ने एक अज्ञान के होने पर भी उसके कार्य अनन्त माने हैं। उनका कहना है कि जैसे एक आकाश में पक्षी का भाव और अभाव दोनों रहते हैं, वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्म में अज्ञान है और नहीं भी। अज्ञान एक होने पर भी वह सांश है। ज्ञान से उसका अंश नष्ट हो जाता है और अंशान्तर शेष रह जाता है। अतः बद्ध-मुक्त व्यवस्था बन जाती है। कुछ लोगों का मत है कि ईश्वर बद्धजीवों के प्रति मायाजाल फैलाता है और मुक्तपुरुषों के प्रति उसे समेट लेता है। माया का संकोच और विकास स्वाभाविक है। वस्तुतः एक ही अखण्ड वस्तु सत् है। बद्ध-मुक्त व्यवस्था अविद्या का विलासमात्र है। विवरणकार ईश्वर को ही बिम्ब मानते हैं। अतः इनके अनुसार अविद्यागत प्रतिबिम्ब जीव और बिम्बचैतन्य 'ईश्वर' है। इस मत में जीव की स्वतन्त्रता और सर्वज्ञता पर कोई आंच नहीं आने पाती। जो लोग ईश्वर को प्रतिबिम्ब मानते हैं, वे ईश्वर की सर्वज्ञता आदि की सुरक्षा नहीं कर पाते। क्योंकि उपाधि का प्रभाव सर्वदा प्रतिबिम्ब पर पड़ा करता है, बिम्ब पर नहीं। अतः ईश्वर को प्रतिबिम्ब मानने के पक्ष में उसे नित्य निर्दोष कैसे कहा जा सकेगा? अवच्छेदवादी वाचस्पति मिश्र के मत से मायावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है। वेदान्त-परिभाषाकार ने विवरणकार के प्रतिबिम्बवाद का ही आश्रय लिया है। क्योंकि जैसे जल में एक व्यापक रूप आकाश स्वतः रहता है और दूसरा महाकाश का प्रतिबिम्बरूप आकाश भी है, वैसे ही देहधारी प्राणियों में भी जीव और अन्तर्यामी रूप द्विगुणित चैतन्य की उपपत्ति हो सकती है। इस पक्ष में एक जीववाद को लेकर प्रतिकर्म की व्यवस्था जलसूर्यकादि दृष्टान्त से हो जाती है। एवम् इस मत में 'शब्द' से अपरोक्ष ज्ञान होता है। किन्तु वह होता है केवल अधिकारी को ही। अतएव 'दशमस्त्वमसि' आदि वाक्यों से ही भ्रान्त हुए दशम ने अपना प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) किया। दुर्योधन ने द्रौपदी के अन्धे का पुत्र अन्धा' इस वाक्य से ही उसके या पाण्डवों के अभिमान का तत्काल ही साक्षात्कार किया था।

भामतीकार वाचस्पति मिश्र का कहना है कि 'गन्धरसस्पर्शादीनां कीदृशी प्रतिबिम्बता' के अनुसार नीरूप ब्रह्म का प्रतिबिम्बत होना संभव नहीं। अतः घटाकाश के दृष्टान्त से अवच्छेदवाद ही उचित है।

यद्यपि ग्रीवा-स्थित मुख और दर्पणगत मुख में भिन्नता दीखती है, जैसे बिम्बभूत मुख पूर्वाभिमुख हो तो दर्पणगत पश्चिमाभिमुख दीख पड़ता है। तथापि दर्पणगत मुख के लिये 'यह मेरा ही मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। अतः उसमें भेद-प्रत्यक्ष को भ्रम मानना उचित है। क्योंकि दर्पण में बिम्ब से

३ वे० प० भ०