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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 482 में से

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अतिरिक्त मुख की उत्पत्ति का कोई साधन नहीं है। दर्पणादि उपाधि के अवयवों का वैसा परिणाम होना संभव नहीं। प्रथम तो प्रतिबिम्ब में दीखता हुआ निम्नोन्नत भाव दर्पण का स्पर्श करने से नहीं मालूम होता है, और बिम्ब की अपेक्षा उपाधि के तारतम्य के अनुसार छोटे या बड़े प्रतिबिम्ब दीख पड़ने से बिम्ब की मुहर भी प्रतिबिम्ब को नहीं कह सकते। मुहर की छाप में न्यूनाधिक परिणाम नहीं आ सकता। और बिम्ब से दर्पणादि उपाधि का मुहर की तरह अत्यन्त व्यवधानशून्य संयोग न होने पर भी प्रतिबिम्ब दीख पड़ता है। मुहर की छाप छिद्रशून्य संयोग के बिना नहीं हो सकती। किञ्च बिम्बसन्निधान के हटते ही प्रतिबिम्ब भी नहीं रह जाता। अतः प्रतिबिम्ब को बिम्ब से अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। परन्तु शुक्तिरजत की तरह उसे मिथ्या भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रतीयमान वस्तु का मिथ्यात्व, बाध के पश्चात् ही सिद्ध होता है। शुक्तिरजत स्थल में तो 'यह रजत नहीं है' ऐसा बाध होता है। प्रकृत में 'यह मेरा मुख नहीं है' ऐसा बाध नहीं होता, किन्तु दर्पण में मेरा मुख नहीं है' इस प्रकार देशविशेष के संबन्ध का ही बाध होता है। अतः जीव और ब्रह्म के वास्तविक ऐक्य का होना असङ्गत नहीं है। अमूर्त आकाश का भी प्रतिबिम्ब दीखता है। अतः नीरूप होने पर भी आत्मा का प्रतिबिम्ब हो सकता है। ग्रीवास्थ मुख का दर्पण में दीख पड़ना स्वप्न में अपने शिरश्छेद के दीखने के तुल्य मायामय होने से असंभव नहीं है। जीव तथा ब्रह्म का ऐक्य होते हुए भी जैसे देवदत्त आदि द्रष्टा प्रतिबिम्बगत मलिनतादि दोषों के सद्भाव का अपने बिम्बभूत मुख में अनुभव नहीं करता, वैसे ही जीवगत भ्रम आदि दोषों का अनुभव या संसर्ग ब्रह्म में नहीं हो सकता। उपाधि का स्वभाव प्रतिबिम्ब में ही दोषों का संसर्ग कर सकता है, बिम्ब में नहीं। इस उपाधि के विनाश से शुद्ध (बिम्ब-प्रतिबिम्बभावरहित) ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। इस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य से सिद्ध जीव-ब्रह्मैक्य की सिद्धि हो जाती है। प्रतिबिम्बवाद का समर्थन 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' इत्यादि श्रुति तथा 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जल-चन्द्रवत्' इत्यादि स्मृति एवं 'अतएव चोपमा सूर्यकादिवत्' इत्यादि सूत्ररूप प्रमाणों से होता है। प्रतिबिम्बवाद के आगमप्रमाण द्वारा सिद्ध होने से 'नीरूप का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता' इत्यादि प्रत्यक्षादि विरोध बाधित हो जाते हैं, क्योंकि श्रुत्यादिरूप आगमप्रमाण सबसे प्रबल माना जाता है। आकाशादि दृष्टान्त का तात्पर्य तो केवल ब्रह्म की असंगता का बोधन करने के लिये है। प्रतिबिम्बवाद का खण्डन करके अवच्छेदवाद के समर्थन में नहीं है। यद्यपि सोपाधिक भ्रमस्थल में उपाधिरूप दोष की निवृत्ति से ही भ्रम की निवृत्ति देखी गई है, अधिष्ठान के ज्ञान से नहीं। अतः जीव और ब्रह्म के भेद की

[प्रतिबिम्बवाद का उपपादन]