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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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निवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म साक्षात्कार से मानना संगत न होगा। यह आशंका करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रकृत में अहंकाररूप उपाधि, जिसके कारण कर्तृत्व आदि धर्मविशिष्ट जीव की कल्पना होती है वह अधिष्ठान तत्त्वसाक्षात्कार से ही निवृत्त होने योग्य है, क्योंकि अहंकार मूल-अविद्या का कार्य होने से निरुपाधिक भ्रम ही है। इसलिये अहंकारोपाधिक कर्तृत्व आदि सोपाधिकभ्रम की निवृत्ति अधिष्ठान तत्त्वस्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार से अवश्य हो सकती है।

वस्तुतः प्रतिबिम्बवाद और अवच्छेदवाद दोनों कल्पनामात्र है। आत्मा की वास्तविक असंगता घटाकाशादि दृष्टान्त से अधिक स्पष्ट हो जाती है। इसलिये अवच्छेदवाद की कल्पना की गई है। और अल्पज्ञत्व, सर्वज्ञत्व, सांसारिकत्व, मुक्तत्वादि व्यवस्था प्रतिबिम्ब पक्ष में सुगम होती है, इसलिये प्रतिबिम्बवाद की कल्पना की गई है।

जीव ब्रह्मैक्यज्ञान की प्राप्ति के लिये साधन चतुष्टय-सम्पन्न होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि साधन-चतुष्टय-सम्पन्न हुआ व्यक्ति ही वेदान्त श्रवण का अधिकारी है। वह अधिकारी व्यक्ति जब किसी शान्त, दान्त अहेतुककृपाकारी,

साधन चतुष्टय सम्पत्ति की आवश्यकता तथा अध्यारोप और अपवाद का निरूपणब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में जाता है और आत्मविषयक प्रश्न करता है, तब वे गुरु 'अध्यारोप और अपवाद' विधि से ब्रह्म का उपदेश करते हैं। निष्प्रपञ्च ब्रह्म में जगत् का आरोप करना अध्यारोप है। और आरोपित वस्तु का एक-एक करके निराकरण करना अपवाद है।<br>आत्मा पर प्रथमतः शरीर का आरोप कर दिया जाता

है। पश्चात् युक्तिपूर्वक आत्मा को अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पंचकोशों से अतिरिक्त अर्थात् स्थूल-सूक्ष्म कारण शरीरों से पृथक् सिद्ध करता है। इस रीति से आत्मस्वरूप का ज्ञान गुरु कराता है। गुरु अपने शिष्य को 'तत् त्वमसि' आदि महावाक्यों के द्वारा बताता है कि तुम (जीव) वही (ब्रह्म) हो। इस वाक्य से सोपाधिक अर्थात् क्लेशकर्मादिकों से बद्ध जीव की निरुपाधिक अर्थात् शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ब्रह्म के साथ एकता बताई जाती है। परन्तु यहाँ यह जिज्ञासा पैदा होती है कि ब्रह्म और जीव दोनों विरुद्धधर्मों के आधार हैं, अतः उनमें एकता कैसे हो सकती है। उसका समाधान वेदान्तिगण करते हैं कि अविद्या वृत्ति के द्वारा उक्त वाक्य का यथार्थ बोध नहीं हो सकता। अतः अगत्या तात्पर्य की अनुपपत्ति होने से लक्षणा करनी पड़ती है, जिससे यथार्थ बोध होता है।

लक्षणा भी तीन प्रकार की होती है—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा, और जहदजहल्लक्षणा (भागत्यागलक्षणा)। उक्त वाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' पद अपने अर्थ 'चैतन्य' का त्याग नहीं करते। अतः इस जहल्लक्षणा के द्वारा