वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
( ३५ )
निवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म साक्षात्कार से मानना संगत न होगा। यह आशंका करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रकृत में अहंकाररूप उपाधि, जिसके कारण कर्तृत्व आदि धर्मविशिष्ट जीव की कल्पना होती है वह अधिष्ठान तत्त्वसाक्षात्कार से ही निवृत्त होने योग्य है, क्योंकि अहंकार मूल-अविद्या का कार्य होने से निरुपाधिक भ्रम ही है। इसलिये अहंकारोपाधिक कर्तृत्व आदि सोपाधिकभ्रम की निवृत्ति अधिष्ठान तत्त्वस्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार से अवश्य हो सकती है।
वस्तुतः प्रतिबिम्बवाद और अवच्छेदवाद दोनों कल्पनामात्र है। आत्मा की वास्तविक असंगता घटाकाशादि दृष्टान्त से अधिक स्पष्ट हो जाती है। इसलिये अवच्छेदवाद की कल्पना की गई है। और अल्पज्ञत्व, सर्वज्ञत्व, सांसारिकत्व, मुक्तत्वादि व्यवस्था प्रतिबिम्ब पक्ष में सुगम होती है, इसलिये प्रतिबिम्बवाद की कल्पना की गई है।
जीव ब्रह्मैक्यज्ञान की प्राप्ति के लिये साधन चतुष्टय-सम्पन्न होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि साधन-चतुष्टय-सम्पन्न हुआ व्यक्ति ही वेदान्त श्रवण का अधिकारी है। वह अधिकारी व्यक्ति जब किसी शान्त, दान्त अहेतुककृपाकारी,
| साधन चतुष्टय सम्पत्ति की आवश्यकता तथा अध्यारोप और अपवाद का निरूपण | ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में जाता है और आत्मविषयक प्रश्न करता है, तब वे गुरु 'अध्यारोप और अपवाद' विधि से ब्रह्म का उपदेश करते हैं। निष्प्रपञ्च ब्रह्म में जगत् का आरोप करना अध्यारोप है। और आरोपित वस्तु का एक-एक करके निराकरण करना अपवाद है।<br>आत्मा पर प्रथमतः शरीर का आरोप कर दिया जाता |
|---|
है। पश्चात् युक्तिपूर्वक आत्मा को अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पंचकोशों से अतिरिक्त अर्थात् स्थूल-सूक्ष्म कारण शरीरों से पृथक् सिद्ध करता है। इस रीति से आत्मस्वरूप का ज्ञान गुरु कराता है। गुरु अपने शिष्य को 'तत् त्वमसि' आदि महावाक्यों के द्वारा बताता है कि तुम (जीव) वही (ब्रह्म) हो। इस वाक्य से सोपाधिक अर्थात् क्लेशकर्मादिकों से बद्ध जीव की निरुपाधिक अर्थात् शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ब्रह्म के साथ एकता बताई जाती है। परन्तु यहाँ यह जिज्ञासा पैदा होती है कि ब्रह्म और जीव दोनों विरुद्धधर्मों के आधार हैं, अतः उनमें एकता कैसे हो सकती है। उसका समाधान वेदान्तिगण करते हैं कि अविद्या वृत्ति के द्वारा उक्त वाक्य का यथार्थ बोध नहीं हो सकता। अतः अगत्या तात्पर्य की अनुपपत्ति होने से लक्षणा करनी पड़ती है, जिससे यथार्थ बोध होता है।
लक्षणा भी तीन प्रकार की होती है—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा, और जहदजहल्लक्षणा (भागत्यागलक्षणा)। उक्त वाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' पद अपने अर्थ 'चैतन्य' का त्याग नहीं करते। अतः इस जहल्लक्षणा के द्वारा
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'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं हो सकता। अजहल्लक्षणा के द्वारा 'अभेद' अर्थ इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि इस लक्षणा में मुख्यार्थ का त्याग नहीं किया जाता। अतः मुख्यार्थ का त्याग न करने पर 'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं होगा। इसलिये तीसरे प्रकार की लक्षणा यहाँ की जाती है। यहाँ 'तत्' का अर्थ परोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है, और 'त्वम्' का अर्थ अपरोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है। यहां चैतन्यांश में विरोध नहीं है। केवल परोक्षत्व और अपरोक्षत्व इन अंशों में ही परस्पर विरोध है। अतः इन विरुद्ध अंशों का परित्याग कर अखण्ड चैतन्यांश का परिग्रह कर लिया जाता है। इस कारण इस लक्षणा को जहद्-अजहद्-लक्षणा कहते हैं तथा एक ही भाग (अंश) के ग्रहण या त्याग करने के कारण भाववृत्ति या भाग-त्याग लक्षणा भी कहते हैं।
वार्तिककार सुरेश्वराचार्य के मत से तीन सम्बन्धों की सहायता से यह महावाक्य अखण्डार्थ का बोध कराता है। ( १ ) पदों का सामानाधिकरण्य, ( २ ) पदार्थों का विशेषण-विशेष्यभाव, ( ३ ) आत्मा और ब्रह्म का लक्ष्य-लक्षण भाव।
किन्तु वेदान्त परिभाषाकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने बिना लक्षणा के ही 'तत्त्व-मसि' महावाक्य से अखण्डार्थ का बोध माना है। उनका कहना है कि 'तत्त्व-मसि' महावाक्य में विशिष्टवाचक पदों को एकदेशपरत्व रहने पर भी लक्षणा की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि शक्तिवृत्ति से उपस्थित हुए विशिष्टों का जब अभेदान्वय ( अभेद ) नहीं बन सकेगा तो शक्तिवृत्ति से ही उपस्थित हुए विशेष्य भागों में अभेदान्वयबोध का स्वयं पर्यवसान होगा, जैसे—'घटोऽनित्यः'
[परिभाषाकार के मत में लक्षणा के बिना ही महावाक्यार्थ का बोध] इस स्थल में घटपद के वाच्य का एक देश जो घटत्व, वह अनित्य पदार्थ के साथ अन्वित होने के योग्य न होने पर भी अन्वय के योग्य जो घटव्यक्ति, उसके साथ 'अनित्यत्व' का अन्वय स्वयं हो जाता है। अतः लक्षणा की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। पदार्थ के एक देश की विशेषण रूप से स्वातन्त्र्येण उपस्थिति कराने के लिये लक्षणा की आवश्यकता होती है। जैसे 'घटो नित्यः' में केवल घट पद से शक्तिवृत्ति द्वारा स्वतन्त्र रूप से 'घटत्व' धर्म की उपस्थिति न होने से उसे उपस्थित कराने के लिए 'घट' पद की 'घटत्व' में लक्षणा करनी पड़ती है। एवं च 'तत्त्वमसि' महावाक्य में शक्ति-वृत्ति से स्वातन्त्र्येण उपस्थित हुए तत्त्व पदार्थों के अभेदान्वय बोधन में कोई अड़चन नहीं है।
'तत् त्वम्' पदार्थ का अभेदज्ञान होने पर, जीव-ब्रह्म की भेदबुद्धि से पैदा हुए सम्पूर्ण क्लेशों की निवृत्ति ही नहीं, अपितु 'आनन्दरूपमोक्ष' की प्राप्ति होती है। एवं च 'सत्, चित्, आनन्दरूप ब्रह्म' की अनुभूति होती है। मुक्तात्मा
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| महावाक्यार्थ के ज्ञान से मोक्ष-प्राप्ति तथा मुक्त की चर्या | पुरुष को किसी प्रकार की आकांक्षा न रहने पर भी वह लोक-कल्याणार्थ अनासक्त भाव से कर्म करता रहता है। क्योंकि आसक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म ही 'बन्धन' का हेतु होता है। पूर्ण ज्ञानी एवं पूर्ण आनन्द को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति आसक्ति से रहित हो जाता |
|---|
है। उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती। वह लाभ, हानि, हर्ष, विषाद से प्रभावित नहीं होता। किन्तु जिसे पूर्णज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई हो उसे आत्म-शुद्धि के लिये निष्काम कर्म का अनुष्ठान अत्यावश्यक है। अहङ्कार और स्वार्थ के बन्धन से मुक्त होने के लिये निष्काम कर्म करना आवश्यक है, न कि निष्क्रियता। जीव ब्रह्मैक्य साक्षात्कार के होने से मोक्ष हो जाने पर भी शरीर रह सकता है, क्योंकि वह प्रारब्धकर्मों का फल है। संसाररूप मिथ्या प्रपञ्च उसके सामने रहने पर भी वह उससे ठगा नहीं जाता। सांसारिक विषयों में उसे तृष्णा नहीं रहती। अतएव उसे कोई दुःख नहीं होता। वह अपने को शरीररूप नहीं समझता। वह संसार में रहते हुए भी उससे बाहर है। ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त कहते हैं। अर्थात् जीवित अवस्था में ही वह मुक्ति पा जाता है। स्वर्ग की तरह यह मुक्ति अज्ञात तथा भविष्य की कोई अलौकिक वस्तु नहीं है। शास्त्र में निष्ठा रखकर साधक को आगे बढ़ना पड़ता है, उसके विश्वास का फल उसे इसी जीवन में मिल जाता है।
ये कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं ( १ ) सञ्चित ( पूर्वकाल के वे कर्म जो जमा हैं ) ( २ ) प्रारब्ध ( पूर्वकाल के वे कर्म जिनका फलभोग हो रहा है) ( ३ ) क्रियमाण या सञ्चीयमान ( वे नये कर्म जो इस जीवन में जमा हो रहे हैं )।
| तत्त्वज्ञान से सञ्चित-क्रियमाण कर्मों का विनाश किन्तु प्रारब्धकर्म का भोग से ही विनाश और विदेह मुक्ति | तत्त्वज्ञान से अनारब्ध फलक का सञ्चित तथा अनारब्धफलक क्रियमाणकर्म का विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा मिल जाता है परन्तु प्रारब्ध कर्म का निवारण नहीं किया जा सकता। उसका फलभोग करने के लिये यह शरीर ( जो प्रारब्ध का फल है ) विद्यमान रहता है। जब प्रारब्धफलभोग के द्वारा प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है तब शरीर का भी अन्त हो जाता है। जैसे कुलाल चक्र, दण्ड के हटा लेने पर भी कुछ देर तक |
|---|
घूमता रहता है और घूमते घूमते वेग शान्त होने पर अपने आप रुक जाता है, उसी तरह प्रारब्धकर्म का भोग के द्वारा विनाश हो जाने पर स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अन्त हो जाता है तब विदेह मुक्ति कही जाती है।
वस्तुतः मुक्ति न तो उत्पन्न होती है और न पहले से अप्राप्त है। वह तो प्राप्त ही की प्राप्ति है। बन्धन की अवस्था में जो सत्त्व, अज्ञात रूप से विद्यमान
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रहता है, उसका साक्षात् अनुभव ही मुक्ति है। जैसे कण्ठस्थित मुक्ताहार को विस्मरणवश इधर उधर ढूँढ़ते फिरते हैं अन्त में अपनी ओर देखनेपर वह हार मिल जाता है उसी तरह मुमुक्षु को मोक्षप्राप्ति के लिए इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपने को समझने की आवश्यकता है। बन्धन अज्ञानकृत है। उस अज्ञान रूप आवरण को दूर कर देना ही मुक्ति है।
वेदान्त परिभाषा ग्रन्थ का स्वरूप परिचय
प्रस्तुत वेदान्तपरिभाषा नामक प्रकरण ग्रंथ में आठ परिच्छेद हैं। उनमें से छः परिच्छेदों में छः प्रमाणों का तथा सप्तम परिच्छेद में जीव-ब्रह्मैक्यरूप प्रमेय का और अष्टम परिच्छेद में सपरिकर मोक्ष का निरूपण किया गया है।
विवरण और भामती प्रस्थान में भेद
वेदान्त-शास्त्र में मुख्यतया विवरण प्रस्थान और भामती प्रस्थान प्रसिद्ध हैं। ये दोनों प्रस्थान व्याख्या उपव्याख्याओं से अच्छी तरह सुसमृद्ध हैं। दोनों का लक्ष्य अद्वैततत्त्व का निर्धारण करना ही है। तथापि उस अद्वैततत्त्व के निर्धारण में उपायभूत प्रसिद्ध व्यावहारिक प्रमेयों में कहीं-कहीं ऐकमत्य परिलक्षित नहीं होता है।
| विवरणकार के मत से | भामतीकार के मत से |
|---|---|
| १. ब्रह्म-विचार श्रवण विधि प्रयुक्त है। | ब्रह्म-विचार अध्ययन-विधि प्रयुक्त है। |
| २. कर्म, विचार्य है। | कर्म, विविदिषार्थ है। |
| ३. मन, इन्द्रिय नहीं है। | मन, इन्द्रिय है। |
| ४. श्रवण-मनन-निदिध्यासन में श्रवण विधेय और मनन-निदिध्यासन उसके अंग हैं। | श्रवण, विधेय नहीं है और श्रवण-मनन, निदिध्यासन के अङ्ग हैं। |
| ५. जीव, प्रतिबिम्बरूप है। | जीव, अन्तःकरणावच्छिन्न है। |
| ६. शुद्ध चैतन्य में अज्ञानाश्रयता है। | जीव में अज्ञानाश्रयता है। |
| ७. अज्ञान, एक है। | अज्ञान, अनेक है। |
| ८. शुद्ध ब्रह्म, वृत्ति का विषय है। | उपहित ब्रह्म, वृत्ति का विषय है। |
| ९. अध्ययन-विधि का प्रयोजन अक्षर-ग्रहण है। | अध्ययन-विधि का प्रयोजन अर्थ-ज्ञान है। |
| १०. भौतिक पदार्थ पञ्चीकृत हैं। | भूतों को त्रिवृत्कृत बताया है। |
| ११. सादृश्य, अध्यास के कारण नहीं है। | सादृश्य, अध्यास में कारण है। |
| १२. शब्द से अपरोक्ष ज्ञान होता है। | शब्द से अपरोक्ष ज्ञान नहीं होता है। |
| १३. स्वप्नप्रपञ्च अविद्या का परिणाम है। | स्वप्नप्रपञ्च, मन का परिणाम है। |
इसके अतिरिक्त और भी कितने ही स्थलों पर वैमत्य है। किन्तु इस वैमत्य से अद्वैत सिद्धान्त की कोई हानि नहीं है। सभी प्रस्थानों का उपेय तो एक ही है। उपाय मात्र भिन्न-भिन्न हैं। इसी अभिप्राय से वार्तिककार ने कहा है—
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"यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता ॥"
वेदान्तपरिभाषाकार की विवरणानुगामिता तथा क्वचित्-क्वचित् अननुगामिता
यह वेदान्त-परिभाषा नामक प्रकरणग्रन्थ विवरणप्रस्थान को आधार मानकर रचा गया है। कहीं-कहीं भामतीकार के मत को भी प्रदर्शित किया है किन्तु उधर ग्रन्थकार का झुकाव नहीं है। क्योंकि 'मन की अनिन्द्रियता', 'ज्ञान का प्रत्यक्षत्व' 'शाब्दापरोक्षत्व', 'जीवप्रतिबिम्बत्व', 'श्रवणविधेयत्व', आदि का विशेष रूप से समर्थन करना ही विवरणानुयायित्व को प्रकट कर रहा है। परन्तु कहीं-कहीं विवरणमत से वैमत्य भी दिखलाई पड़ता है।
| विवरणकार | परिभाषाकार |
|---|---|
| १. अनधिगतार्थविषयकबोध ही 'प्रमा' है। | अनधिगत-अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही 'प्रमा' है। |
| २. स्मृति, प्रमारूप नहीं है। | स्मृति, प्रमारूप है। |
| ३. अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्य ही 'जीव' है। | अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य 'जीव' है। |
| ४. अन्तःकरण दो प्रकार का है। | अन्तःकरण चार प्रकार का है। |
| ५. सादृश्य, अध्यास के होने में कारण नहीं है। | सादृश्य, अध्यास के कारण है। |
| ६. प्रातिभासिक अध्यासों की अवस्था, अज्ञान का कार्य है। | प्रातिभासिक अध्यास, तूलाज्ञान का कार्य है। |
| ७. स्फटिकगतलौहित्य, अनिर्वचनीय है। | स्फटिकगत लौहित्य सत्य है। |
| ८. व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण नहीं है। | व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण है। |
| ९. शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है। | तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध में हेतु है। |
| १०. अभावज्ञान की अप्रत्यक्षता। | अभावज्ञान की प्रत्यक्षता। |
इस ग्रन्थ की प्रमाण-प्रमेय प्रतिपादन की शैली अपने ढंग की अनोखी है। इस स्वल्पकाय ग्रन्थ में सभी आवश्यक विषयों को बताया गया है। उनमें भी कतिपय विशिष्ट विषय—जैसे 'मन का' अनिन्द्रियत्व। 'वह्निमान् पर्वतः' में पर्वतांश की प्रत्यक्षत्वव्यवस्था। ज्ञानगतप्रत्यक्ष और विषयगतप्रत्यक्ष के भिन्न-भिन्न प्रयोजक। शब्द से भी प्रत्यक्षज्ञान की उत्पत्ति। जातिशक्तिवाद। अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि का पृथक् प्रमाणत्व। स्वतः प्रामाण्यवाद। महावाक्य में लक्षणा का खण्डन। एक अविद्यापक्ष का स्वीकार आदि विशिष्ट विषयों का प्रतिपादन इस ग्रन्थ में किया गया है।
( ४० )
आचार्य शंकर के अद्वैत सिद्धान्तों को हृदयंगम करने में यह 'वेदान्त-परिभाषा' नामक प्रकरणग्रन्थ नितान्त उपकारक है। आचार्य शंकर के अद्वैत-सिद्धान्त से भारतीयजीवन अत्यधिक प्रभावित है। जड-चेतन पदार्थों को, मनुष्यों
| आचार्य शंकर के अद्वैतसिद्धान्त का समर्थन | तथा देवताओं को उस परमपुरुष का अंग माना गया है। उसी परमपुरुष को सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म बताया गया है। सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म ये सभी शब्द एकार्थक हैं। इस सत् से ही संसार की उत्पत्ति हुई है, उसी पर यह संसार आश्रित है तथा प्रलय होने पर इसी में विलीन हो जाता है। |
|---|
संसार का नानात्व असत्य है और उसकी एकता ही एकमात्र सत्य है। १ अर्थात् संसार में एक ही सत्ता है। आत्मा या ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है, वह अनन्त ज्ञान तथा अनन्त आनन्द है। उसके अन्तर्गत कोई दूसरी सत्ता नहीं है। ब्रह्म ही एकमात्र विशुद्ध सत्ता है। तथापि अविद्या के कारण उसमें अनेक की प्रतीति होती है। अर्थात् अविद्या के कारण ब्रह्म का सत्य स्वरूप न जानकर हम उसे नानारूप में देखते हैं। यदि अज्ञान न होता तो हमें ब्रह्म की अनेकरूपता का भ्रम न होता। माया; अविद्या, अज्ञान वास्तव में एक ही हैं। दृष्टिभेद से यह भिन्न सी लगती हैं। माया (अज्ञान) और ब्रह्म दो शब्दों का प्रयोग करने पर भी विशुद्ध अद्वैत के प्रतिपादन में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो पाती। क्योंकि माया को उस परमेश्वर ब्रह्म की ही एक शक्ति कहा है। आचार्य शंकर ने अद्वैत को हृदयंगम कराने के लिये दो दृष्टियाँ बताई हैं—एक व्यावहारिक-दृष्टि और दूसरी पारमार्थिक-दृष्टि। पहिली दृष्टि साधारण मनुष्यों के लिये है जो संसार को सत्य मानते हैं; हमारा व्यावहारिक जीवन इसीपर निर्भर है। इस दृष्टि के अनुसार आचार्य शंकर ब्रह्म को सगुण या ईश्वर कहते हैं। दूसरी दृष्टि ज्ञानियों की है, जो संसार को मायिक और ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, ऐसा समझते हैं। इस दृष्टि के अनुसार ब्रह्म निर्गुण है। इस दृष्टि के अनुसार आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं रह जाता। यह पारमार्थिक दृष्टि अविद्या के दूर होने पर ही संभव है। अविद्या का नाश वेदान्त के ज्ञान से ही होता है। इस अज्ञान के कारण ही यह जीव अपने को ब्रह्म से पृथक् समझता है। मिथ्याज्ञान (अज्ञान) के दूर होने पर उसके दुःखों का भी अन्त हो जाता है। जिस तरह ब्रह्म आनन्दमय है उसी तरह आत्मा भी आनन्दमय हो जाती है। इति शम्।
—गजाननशास्त्री मुसलगांवकर
१. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किञ्चन ।'
॥ श्रीः॥
विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला
१००
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचिता
वेदान्तपरिभाषा
सविवरण 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेता
व्याख्याकार
वेदान्त-मीमांसा-साहित्याचार्य-
डॉ० श्रीगजानन शास्त्री मुसलगांवकर
एम. ए., पी-एच. डी.
अध्यक्ष—
मीमांसा-धर्मशास्त्रविभाग, प्राच्यविद्या-धर्मविज्ञान-संकाय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
सम्पादक
श्री श्रीरामशास्त्री मुसलगाँवकर
चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१
१९८३
विषय-विन्यास
प्रत्यक्ष-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| मंगलाचरण | १ |
| ग्रन्थारम्भ-प्रतिज्ञा | ५ |
| मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है और ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय | ६ |
| प्रमाण और प्रमा का लक्षण—प्रमा के भेद और उसके सम्बन्ध में विचार | ६ |
| प्रमाण के भेद तथा प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण | २० |
| प्रत्यक्ष प्रमा के सिद्धान्त पर शंका-समाधान | २४ |
| प्रत्यक्ष में अन्तःकरण की परिणामात्मक वृत्ति पर विचार | २६ |
| अन्तःकरण के सावयव होने का प्रतिपादन | २७ |
| कामादिक मनोधर्म हैं—इस पर शंका समाधान | ३० |
| मन के इन्द्रियत्व का खण्डन | ३१ |
| मन की अनिन्द्रियता पर शंका-समाधान | ३५ |
| ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक कौन है | ३७ |
| वृत्ति के बहिर्निर्गमन का प्रकार | ३६ |
| प्रत्यक्षप्रमा में प्रत्यक्षलक्षण का समन्वय | ४१ |
| विचार का निष्कर्ष | ४२ |
| सुखादिकों के प्रत्यक्ष में चक्षुरादिसन्निकर्ष की अनपेक्षता | ४३ |
| स्मर्यमाण सुख में प्रत्यक्षलक्षण की अतिव्याप्ति और उसका निरास | ४४ |
| पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने से दूसरा समाधान | ४५ |
| धर्माधर्मविषयक शाब्द ज्ञान में पुनः अतिव्याप्ति और उसका निरसन | " |
| 'त्वं सुखी' इस ज्ञान पर पुनः शंका-समाधान | ४८ |
| वह्नि की अनुमिति में 'पर्वत' अंश का प्रत्यक्ष होता है | ५० |
| न्यायमत में लोक-प्रसिद्धि का अतिक्रमण | " |
| असन्निकृष्टपक्षक अनुमिति में ज्ञान सभी अंशों में परोक्ष होता है | ५२ |
| 'सुरभि चन्दनम्' इस ज्ञान में भी 'चन्दन खण्ड' का प्रत्यक्ष और 'सौरभ' अंश का प्रत्यक्ष होता है | " |
| प्रसङ्गप्राप्त जातिखण्डन | ५४ |
| समवायखण्डन | ( टीका ) ५७ |
( ४२ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप—परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है | ६१ |
| ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण | ,, |
| विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक | ६२ |
| उस पर शंका-समाधान | ६३ |
| लक्षण में 'प्रमातृचैतन्य' क्यों नहीं कहा | ६५ |
| इसी पर अनेक शंकाएँ और समाधान | ६६ |
| विषयप्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण | ७३ |
| वृत्ति के चार प्रकार | ७४ |
| सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्ष के दो प्रकार | ७६ |
| 'सोऽयम्' इत्याकारक शब्द ज्ञान में निर्विकल्पक प्रत्यक्षत्व का व्यवस्थापन | ७८ |
| वेदान्तवाक्यों की अखण्डार्थपरता | ८३ |
| जीवसाक्षी और ईश्वरसाक्षी के भेद से प्रत्यक्ष के पुनः दो भेद | ८५ |
| विशेषण और उपाधि के लक्षण | ,, |
| नैयायिक लोग उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं | ,, |
| प्रत्येक जीवात्मा का साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न होता है | ८७ |
| ईश्वरसाक्षिचैतन्य तथा माया की एकता और अनादिता | ८८ |
| ईश्वर का स्वरूप और वही ब्रह्मादि शब्दों से वाच्य है | ९२ |
| औपाधिक सादित्व होने पर की चैतन्य के स्वाभाविक अनादित्व बाध नहीं | ९४ |
| ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का सामान्य लक्षण | ९६ |
| शुक्ति-रजत के प्रत्यक्ष पर विचार | ९७ |
| उस पर अन्यथाख्यातिवादी का शंका-समाधान | ९९ |
| अनिर्वचनीय रजत की उत्पत्ति | १०३ |
| तूलाविद्या और मूलाविद्या में अन्तर ( टीका | १०४ |
| परिणाम और विवर्त के लक्षण | १०७ |
| प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है | ,, |
| रजत का साक्षी में अध्यास तथा विविध आध्यासिक प्रत्यय | १०८ |
| रजतविषयक अविद्यावृत्ति के निष्प्रयोजनत्व की शंका समाधान | ११४ |
| रजतवृत्ति और इदंवृत्ति की भिन्नविषयता के स्वीकार करने पर गुरुमत के प्रवेश की आशंका | ११६ |
| प्रातिभासिक और व्यावहारिक पदार्थों में भेद | ११८ |
( ४३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्वाप्नपदार्थ विचार | १२१ |
| स्वाप्नपदार्थों के शुद्धचैतन्य पर आरोप के अनौचित्य की आशंका | १२६ |
| कार्यविनाश की द्विविधता बताते हुए उसका समाधान | १३० |
| प्रातिभासिकसत्ता के स्वीकार करने पर निषेध की अनुपपत्ति और व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताक-अभाव के स्वीकार करने पर उक्त अनुपपत्ति का निरास | १३४ |
| इसी प्रसंग पर कुछ शंका-समाधान | १३७ |
| उक्त प्रत्यक्ष के प्रकारान्तर से पुनः दो विभाग | १४२ |
| पाँच इन्द्रियाँ | १४३ |
अनुमान-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| अनुमान-प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा अनुमान का लक्षण | १४८ |
| असाधारण कारणत्वरूप का खण्डन | १५० |
| अनुमिति में व्याप्तिज्ञान की करणता पर शंका-समाधान | १५४ |
| उद्बुद्ध संस्कार से ही अनुमिति होती है | १५६ |
| अनुमिति में व्याप्तिस्मरण आदि की हेतुत्वेन कल्पना का खण्डन | १५८ |
| 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक अनुमित्यात्मक ज्ञान का खण्डन | १६० |
| व्याप्तिस्वरूप का उपपादन | १६१ |
| अनुमान की त्रिविधता का अनंगीकार | १६३ |
| अनुमान के दो भेद | १६६ |
| प्रकृत में अनुमान का उपयोग | १६८ |
| मिथ्यात्व का लक्षण | १६६ |
| मिथ्यात्व में अनुमान प्रमाण | १७२ |
| मिथ्यात्व के अनुमान पर शंका-समाधान | १७४ |
| पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने पर दूसरा समाधान | १७६ |
उपमान-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| उपमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा उपमान प्रमाण का लक्षण | १७६ |
| उपमान को स्वतन्त्र प्रमाण मानने की आवश्यकता | १८२ |
आगम-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आगमप्रमाण (शब्दप्रमाण) के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा उसका लक्षण और प्रमाणभूत वाक्य का लक्षण तथा उसकी शाब्द बोध में कारणता | १८७ |
( ४४ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आकांक्षा पदों के अर्थ और उनके लक्षणों का निरूपण | १६१ |
| इसी प्रसंग में बलाबलाधिकरण पर विचार | १६५ |
| आकांक्षा के लक्षण पर शंका-समाधान | १६८ |
| योग्यता का लक्षण और उस पर विचार | २०२ |
| आसत्ति का लक्षण और उस पर विचार | २०४ |
| पदार्थ के दो भेद | २०७ |
| पद की शक्ति पर विचार | २१० |
| लक्ष्यपदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षणा पर विचार | २२१ |
| शक्यपरंपरासम्बन्धरूप द्वितीय लक्षणा का प्रकार | २२३ |
| लक्षितलक्षणा में गौणी का अन्तर्भाव | २२४ |
| प्रकारान्तर से लक्षणा के तीन प्रकार तथा जहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२५ |
| अजहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२८ |
| जहदजहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२८ |
| 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' में अपना मत | २३० |
| विशिष्ट वाचक पद में केवल विशेषण की उपस्थिति लक्षणा से होती है | २३२ |
| तत्त्वमसि आदि वाक्यों में लक्षणा के बिना ही अखण्डार्थ की उपपत्ति | २३३ |
| लक्षणा के तीन प्रकार बताने का उपयोग | २३५ |
| लक्षणा में बीज | २३६ |
| लक्षणा वाक्य में भी होती है | २३८ |
| इस पर शंका-समाधान | २३६ |
| लौकिक वाक्य के समान वैदिक वाक्य में भी लक्षणा होती है | २४० |
| वाक्यैकवाक्यता | २४३ |
| आसत्ति में शाब्दबोध की हेतुता | २४४ |
| तात्पर्य-निरूपण | २४५ |
| अद्वैतियों का तात्पर्य लक्षण | २४७ |
| उस पर शंका समाधान | २४६ |
| तात्पर्यनिराकरणपरक विवरणवाक्य के आशय का उद्घाटन | २५४ |
| रत्नकार के मत से तात्पर्यनिरसनपरक विवरणग्रन्थ की उपपत्ति | २५५ |
| तात्पर्यज्ञान किससे होता है ? | २५६ |
| सिद्धार्थप्रतिपादक वाक्यों की भी प्रामाणिकता | २५८ |
| वेदप्रामाण्य की स्थापना के लिये नैयायिक तथा मीमांसकों के मतों का प्रतिपादन | २५६ |
( ४५ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वेदप्रामाण्य पर ग्रन्थकार का मत और उस पर शंका-समाधान | २६० |
| अपने सिद्धान्त की स्पष्टता | २६५ |
| अर्थापत्ति-परिच्छेदः | |
| अर्थापत्ति-निरूपण की प्रतिज्ञा और उसका लक्षण | २६६ |
| एक ही अर्थापत्ति शब्द, प्रमा और प्रमाण का वाचक है | २६७ |
| अर्थापत्ति के दो भेद और दृष्टार्थापत्ति का उदाहरण | २६८ |
| श्रुतार्थापत्ति का लक्षण और उदाहरण | २६९ |
| श्रुतार्थापत्ति के अवान्तर भेद | २७० |
| उस पर शंका-समाधान | २७२ |
| अभिहितानुपपत्तिरूप श्रुतार्थापत्ति का लक्षण और उदाहरण | २७३ |
| व्यतिरेक-व्याप्ति से अर्थापत्ति की अचरितार्थता | २७४ |
| उस पर शंका-समाधान | २७६ |
| नैयायिकों के व्यतिरेकी अनुमान का अनावश्यकता | २७७ |
| अनुपलब्धि-परिच्छेदः | |
| अनुपलब्धि प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा और उसका लक्षण | २७८ |
| उस पर शंका-समाधान | २८२ |
| योग्यानुपलब्धि में योग्यता के स्वरूप में अनेक विकल्पपूर्वक प्रश्न | २८३ |
| उनका समाधान | २८५ |
| अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानने पर शंका-समाधान | २८८ |
| अभाव के चार प्रकार | ३०० |
| प्रध्वंसाभाव का निरूपण | ३०१ |
| उस पर शंका-समाधान | ३०३ |
| अत्यन्ताभाव का निरूपण | ३०५ |
| अन्योन्याभाव का निरूपण | ३०६ |
| अन्योन्याभाव के भेद | ३०९ |
| उस पर शंका-समाधान | ३१० |
| अभाव की चतुर्विधता पर पूर्वाचार्यों की सम्मति | ३१२ |
| स्वतः प्रामाण्यवाद | ३१४ |
| अप्रामाण्य की परतोग्राह्यता | ३२३ |
| विषय-परिच्छेदः | |
| प्रमाणों में प्रामाण्य के दो प्रकार | ३२६ |
| 'तत्' पदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण के दो प्रकार तथा स्वरूपलक्षण की परिभाषा तथा उस पर शंका-समाधान | ३२७ |
( ४६ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तटस्थ लक्षण की परिभाषा | ३२८ |
| कर्तृत्व की परिभाषा | ३२६ |
| ज्ञान, इच्छा, कृति—तीनों मिलकर एक लक्षण नहीं हैं | ३३० |
| ब्रह्म का लघु लक्षण | ३३२ |
| उस पर शंका-समाधान | ३३३ |
| जगत् के जन्मक्रम और सूक्ष्म भूतों के गुणों का निरूपण | ३३४ |
| शब्द केवल आकाश का गुण नहीं है | ३३६ |
| इन्द्रियादि सृष्टि का निरूपण | ३३७ |
| पञ्च कर्मेन्द्रियाँ और प्राणों की उत्पत्ति | ३३८ |
| स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति और पंचीकरण का प्रकार | ३३६ |
| लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर की उत्पत्ति | ३४० |
| चतुर्विध स्थूल शरीरों की उत्पत्ति | ३४१ |
| ईश्वर में समस्तजगत्कर्तृत्व का निरूपण | ३४२ |
| शंका-समाधान के द्वारा निद्रित और मृत मनुष्य में अन्तर | ३४५ |
| प्राकृत प्रलय का निरूपण | ३४६ |
| नैमित्तिक प्रलय | ३४८ |
| प्राकृत प्रलय और नैमित्तिक प्रलय में प्रमाण | ३४८ |
| आत्यन्तिक प्रलय | ३४६ |
| प्रलय के क्रम का निरूपण | ३५० |
| ब्रह्म का तटस्थ लक्षण | ३५१ |
| ब्रह्म के जगत्कारणात्मक लक्षण पर शंका-समाधान | ३५२ |
| सृष्टिवाक्यों का तात्पर्य | ३५२ |
| उपासनादि वाक्यों का तात्पर्य-निरूपण | ३५४ |
| ईश्वर और जीव के स्वरूप का निरूपण | ३५५ |
| ( प्रतिबिम्बवाद ) 'अनेक जीववाद' पक्ष में दोष होने से अन्य मत-प्रदर्शन | ३५६ |
| एकजीववाद पक्ष पर कुछ आक्षेप और उनका निराकरण | ३५८ |
| सिद्धान्ती के द्वारा प्रदर्शित दृष्टान्त पर शंका-समाधान और 'तत्' पदार्थ के निरूपण की समाप्ति | ३५६ |
| 'त्वं' पदार्थ का निरूपण | ३६० |
| जीव की तीन अवस्थाओं का निरूपण | ३६० |
| अन्तःकरण वृत्ति के अङ्गीकार में मतभेद | ३६१ |
( ४७ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वृत्ति की आवश्यकता पर दूसरा मत | |
| उस पर शंका-समाधान | ३६५ |
| ग्रन्थकार द्वारा इसी मत का स्पष्टीकरण | ३६६ |
| इस मत में अभियुक्तों की संमति | " |
| अपरिच्छन्न पक्ष में भी वृत्ति की सम्बन्धार्थता | ३६७ |
| परिच्छिन्न पक्ष में वृत्ति की संबन्धार्थता | ३६८ |
| उस पर शंका-समाधान | ३६९ |
| स्वप्नावस्था का निरूपण | ३७० |
| सुषुप्ति का लक्षण | " |
| मरण और मूर्च्छा अवस्थाओं का विवेचन | ३७१ |
| जीव के सम्बन्ध में पुनर्वििवेचन | " |
| जीव की स्वयं प्रकाशता | ३७२ |
| 'तत्' और 'त्वम्' दोनों का ऐक्य | " |
| इस पर शंका और समाधान | ३७३ |
| पूर्वपक्षी के बताये गये अनुमान की व्यवस्था | ३७५ |
| पूर्वपक्षी के किये गये आगम प्रमाण की व्यवस्था | ३७६ |
| जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य मानने पर उनकी विरुद्धधर्माश्रयता की उपपत्ति | ३७६ |
| जीव पर कर्तृत्व के आरोप पर शंका-समाधान | ३७७ |
| इस पर पूर्वपक्षी का पुनः प्रश्नोत्तर | ३७८ |
| विषय-परिच्छेद का उपसंहार | ३८० |
प्रयोजन-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वेदान्तशास्त्र के प्रयोजन का निरूपण | ३८१ |
| प्रयोजन का लक्षण | ' |
| प्रयोजन की द्विविधता | " |
| मोक्ष का स्वरूप | ३८२ |
| मोक्ष के सम्बन्ध में शंका-समाधान | ३८३ |
| मोक्ष का साधन केवल ज्ञान ही हैं | ३८४ |
| उक्त ज्ञान का विषय जीव ब्रह्म की एकता है | " |
| यह ज्ञान अपरोक्ष है, परोक्ष नहीं | ३८५ |
| अपरोक्ष ज्ञान के साधनों में मतभेद | " |
| इस सम्बन्ध में पद्मपादाचार्य का मत | " |
( ४८ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| इसी पर वाचस्पति मिश्र का मत | ३८७ |
| ब्रह्मसाक्षात्कार में साधन सुसंस्कृत मन ही है | " |
| इस पर श्रुतिविरोध की आशंका और समाधान | " |
| शास्त्रदृष्टिसूत्र की भी उपपत्ति हो जाती है | ३८६ |
| कर्म का ज्ञान प्राप्ति में उपयोग | ३६० |
| श्रवण-मनन-निदिध्यासन का भी ज्ञानप्राप्ति में उपयोग | ३६१ |
| श्रवण-मंनन-निदिध्यासन की व्याख्या | " |
| ज्ञान के उपायों में वाचस्पति का मत | ३६२ |
| ज्ञान के उपायों में विवरणकार का मत | ३६३ |
| मनन-निदिध्यासन में मीमांसाशास्त्रोक्त श्रवणांगत्व नहीं हैं | ३६४ |
| प्रकरण प्रमाण के द्वारा मनन-निदिध्यासन में श्रवणांगत्व की शंका और उसका निरसन | ३६५ |
| दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त में वैषम्य | ३६६ |
| श्रवण से मनन-निदिध्यासन के सम्बन्ध में अपना मत | ३६७ |
| इस पर विवरणाचार्य की सम्मति | " |
| श्रवण का अधिकारी कौन हो सकता है ? | " |
| शमादिषट्क के लक्षण | ३६८ |
| उपरति शब्द के अर्थ में दो पक्ष | " |
| श्रवणजन्य तत्त्वज्ञान की मोक्षसाधनता पर शंका-समाधान | ३६६ |
| कर्म करने वालों की गति | ४०० |
| निर्गुंण ब्रह्मसाक्षात्कार करनेवालेकी प्रारब्ध कर्मों का विनाश होने परमुक्ति | ४०१ |
| इस पर शंका-समाधान | ४०३ |
| संचित कर्मों के प्रकार और उनका वर्गीकरण | ४०५ |
| इस पर शंका-समाधान | ४०५ |
| नाना अविद्या के मानने में गौरव होने से लाघवार्थ तीसरा पक्ष | ४०७ |
| इसी पक्ष में ग्रंथकार की सम्मति | " |
| उक्त पक्ष वाचस्पति मिश्र का है | " |
| इसी पक्ष की समीचीनता | ४०८ |
| प्रयोजन-परिच्छेद का उपसंहार | " |
| चित्रपट के द्वारा वेदान्तपरिभाषा का पुनरवलोकन | ४०६ |
| वेदान्तपरिभाषागत-उद्धरण-संकेत-सूची | ४२२ |
—: ० :—
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॥ श्रीः ॥
वेदान्तपरिभाषा
'प्रकाश'-हिन्दीव्याख्योपेता
प्रत्यक्षपरिच्छेदः
( मङ्गलाचरणम् )
यदविद्याविलासेन भूत-भौतिक-सृष्टयः ।
तं नौमि परमात्मानं सच्चिदानन्दविग्रहम्¹ ॥ १ ॥
अन्वयः— यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः ( भवन्ति ) तं सच्चिदानन्दविग्रहं परमात्मानं नौमि ।
अर्थ— जिसके अविद्यापरिणाम से आकाशादि भूत और उनके समस्त स्थूल सूक्ष्म विकार ( चराचर शरीर ) उत्पन्न होते हैं, उस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ ।
विवरण— 'वेदान्तपरिभाषा' वेदान्तशास्त्र का प्रकरण² ग्रन्थ है। धर्मराजाध्वरीन्द्र, इसके रचयिता हैं। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम श्लोक के द्वारा ग्रन्थकार ने—परमात्मा को नमस्कार रूप-मङ्गलाचरण किया है। आरम्भ किये हुए कार्य की निर्विघ्नतया समाप्ति के लिए आस्तिक जन मङ्गलाचरण किया करते हैं—यह एक शिष्टाचार है। वेदज्ञान-पूर्वक वेदोक्त धर्म का अनुष्ठान करने वालों को शिष्ट कहते हैं, इसलिए शिष्ट लोग धर्म-बुद्धि से जिसे करते हों वह आचार वेदमूलक कहलाता है। अतः कार्य के आरम्भ में मङ्गलाचरण करने का शिष्टाचार भी वेदमूलक है। आस्तिक ग्रन्थकार ग्रन्थ के आरम्भ में 'अपना ग्रन्थ निर्विघ्नतया समाप्त हो, गुरुशिष्यों के अध्ययनाध्यापन द्वारा उसका सम्प्रदाय दीर्घकाल तक चलता रहे' इस आशय से मङ्गलाचरण किया करते हैं। प्रकृत ग्रन्थकार ने भी इसी आशय से पद्यमय मङ्गलाचरण करके, विद्वानों की अपने ग्रन्थ के अवलोकन में प्रवृत्ति कराने के लिए उस मङ्गलाचरण द्वारा विषय और प्रयोजन रूप दो अनुबन्धों को भी प्रदर्शित किया है। 'तं परम् आत्मानं नौमि' उस पर—आत्मा को मैं
१. लक्षणम्-इति पाठान्तरम् ।
२. शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चित ॥—( वि० ध० पु० )
२ वेदान्तपरिभाषा [ मंगलाचरणम्
नमस्कार करता हूँ। उपर्युक्त श्लोक में यह मुख्य वाक्य है। अवशिष्ट पदों में से 'यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः' ये पद परमात्मा का तटस्थलक्षण¹ सूचित करते हैं और 'सच्चिदानन्दविग्रहम्' यह पद स्वरूपलक्षण² को बता रहा है। 'यदविद्याविलासेन' जिस परमात्मा की शक्तिभूत माया के परिणाम से आकाशादि-भूत और उन भूतों के शरीरेन्द्रियादि कार्यों की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं (जो परमात्मा भूतभौतिक कार्यों के उत्पत्त्यादिकों का विवर्तोपादान³ है) उस परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।
इसी तरह सत्स्वरूप, चित्स्वरूप और आनन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ। 'सत्, चित् और आनन्द' इन तीन पदों से शून्यवादी बौद्ध, प्रधानकारणवादी सांख्य और परमाणुकारणवादी वैशेषिकों के मत का निरसन किया गया है।
जगत्कारण ब्रह्म, 'सत्' है, क्योंकि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छां० उ० ६-१) यह सब जगत्, उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ब्रह्मरूप था, ऐसी श्रुति है। उसी तरह 'कथमसतः सज्जायेत' असत् से (शून्य से) सद्रूप जगत् कैसे उत्पन्न होगा? (छां० उ० ६-२), शून्यवाद का निषेध करनेवाली यह साक्षात् श्रुति है। इसके अतिरिक्त बौद्ध भी जगत् को अलीक रूप से स्वीकार करते हैं। किन्तु कोई भ्रम, बिना अधिष्ठान के नहीं होता। इसलिये 'जगत्कारण-शून्य' है यह कथन युक्तिरहित है।
'सन्मूलाः सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः' यह सब कार्य (सृष्टि) 'सन्मूल' है—'सत्' ही सब प्रजाओं का मूल है। (छां० उ० ६-८) इत्यादि अन्यान्य अनेक श्रुतियाँ, शून्यवाद के विरोध में हैं।
'अचेतन' (जड) जगत् का कारण जड 'प्रधान' और जड 'परमाणु' हैं, ऐसा क्रमशः सांख्य और वैशेषिक कहते हैं। परन्तु 'तदैक्षत' (छां० ४-२६) 'सोऽकामयत' (तै० १।६) 'आनन्दाद्धयेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते' (तै० १।६२) इत्यादि श्रुतियों से जगत्कारण, विज्ञान और आनन्द रूप है—यह निश्चय होता है, इस प्रकार प्रधानकारणवादी और परमाणुकारणवादी सांख्य तथा वैशेषिकों का निरसन हो जाता है। 'परमात्मानम्' इन पदों में से 'आत्मानम्' पद से परमेश्वर के तटस्थत्व (तटस्थता) का निरसन किया है। तटस्थ का अर्थ है आत्मा से पृथक्। परमेश्वर आत्मा से पृथक् नहीं है किन्तु वह, आत्मा ही है। इस बात को 'आत्मानम्' पद से सूचित करके 'परम्' विशेषण से देह, प्राण, मन, बुद्धि और सुषुप्ति के अन्नमय प्रभृति पांच कोशों से पृथक् 'अन्तर्यामी आत्मा' है—यह अर्थ अभिव्यक्त किया गया है। 'अन्तर्यामी' यह 'परमात्मा' पद का वाच्यार्थ है, और पर (माया-सम्बन्धरहित = माया से विलक्षण)
१. यावल्लक्ष्यकालमनवस्थाायित्वे सति यद् व्यावर्तकं तत् तटस्थलक्षणम्।
—(न्या० को०)
२. स्वरूपान्तर्गतत्वे सति व्यावर्तकं यत्, तत् स्वरूपलक्षणम्।—(सर्वद० सं०)
३. ब्रह्मणो विवर्तोपादानत्वात् मायायाश्च परिणाम्युपादानत्वाद् ब्रह्मकारणवादः सूचितो भवति।
मङ्गलाचरणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३
'आत्मा' ब्रह्म ( शुद्ध चित् ) यह लक्ष्यार्थ है। अर्थात् ग्रन्थकार ने पर और अपर दोनों प्रकार की आत्माओं का वन्दन किया है, और उसी के द्वारा जीव और ब्रह्म का संदिग्ध ( जो प्रत्यक्ष या अनुमान से अज्ञात है ) ऐक्य, इस ग्रन्थ का विषय है, और अज्ञान-निवृत्ति या आनन्दावाप्ति, प्रयोजन है—यह सूचित किया है।
इस प्रकार प्रथम श्लोक में परापर ब्रह्मरूप इष्ट देवता को वन्दन कर 'गुरुप्रसादात् परमार्थलाभः' इत्यादि वचन से 'गुरुप्रसाद', ब्रह्मविद्या प्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन है—यह प्रतीत होता है। अतः ग्रन्धारम्भ में गुरु की पूजा अवश्य की जानी चाहिए। इस आशय से प्रथमतः परम गुरु को ग्रन्थकार प्रणाम करते हैं।
( मंगलाचरणम् )
यदन्तेवासि-पञ्चास्यैर्निरस्ता भेदिधारणाः ।
तं प्रणौमि नृसिंहाख्यं यतीन्द्रं परमं गुरुम् ॥ २ ॥
अन्वयः—यदन्तेवासिपञ्चास्यैः भेदिधारणाः निरस्ताः तं यतीन्द्रं नृसिंहाख्यं परमं गुरुं प्रणौमि।
अर्थ—जिनके शिष्यरूपी सिंहों ने भेदवादी गजों का निवारण किया है, उन यति-श्रेष्ठ नृसिंह नामक परम गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
विवरण—जिसे प्रणाम किया जाय उसकी श्रेष्ठता सिद्ध करनी चाहिए। इसलिये ग्रन्थकार अपने परम गुरु-चरणों का द्वैतनिरसपूर्वक अद्वैत प्रस्थापन रूप कार्य, इस श्लोक में कैमुतिक-न्याय¹ से अभिव्यक्त करते हैं। अन्तेवासी का अर्थ है—जिनका गुरु के समीप रहने का शील है, अर्थात् शिष्य। जिनके अन्तेवासीरूप सिंहों ने, भेदवादिरूप गजों का निरसन किया, उन परम गुरुचरणों को मैं प्रणाम करता हूँ। यति का अर्थ है यत्नशील परमहंस परिव्राजक, उनमें श्रेष्ठ ऐसे 'नृसिंह' नाम के परम गुरु ( गुरु के गुरु ) को मैं शरीर, वाणी और मन के प्रणिधान ( नम्रता व एकाग्रता ) से प्रणाम करता हूँ।
जिन परम गुरु के शिष्यों ने ही द्वैतवाद का खण्डन किया उन गुरु की योग्यता का वर्णन क्या किया जाय ! व्यवहार में भी गुरु की योग्यता, शिष्यों से अभिव्यक्त हुआ करती है। अतः ग्रन्थकार के लिए परम गुरु सर्वथा वन्द्य हैं।
इस श्लोक में 'अन्तेवासिपञ्चास्यैः' बहुवचन का प्रयोग किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार के परम गुरु के अनेक विद्वान् शिष्य थे। तथापि इस शब्द का प्रयोग अपने विद्यागुरु के ही उद्देश्य से किया है, क्योंकि अग्रिम श्लोक में विद्यागुरु का
१. कैमुतिकन्याये हि अन्यार्थे तात्पर्यं मर्थवसीयते, स्वार्थे निषेधश्च भवति। यथा 'दोषा वाच्या गुरोरपि' इत्यत्र गुरोस्तु दोषा नैव वाच्याः' छात्रत्वभङ्गापत्तेः। अन्येषां तु सर्वेषामपि वाच्या इत्यर्थः।
४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मङ्गलाचरणम्
'जगद्गुरून्' ऐसा बहुवचन से उल्लेख किया है। इससे बहुवचन यहाँ आदरार्थ है—ऐसा व्यक्त होता है। अपने विद्यागुरु को 'पञ्चास्य' कहकर ग्रन्थकार ने अपना अधिकार भी व्यक्त किया है।
वैदिक सम्प्रदाय में वंश दो प्रकार से माना जाता है, एक विद्या द्वारा और दूसरा जन्म द्वारा (एक शिष्य, प्रशिष्य, प्रप्रशिष्य और दूसरा पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र इत्यादि)।
ग्रन्थकार के परम गुरु नृसिंह, उनके शिष्य सिंह और उनके ही विद्यावंश में पैदा हुआ मैं भी सिंह ही हूँ। इसलिये द्वैतवाद का निरसन करने में मैं समर्थ हूँ—यह बात ग्रन्थकार ने यहाँ ध्वनित की है।
'भेदिवारणाः' जीव और ईश्वर में भेद, जड़ और ईश्वर में भेद, जीवों का परस्पर भेद, जड़ और जीव में भेद, और जड़ों का परस्पर भेद—पांच प्रकार के इस भेद को जो लोग सत्य मानते हैं वे भेदी (द्वैतवादी) हैं, उन्हें गज का रूपक देकर अभेदवादी सिंह से वे भेदवादी निरस्त हैं। अर्थात् अभेदवादियों ने उनके भेदवाद का निरसन किया है। यहाँ दृष्टान्त के अनुसार 'निरसन' शब्द से 'नाश' अर्थ विवक्षित न होकर लक्षणा से 'उनके मत का असारत्व व्यक्त करके उनसे अद्वैत सिद्धान्त का ग्रहण करवाया' इतना ही अर्थ समझना चाहिए।
इस प्रकार ग्रन्थकार, परमगुरु को प्रणाम करके अग्रिम श्लोक में प्रत्यक्ष विद्यागुरु को वन्दन करते हैं।$^१$
( मङ्गलाचरणम् )
श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् वेलाङ्गुडिनिवासिनः ।
जगद्गुरून्नहं वन्दे सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान् ॥ ३ ॥
**अन्वय—**अहं सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान् वेलाङ्गुडिनिवासिनः श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् जगद्गुरून् वन्दे।
**अर्थ—**वेलाङ्गुड़ि ग्राम में रहनेवाले, समस्त शास्त्रों का अध्यापन करनेवाले श्रीमद् वेङ्कटनाथ नामक जगद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
विवरण—'सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान्' अध्यापन के द्वारा सर्वशास्त्रों के प्रवर्त्तक—इस विशेषण से अपने विद्यागुरु की योग्यता को प्रकट किया है। 'जगद्गुरून्' विशेषण से भी परमतखण्डनपूर्वक स्वसिद्धान्तस्थापन करने का सामर्थ्य सूचित किया है। इन तीन श्लोकों में व्यावहारिक कल्पित भेद का ग्रहण करके अपने इष्टदेवता, परमगुरु और विद्यागुरु को प्रणाम किया है, क्योंकि अद्वैतवाद में वन्द्यवन्दकभाव सम्भव नहीं।
१. श्वेताश्वतर उपनिषद् के 'यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः" इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि पूजा, प्रणाम आदि से उपोद्वलित भक्ति, विद्याप्राप्ति में अङ्ग है।