वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ वेदान्तपरिभाषा [ मंगलाचरणम्
नमस्कार करता हूँ। उपर्युक्त श्लोक में यह मुख्य वाक्य है। अवशिष्ट पदों में से 'यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः' ये पद परमात्मा का तटस्थलक्षण¹ सूचित करते हैं और 'सच्चिदानन्दविग्रहम्' यह पद स्वरूपलक्षण² को बता रहा है। 'यदविद्याविलासेन' जिस परमात्मा की शक्तिभूत माया के परिणाम से आकाशादि-भूत और उन भूतों के शरीरेन्द्रियादि कार्यों की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं (जो परमात्मा भूतभौतिक कार्यों के उत्पत्त्यादिकों का विवर्तोपादान³ है) उस परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।
इसी तरह सत्स्वरूप, चित्स्वरूप और आनन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ। 'सत्, चित् और आनन्द' इन तीन पदों से शून्यवादी बौद्ध, प्रधानकारणवादी सांख्य और परमाणुकारणवादी वैशेषिकों के मत का निरसन किया गया है।
जगत्कारण ब्रह्म, 'सत्' है, क्योंकि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छां० उ० ६-१) यह सब जगत्, उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ब्रह्मरूप था, ऐसी श्रुति है। उसी तरह 'कथमसतः सज्जायेत' असत् से (शून्य से) सद्रूप जगत् कैसे उत्पन्न होगा? (छां० उ० ६-२), शून्यवाद का निषेध करनेवाली यह साक्षात् श्रुति है। इसके अतिरिक्त बौद्ध भी जगत् को अलीक रूप से स्वीकार करते हैं। किन्तु कोई भ्रम, बिना अधिष्ठान के नहीं होता। इसलिये 'जगत्कारण-शून्य' है यह कथन युक्तिरहित है।
'सन्मूलाः सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः' यह सब कार्य (सृष्टि) 'सन्मूल' है—'सत्' ही सब प्रजाओं का मूल है। (छां० उ० ६-८) इत्यादि अन्यान्य अनेक श्रुतियाँ, शून्यवाद के विरोध में हैं।
'अचेतन' (जड) जगत् का कारण जड 'प्रधान' और जड 'परमाणु' हैं, ऐसा क्रमशः सांख्य और वैशेषिक कहते हैं। परन्तु 'तदैक्षत' (छां० ४-२६) 'सोऽकामयत' (तै० १।६) 'आनन्दाद्धयेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते' (तै० १।६२) इत्यादि श्रुतियों से जगत्कारण, विज्ञान और आनन्द रूप है—यह निश्चय होता है, इस प्रकार प्रधानकारणवादी और परमाणुकारणवादी सांख्य तथा वैशेषिकों का निरसन हो जाता है। 'परमात्मानम्' इन पदों में से 'आत्मानम्' पद से परमेश्वर के तटस्थत्व (तटस्थता) का निरसन किया है। तटस्थ का अर्थ है आत्मा से पृथक्। परमेश्वर आत्मा से पृथक् नहीं है किन्तु वह, आत्मा ही है। इस बात को 'आत्मानम्' पद से सूचित करके 'परम्' विशेषण से देह, प्राण, मन, बुद्धि और सुषुप्ति के अन्नमय प्रभृति पांच कोशों से पृथक् 'अन्तर्यामी आत्मा' है—यह अर्थ अभिव्यक्त किया गया है। 'अन्तर्यामी' यह 'परमात्मा' पद का वाच्यार्थ है, और पर (माया-सम्बन्धरहित = माया से विलक्षण)
१. यावल्लक्ष्यकालमनवस्थाायित्वे सति यद् व्यावर्तकं तत् तटस्थलक्षणम्।
—(न्या० को०)
२. स्वरूपान्तर्गतत्वे सति व्यावर्तकं यत्, तत् स्वरूपलक्षणम्।—(सर्वद० सं०)
३. ब्रह्मणो विवर्तोपादानत्वात् मायायाश्च परिणाम्युपादानत्वाद् ब्रह्मकारणवादः सूचितो भवति।