वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥
वेदान्तपरिभाषा
'प्रकाश'-हिन्दीव्याख्योपेता
प्रत्यक्षपरिच्छेदः
( मङ्गलाचरणम् )
यदविद्याविलासेन भूत-भौतिक-सृष्टयः ।
तं नौमि परमात्मानं सच्चिदानन्दविग्रहम्¹ ॥ १ ॥
अन्वयः— यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः ( भवन्ति ) तं सच्चिदानन्दविग्रहं परमात्मानं नौमि ।
अर्थ— जिसके अविद्यापरिणाम से आकाशादि भूत और उनके समस्त स्थूल सूक्ष्म विकार ( चराचर शरीर ) उत्पन्न होते हैं, उस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ ।
विवरण— 'वेदान्तपरिभाषा' वेदान्तशास्त्र का प्रकरण² ग्रन्थ है। धर्मराजाध्वरीन्द्र, इसके रचयिता हैं। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम श्लोक के द्वारा ग्रन्थकार ने—परमात्मा को नमस्कार रूप-मङ्गलाचरण किया है। आरम्भ किये हुए कार्य की निर्विघ्नतया समाप्ति के लिए आस्तिक जन मङ्गलाचरण किया करते हैं—यह एक शिष्टाचार है। वेदज्ञान-पूर्वक वेदोक्त धर्म का अनुष्ठान करने वालों को शिष्ट कहते हैं, इसलिए शिष्ट लोग धर्म-बुद्धि से जिसे करते हों वह आचार वेदमूलक कहलाता है। अतः कार्य के आरम्भ में मङ्गलाचरण करने का शिष्टाचार भी वेदमूलक है। आस्तिक ग्रन्थकार ग्रन्थ के आरम्भ में 'अपना ग्रन्थ निर्विघ्नतया समाप्त हो, गुरुशिष्यों के अध्ययनाध्यापन द्वारा उसका सम्प्रदाय दीर्घकाल तक चलता रहे' इस आशय से मङ्गलाचरण किया करते हैं। प्रकृत ग्रन्थकार ने भी इसी आशय से पद्यमय मङ्गलाचरण करके, विद्वानों की अपने ग्रन्थ के अवलोकन में प्रवृत्ति कराने के लिए उस मङ्गलाचरण द्वारा विषय और प्रयोजन रूप दो अनुबन्धों को भी प्रदर्शित किया है। 'तं परम् आत्मानं नौमि' उस पर—आत्मा को मैं
१. लक्षणम्-इति पाठान्तरम् ।
२. शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चित ॥—( वि० ध० पु० )