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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

॥ श्रीः ॥

वेदान्तपरिभाषा

'प्रकाश'-हिन्दीव्याख्योपेता


प्रत्यक्षपरिच्छेदः

( मङ्गलाचरणम् )

यदविद्याविलासेन भूत-भौतिक-सृष्टयः ।
तं नौमि परमात्मानं सच्चिदानन्दविग्रहम्¹ ॥ १ ॥

अन्वयः— यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः ( भवन्ति ) तं सच्चिदानन्दविग्रहं परमात्मानं नौमि ।

अर्थ— जिसके अविद्यापरिणाम से आकाशादि भूत और उनके समस्त स्थूल सूक्ष्म विकार ( चराचर शरीर ) उत्पन्न होते हैं, उस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ ।

विवरण— 'वेदान्तपरिभाषा' वेदान्तशास्त्र का प्रकरण² ग्रन्थ है। धर्मराजाध्वरीन्द्र, इसके रचयिता हैं। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम श्लोक के द्वारा ग्रन्थकार ने—परमात्मा को नमस्कार रूप-मङ्गलाचरण किया है। आरम्भ किये हुए कार्य की निर्विघ्नतया समाप्ति के लिए आस्तिक जन मङ्गलाचरण किया करते हैं—यह एक शिष्टाचार है। वेदज्ञान-पूर्वक वेदोक्त धर्म का अनुष्ठान करने वालों को शिष्ट कहते हैं, इसलिए शिष्ट लोग धर्म-बुद्धि से जिसे करते हों वह आचार वेदमूलक कहलाता है। अतः कार्य के आरम्भ में मङ्गलाचरण करने का शिष्टाचार भी वेदमूलक है। आस्तिक ग्रन्थकार ग्रन्थ के आरम्भ में 'अपना ग्रन्थ निर्विघ्नतया समाप्त हो, गुरुशिष्यों के अध्ययनाध्यापन द्वारा उसका सम्प्रदाय दीर्घकाल तक चलता रहे' इस आशय से मङ्गलाचरण किया करते हैं। प्रकृत ग्रन्थकार ने भी इसी आशय से पद्यमय मङ्गलाचरण करके, विद्वानों की अपने ग्रन्थ के अवलोकन में प्रवृत्ति कराने के लिए उस मङ्गलाचरण द्वारा विषय और प्रयोजन रूप दो अनुबन्धों को भी प्रदर्शित किया है। 'तं परम् आत्मानं नौमि' उस पर—आत्मा को मैं


१. लक्षणम्-इति पाठान्तरम् ।
२. शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चित ॥—( वि० ध० पु० )

२ वेदान्तपरिभाषा [ मंगलाचरणम्

नमस्कार करता हूँ। उपर्युक्त श्लोक में यह मुख्य वाक्य है। अवशिष्ट पदों में से 'यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः' ये पद परमात्मा का तटस्थलक्षण¹ सूचित करते हैं और 'सच्चिदानन्दविग्रहम्' यह पद स्वरूपलक्षण² को बता रहा है। 'यदविद्याविलासेन' जिस परमात्मा की शक्तिभूत माया के परिणाम से आकाशादि-भूत और उन भूतों के शरीरेन्द्रियादि कार्यों की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं (जो परमात्मा भूतभौतिक कार्यों के उत्पत्त्यादिकों का विवर्तोपादान³ है) उस परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

इसी तरह सत्स्वरूप, चित्स्वरूप और आनन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ। 'सत्, चित् और आनन्द' इन तीन पदों से शून्यवादी बौद्ध, प्रधानकारणवादी सांख्य और परमाणुकारणवादी वैशेषिकों के मत का निरसन किया गया है।

जगत्कारण ब्रह्म, 'सत्' है, क्योंकि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छां० उ० ६-१) यह सब जगत्, उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ब्रह्मरूप था, ऐसी श्रुति है। उसी तरह 'कथमसतः सज्जायेत' असत् से (शून्य से) सद्‌रूप जगत् कैसे उत्पन्न होगा? (छां० उ० ६-२), शून्यवाद का निषेध करनेवाली यह साक्षात् श्रुति है। इसके अतिरिक्त बौद्ध भी जगत् को अलीक रूप से स्वीकार करते हैं। किन्तु कोई भ्रम, बिना अधिष्ठान के नहीं होता। इसलिये 'जगत्कारण-शून्य' है यह कथन युक्तिरहित है।

'सन्मूलाः सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः' यह सब कार्य (सृष्टि) 'सन्मूल' है—'सत्' ही सब प्रजाओं का मूल है। (छां० उ० ६-८) इत्यादि अन्यान्य अनेक श्रुतियाँ, शून्यवाद के विरोध में हैं।

'अचेतन' (जड) जगत् का कारण जड 'प्रधान' और जड 'परमाणु' हैं, ऐसा क्रमशः सांख्य और वैशेषिक कहते हैं। परन्तु 'तदैक्षत' (छां० ४-२६) 'सोऽकामयत' (तै० १।६) 'आनन्दाद्धयेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते' (तै० १।६२) इत्यादि श्रुतियों से जगत्कारण, विज्ञान और आनन्द रूप है—यह निश्चय होता है, इस प्रकार प्रधानकारणवादी और परमाणुकारणवादी सांख्य तथा वैशेषिकों का निरसन हो जाता है। 'परमात्मानम्' इन पदों में से 'आत्मानम्' पद से परमेश्वर के तटस्थत्व (तटस्थता) का निरसन किया है। तटस्थ का अर्थ है आत्मा से पृथक्। परमेश्वर आत्मा से पृथक् नहीं है किन्तु वह, आत्मा ही है। इस बात को 'आत्मानम्' पद से सूचित करके 'परम्' विशेषण से देह, प्राण, मन, बुद्धि और सुषुप्ति के अन्नमय प्रभृति पांच कोशों से पृथक् 'अन्तर्यामी आत्मा' है—यह अर्थ अभिव्यक्त किया गया है। 'अन्तर्यामी' यह 'परमात्मा' पद का वाच्यार्थ है, और पर (माया-सम्बन्धरहित = माया से विलक्षण)


१. यावल्लक्ष्यकालमनवस्थाायित्वे सति यद् व्यावर्तकं तत् तटस्थलक्षणम्। —(न्या० को०)
२. स्वरूपान्तर्गतत्वे सति व्यावर्तकं यत्, तत् स्वरूपलक्षणम्।—(सर्वद० सं०)
३. ब्रह्मणो विवर्तोपादानत्वात् मायायाश्च परिणाम्युपादानत्वाद् ब्रह्मकारणवादः सूचितो भवति।

मङ्गलाचरणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३

'आत्मा' ब्रह्म ( शुद्ध चित् ) यह लक्ष्यार्थ है। अर्थात् ग्रन्थकार ने पर और अपर दोनों प्रकार की आत्माओं का वन्दन किया है, और उसी के द्वारा जीव और ब्रह्म का संदिग्ध ( जो प्रत्यक्ष या अनुमान से अज्ञात है ) ऐक्य, इस ग्रन्थ का विषय है, और अज्ञान-निवृत्ति या आनन्दावाप्ति, प्रयोजन है—यह सूचित किया है।

इस प्रकार प्रथम श्लोक में परापर ब्रह्मरूप इष्ट देवता को वन्दन कर 'गुरुप्रसादात् परमार्थलाभः' इत्यादि वचन से 'गुरुप्रसाद', ब्रह्मविद्या प्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन है—यह प्रतीत होता है। अतः ग्रन्धारम्भ में गुरु की पूजा अवश्य की जानी चाहिए। इस आशय से प्रथमतः परम गुरु को ग्रन्थकार प्रणाम करते हैं।

( मंगलाचरणम् )

यदन्तेवासि-पञ्चास्यैर्निरस्ता भेदिधारणाः ।
तं प्रणौमि नृसिंहाख्यं यतीन्द्रं परमं गुरुम् ॥ २ ॥

अन्वयः—यदन्तेवासिपञ्चास्यैः भेदिधारणाः निरस्ताः तं यतीन्द्रं नृसिंहाख्यं परमं गुरुं प्रणौमि।

अर्थ—जिनके शिष्यरूपी सिंहों ने भेदवादी गजों का निवारण किया है, उन यति-श्रेष्ठ नृसिंह नामक परम गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।

विवरण—जिसे प्रणाम किया जाय उसकी श्रेष्ठता सिद्ध करनी चाहिए। इसलिये ग्रन्थकार अपने परम गुरु-चरणों का द्वैतनिरसपूर्वक अद्वैत प्रस्थापन रूप कार्य, इस श्लोक में कैमुतिक-न्याय¹ से अभिव्यक्त करते हैं। अन्तेवासी का अर्थ है—जिनका गुरु के समीप रहने का शील है, अर्थात् शिष्य। जिनके अन्तेवासीरूप सिंहों ने, भेदवादिरूप गजों का निरसन किया, उन परम गुरुचरणों को मैं प्रणाम करता हूँ। यति का अर्थ है यत्नशील परमहंस परिव्राजक, उनमें श्रेष्ठ ऐसे 'नृसिंह' नाम के परम गुरु ( गुरु के गुरु ) को मैं शरीर, वाणी और मन के प्रणिधान ( नम्रता व एकाग्रता ) से प्रणाम करता हूँ।

जिन परम गुरु के शिष्यों ने ही द्वैतवाद का खण्डन किया उन गुरु की योग्यता का वर्णन क्या किया जाय ! व्यवहार में भी गुरु की योग्यता, शिष्यों से अभिव्यक्त हुआ करती है। अतः ग्रन्थकार के लिए परम गुरु सर्वथा वन्द्य हैं।

इस श्लोक में 'अन्तेवासिपञ्चास्यैः' बहुवचन का प्रयोग किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार के परम गुरु के अनेक विद्वान् शिष्य थे। तथापि इस शब्द का प्रयोग अपने विद्यागुरु के ही उद्देश्य से किया है, क्योंकि अग्रिम श्लोक में विद्यागुरु का


१. कैमुतिकन्याये हि अन्यार्थे तात्पर्यं मर्थवसीयते, स्वार्थे निषेधश्च भवति। यथा 'दोषा वाच्या गुरोरपि' इत्यत्र गुरोस्तु दोषा नैव वाच्याः' छात्रत्वभङ्गापत्तेः। अन्येषां तु सर्वेषामपि वाच्या इत्यर्थः।

४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मङ्गलाचरणम्

'जगद्गुरून्' ऐसा बहुवचन से उल्लेख किया है। इससे बहुवचन यहाँ आदरार्थ है—ऐसा व्यक्त होता है। अपने विद्यागुरु को 'पञ्चास्य' कहकर ग्रन्थकार ने अपना अधिकार भी व्यक्त किया है।

वैदिक सम्प्रदाय में वंश दो प्रकार से माना जाता है, एक विद्या द्वारा और दूसरा जन्म द्वारा (एक शिष्य, प्रशिष्य, प्रप्रशिष्य और दूसरा पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र इत्यादि)।

ग्रन्थकार के परम गुरु नृसिंह, उनके शिष्य सिंह और उनके ही विद्यावंश में पैदा हुआ मैं भी सिंह ही हूँ। इसलिये द्वैतवाद का निरसन करने में मैं समर्थ हूँ—यह बात ग्रन्थकार ने यहाँ ध्वनित की है।

'भेदिवारणाः' जीव और ईश्वर में भेद, जड़ और ईश्वर में भेद, जीवों का परस्पर भेद, जड़ और जीव में भेद, और जड़ों का परस्पर भेद—पांच प्रकार के इस भेद को जो लोग सत्य मानते हैं वे भेदी (द्वैतवादी) हैं, उन्हें गज का रूपक देकर अभेदवादी सिंह से वे भेदवादी निरस्त हैं। अर्थात् अभेदवादियों ने उनके भेदवाद का निरसन किया है। यहाँ दृष्टान्त के अनुसार 'निरसन' शब्द से 'नाश' अर्थ विवक्षित न होकर लक्षणा से 'उनके मत का असारत्व व्यक्त करके उनसे अद्वैत सिद्धान्त का ग्रहण करवाया' इतना ही अर्थ समझना चाहिए।

इस प्रकार ग्रन्थकार, परमगुरु को प्रणाम करके अग्रिम श्लोक में प्रत्यक्ष विद्यागुरु को वन्दन करते हैं।$^१$

( मङ्गलाचरणम् )

श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् वेलाङ्गुडिनिवासिनः ।
जगद्गुरून्नहं वन्दे सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान् ॥ ३ ॥

**अन्वय—**अहं सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान् वेलाङ्गुडिनिवासिनः श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् जगद्गुरून् वन्दे।

**अर्थ—**वेलाङ्गुड़ि ग्राम में रहनेवाले, समस्त शास्त्रों का अध्यापन करनेवाले श्रीमद् वेङ्कटनाथ नामक जगद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।

विवरण—'सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान्' अध्यापन के द्वारा सर्वशास्त्रों के प्रवर्त्तक—इस विशेषण से अपने विद्यागुरु की योग्यता को प्रकट किया है। 'जगद्गुरून्' विशेषण से भी परमतखण्डनपूर्वक स्वसिद्धान्तस्थापन करने का सामर्थ्य सूचित किया है। इन तीन श्लोकों में व्यावहारिक कल्पित भेद का ग्रहण करके अपने इष्टदेवता, परमगुरु और विद्यागुरु को प्रणाम किया है, क्योंकि अद्वैतवाद में वन्द्यवन्दकभाव सम्भव नहीं।


१. श्वेताश्वतर उपनिषद् के 'यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः" इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि पूजा, प्रणाम आदि से उपोद्वलित भक्ति, विद्याप्राप्ति में अङ्ग है।

ग्रन्थारम्भप्रतिज्ञा ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः

अब ग्रन्थकार अपने चिकीर्षित ग्रन्थ का ग्राह्यत्व तथा श्रद्धेयता सूचित करने के लिए और अपने यश के प्रदर्शनार्थ अपने विविध-ग्रन्थों की रचना को प्रदर्शित कर चिकीर्षित ग्रन्थ की प्रतिज्ञा करते हैं—

( ग्रन्थकर्तुः ग्रन्थनिर्माणयोग्यताप्रदर्शनम् )
येन चिन्तामणौ टीका दशटीकावि(प्र)भञ्जिनी ।
तर्कचूडामणिर्नाम कृता विद्वन्मनोरमा ॥ ४ ॥

( ग्रन्थारम्भप्रतिज्ञा )
ब्रह्म¹-बोधाय मन्दानां वेदान्तार्थविलम्बिनी ।
धर्मराजाध्वरीन्द्रेण परिभाषा वितन्यते ॥ ५ ॥

अन्वयः—येन ( धर्मराजाध्वरीन्द्रेण ) चिन्तामणौ दशटीकाविभञ्जिनी विद्वन्मनोरमा तर्कचूडामणिः नाम टीका कृता ( तेन ) धर्मराजाध्वरीन्द्रेण मन्दानां ब्रह्मबोधाय वेदान्तार्थविलम्बिनी परिभाषा वितन्यते ।

अर्थ—जिस धर्मराजाध्वरीन्द्र ने 'तत्त्वचिन्तामणि' नाम के ग्रन्थ पर दस टीकाओं का खण्डन करने वाली और विद्वानों को आह्लाद देनेवाली 'तर्कचूडामणि' नाम की टीका की, उसी धर्मराजाध्वरीन्द्र के द्वारा मन्दजनों के तत्त्व (ब्रह्म) बोधार्थ वेदान्त के अर्थ का अवलम्बन करने वाली यह परिभाषा ( वेदान्तपरिभाषा ) की जाती है ।

विवरण—वेदान्त के इस प्रकरण ग्रन्थ का विशेषतः नैयायिकों के मत की निःसारता को उन्हीं की प्रक्रिया के द्वारा प्रदर्शित करने के लिए आरम्भ किया गया है । इसलिए ग्रन्थकार न्यायशास्त्र में अपना अधिकार प्रदर्शित करने के लिए स्वरचित पूर्व-ग्रन्थ का निर्देश कर रहे हैं । प्रसिद्ध नैयायिक गंगेशोपाध्याय ने न्याय-शास्त्र पर 'तत्त्वचिन्तामणि' नाम का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा है । उन्हीं से नवीन-न्याय प्रवृत्त हुआ । उनसे पूर्व के नैयायिकों को प्राचीन या जरन्नैयायिक कहते हैं । उनके मत को प्राचीन-न्याय-मत कहते हैं । आजकल प्राचीन-न्याय मत की अपेक्षा नवीन-न्याय का ही अध्ययनाध्यापन अधिकता से चलता है । इस नवीन-न्याय ग्रंथ पर टीका, उपटीका, प्रकरण-ग्रन्थ इत्यादिकों की रचना होने से उसका बहुत बड़ा विस्तार हुआ है । इस ग्रन्थ पर ग्रन्थकार ने दस टीकाओं का खण्डन करने वाली 'चूडामणि' नाम की विद्वन्मान्य टीका लिखी है । यह कहकर न्यायशास्त्र में अपना अधिकार तथा उस ग्रन्थ का महत्त्व और विद्वन्मान्यतादि तीन गुणों को प्रदर्शित किया है । इससे ग्रन्थकार के विद्यागुरु की योग्यता प्रकट होती है । ग्रन्थकार स्वयं महानैयायिक होते हुए भी वेदान्त-सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे । अतएव न्यायशास्त्र पर विद्वन्मान्य ग्रन्थ लिखकर भी अपनी कृतकृत्यता न मानकर मन्दबुद्धि, आलसी लोगों को भी सुगमता से तत्त्वज्ञान कराने के लिए वेदान्त के मुख्य तथा अवान्तर प्रतिपाद्य विषयों का प्रतिपादन करने के लिए उन्होंने इस ग्रन्थ का प्रारम्भ किया है । जिन बुद्धिमान् तथा निरलस लोगों को सूत्रभाष्यादि


१. तेन-इति पाठान्तरम् ।

६ | वेदान्तपरिभाषा | [ पुरुषार्थनिरूपणम्

ग्रन्थों के अभ्यास से तत्त्वबोध होता है। उन्हें इस ग्रन्थ की ऐसी आवश्यकता नहीं है। तथापि 'मैं इस ग्रन्थ को मन्दबुद्धियों पर अनुग्रह करने के हेतु लिख रहा हूँ' यह कह-कर ग्रन्थकार ने प्राचीन आकर-ग्रन्थों के विषय में अपना आदर अभिव्यक्त करके वेदान्तसारादि अन्यान्य संक्षिप्त ग्रन्थों से, समस्त वेदान्त के तात्पर्यार्थ-प्रतिपादक इस ग्रन्थ का विषय गतार्थ नहीं हो पाया है, यह भी सूचित किया है। इस ग्रन्थ में वेदान्त की प्रक्रिया से प्रमाण-प्रमेयादि पदार्थों का निरूपण किया गया है। इसलिए इस ग्रन्थ को 'परिभाषा' यह अन्वर्थ नाम दिया गया है।$^१$ 'वेदान्तार्थविलम्बिनी' विशेषण से यह परिभाषा स्वकपोलकल्पित न होकर वेदान्त (उपनिषद्) के प्रतिपाद्य अर्थों का प्रतिपादन करने वाली है। उपनिषदों का मूल आधार होने से इस 'परिभाषा' की प्रामाणिकता ध्वनित होती है।

'बोधाय' पद से तत्त्वज्ञानरूप प्रयोजन (फल) साक्षात् कहा है। इस प्रकार पूर्वोक्त पाँच श्लोकों से इष्ट देवता, देवता, परमगुरु और साक्षात् गुरु को प्रणाम करके 'वेदान्त परिभाषा' ग्रन्थ लिखने की प्रतिज्ञा की गई है। अब इस चिकीर्षित ग्रन्थ की शारीरक मीमांसा से संगति सूचित करने के लिए प्रथमतः इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य बताते हैं—

( पुरुषार्थनिरूपणम् )

इह खलु धर्मार्थ-काम-मोक्षाख्येषु चतुर्विध-पुरुषार्थेषु मोक्ष एव परमपुरुषार्थः, 'न स$^२$ पुनरावर्त्तते' छां० ८-१५-१ इति$^३$ श्रुत्या तस्य नित्यत्वावगमात्। इतरेषां त्रयाणां (तु) प्रत्यक्षेण,$^४$ 'तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' छां० ८-१-६ इत्यादिश्रुत्या चानित्यत्वावगमात्। स च ब्रह्मज्ञानात्—इति ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते$^५$॥

अर्थ—इस श्लोक में तथा वेदों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थों में से मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ$^६$ है—यह प्रसिद्ध है। क्योंकि "वह आत्मज्ञ पुनः इस


१. 'परितोव्याप्तां भाषां प्रचक्षते'—[ न्या० को० पृ० ४८० ]
२. न च—इति पाठान्तरम्। ३. इत्यादि—इति पाठान्तरम्।
४. धर्मादित्रयाणां परमपुरुषार्थत्वाभावे प्रत्यक्षेण, यत्कृतकं तत् अनित्यमिति सामा-न्यतोदृष्टानुमानाऽनुगृहीतश्रुत्या च अवगतमनित्यत्वं हेतुः।
५. मोक्ष एव परमः पुरुषार्थः। परमत्वं च निरतिशयत्वे सति क्षयशून्यत्वम्।
६. ननु ब्रह्मज्ञानस्य मोक्षोपायत्वात् ब्रह्मज्ञानमेव निरूपणीयम्। किमर्थं तावद् ब्रह्म-निरूपणम्? इति चेन्न, विषयनिरूपणं विना ज्ञानस्य निरूपणं दुःशकं, यतो ज्ञानस्य विषय-निरूप्यत्वात्। प्राधान्याच्च ब्रह्मणोऽपि निरूपणीयत्वम्। तज्ज्ञानं ब्रह्मज्ञानमित्यर्थः। इत-

पुरुषार्थनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७

संसार में जन्म नहीं लेता" छां० उ० ८।१५। इस श्रुति से मोक्ष की नित्यता ज्ञात होती है। उसी प्रकार मोक्ष के अतिरिक्त अन्य (धर्म, अर्थ, काम) तीन पुरुषार्थों की अनित्यता प्रत्यक्ष से तथा श्रुति से ज्ञात होती है। इस विषय में दृष्टान्त "जैसे इस लोक में कृष्यादि कर्म से संपादन किया हुआ धान्यादि, लोक (फल) क्षीण होता है, उसी तरह परलोक में पुण्यरूप अदृष्ट से संपादन किया हुआ स्वर्गादिलोक भी क्षय को प्राप्त होता है।" छां० उ० ८।१। यह श्रुति दृष्टान्त द्वारा धर्म के फल की अनित्यता को बताती है। और अर्थ तथा काम इन दो पुरुषार्थों की अनित्यता प्रत्यक्ष और श्रुतिरूप प्रमाणों से अवगत होती है। वह नित्य मोक्ष, ब्रह्मज्ञानरूप साधन से ही प्राप्त होता है। इसलिए इस ग्रन्थ में ब्रह्म, उसका ज्ञान और उसमें प्रमाण का सविस्तर निरूपण करते हैं।

विवरण—पुरुष जिसे चाहता है उसे पुरुषार्थ कहते हैं। आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त सब जीव, उत्कृष्ट सुख की इच्छा करते हैं। धर्म, अर्थ, काम साक्षात् सुख न होकर सुख के साधन हैं और मोक्ष साक्षात् सुखस्वरूप है। इसलिए वही परम (उत्कृष्ट) पुरुषार्थ है।

परम (निरतिशय) अर्थात् जिससे अधिक सुख नहीं और जिसका कभी क्षय नहीं होता ऐसा पुरुषार्थ सुख ही मोक्ष है। मोक्ष की परम पुरुषार्थता '(सः) न च पुनरावर्तते' इस छान्दोग्य श्रुति ने बताई है। (सः) = ब्रह्मज्ञान से मुक्त हुआ जीव, 'पुनः च' अन्य कल्प के आरम्भ में भी 'न आवर्तते' बार-बार जन्म-मरणरूप ससार को प्राप्त नहीं होता। यह श्रुति का अर्थ है।

इस प्रकार मोक्ष के परम पुरुषार्थत्व में श्रुत्युक्त हेतु बताकर धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों में नित्यत्व नहीं—इस विषय में भी प्रत्यक्ष और श्रुति इन दो प्रमाणों को दिखाते हैं। अर्थ (वित्त) और काम (पुत्रादि) इनसे पुरुष को सुख होता है, परन्तु ये दोनों सुखसाधन विनाशी हैं। यह हमें 'अतोऽन्यदार्तम्' नित्य भूमाख्य आत्मा से अन्य समस्त विनाशी हैं, इस श्रुति से और प्रत्यक्ष-प्रमाण से भी ज्ञात होता है।

श्रुतिस्मृतिविहित धर्म भी सुख का साधन है, क्योंकि धर्माचरण से पुण्याख्य अदृष्ट अथवा अपूर्व उत्पन्न होता है और उससे मरणोत्तर स्वर्गादि सुख प्राप्त होता है। परन्तु धर्माचरण भी एक प्रकार का कर्म ही है और कर्म से मिलने वाला फल अनित्य होता है, यह प्रत्यक्ष अनुभव है। कृषि, राजसेवा आदि कर्मों से मिला हुआ धान्य, धन आदि फल, उपभोग से क्षीण होता है, यह प्रसिद्ध ही है। इसी प्रकार पुण्याचरण से मरणोत्तर


भयनिरूपणम्प्रमाणाधीनमिति प्रमाणनिरूपणमपि कर्तव्यं भवति । सप्रपञ्चमिति ब्रह्मादित्रितयस्य विशेषणं बोध्यम् । सप्रपञ्चं सपरिकरमित्यर्थः । यस्य निरूपणे यः अपेक्षितो भवति स तस्य परिकरः । निर्गुणत्व-जीवाऽभिन्नत्व-सत्यत्वादयो ब्रह्मपरिकराः । निर्विकल्पकत्व-वेदान्तजन्यत्व-कर्मनिरपेक्षत्वाऽपरोक्षत्वादयो ब्रह्मज्ञानपरिकराः । सिद्धविषयकत्वाऽपरोक्षज्ञानजनकत्व-संसर्गाविषयकत्वादयः प्रमाणपरिकराः । तथा च सप्रपञ्चब्रह्मादिनिरूपणे षण्णाम्प्रमाणानामुपयोगः ।

८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पुरुषार्थनिरूपणम्

संपादन किया हुआ स्वर्गादि फल भी क्षीण होता है । इस तथ्य को 'तद्यथेह' इत्यादि श्रुति से अनुगृहीत हुई—'यत्कृतकं तदनित्यम्' व्याप्ति के द्वारा निश्चित किया जाता है । इस विषय में अनुमान¹ इस प्रकार है :—'स्वर्गादिसुख (पक्ष), अनित्य है (साध्य), क्योंकि वह धर्मादिसाधनजन्य है (हेतु), कृषि, सेवा आदि साधनों से प्राप्त होनेवाले सुख की तरह (दृष्टान्त)' । परन्तु इस पर मीमांसक, 'अपाम सोमममृता अभूम' 'अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति' हमलोगों ने सोमपान किया और अमृतत्व पाया, चातुर्मास्य याग करनेवाले को कभी क्षीण न होनेवाला पुण्यफल मिलता है, इस श्रुति के आधार पर "धर्म, अर्थ और काम की भी नित्यता है (प्रतिज्ञा), क्योंकि उनमें पुरुषार्थत्व है (हेतु), मोक्ष के समान (दृष्टान्त) ।"—ऐसा प्रत्यनुमान² करते हैं । परन्तु यह अनुमान, पूर्वोक्त श्रुति के द्वारा अनुगृहीत न होने से बाधित होता है । तथाहि³—'वह्नि उष्ण है, क्योंकि उसमें पदार्थत्व है, सूर्य के समान' इस अनुमान में 'पदार्थत्व' हेतु जैसे बाधित⁴ होता है । क्योंकि जो पदार्थ हो वह उष्ण हो—यह अनुभूत नहीं है । उसी तरह जो पुरुषार्थ हो वह नित्य हो—यह भी अनुभव के विरुद्ध है । क्योंकि अर्थ वित्त, पुरुषार्थ है । परन्तु वह नित्य नहीं है । इसलिए सोमपान का 'अमृत' रूप फल, और चातुर्मास्ययाग का 'अक्षय्य सुख' रूप फल, कर्मजन्य होने से परमार्थ (नित्य) नहीं है । किन्तु वह प्रलय काल तक ही रहने वाला है । पूर्वोक्त श्रुति में 'अमृत' और 'अक्षय्य' शब्द इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हैं ।

आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते'—भूतों के, प्रलय पर्यन्त रहनेवाले स्थान को (आकल्प स्थायी पदार्थ को) 'अमृतत्व' कहते हैं, ऐसा वचन है । इस प्रकार मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है, इस बात को सिद्ध कर 'तरति शोकम् आत्मवित्' 'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' 'नान्यः पन्था विद्यते अयनाय'—"आत्मज्ञ, शोक को तर जाता है । उसी आत्मा को जान कर मनुष्य मृत्यु का उल्लंघन करता है, आत्मलाभ के लिए ज्ञान के सिवाय दूसरा मार्ग नहीं," इत्यादि श्रुतियों के आधार से ब्रह्मज्ञान ही उसका साधन है, यह मूल ग्रन्थ के 'स च ब्रह्मज्ञानात्' इन शब्दों से कहा गया है ।

'इति'—जबकि मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है और वह ब्रह्मज्ञान से ही प्राप्त होता है ऐसी परिस्थिति में मंदबुद्धि मुमुक्षुजनों पर उपकार करने के लिए ब्रह्म, ब्रह्मज्ञान और


१. स्वर्गादिसुखमनित्यं धर्मादिसाधनजन्यत्वात् कृषिसेवादिसाधनजन्यसुखवत् । २. धर्मार्थकामा नित्याः पुरुषार्थत्वात् मोक्षवत् । ३. वह्निः उष्णः पदार्थत्वात् सूर्यवत् । ४. 'यस्य साध्याभावः प्रमाणान्तरेण निश्चितः स बाधितः' । यत्र यत्र पदार्थत्वं तत्र तत्रोष्णत्व मितिव्याप्तिर्नास्ति । तथैव यः यः पुरुषार्थः स स नित्य इति व्याप्तिर्नास्ति, यतोऽर्थस्य पुरुषार्थत्वेऽपि नित्यत्वं नास्ति ।

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९

ब्रह्मज्ञान में प्रमाण इनका इस ग्रंथ में विस्तार के साथ ग्रन्थकार द्वारा निरूपण किया जा रहा है।

( प्रमालक्षणम् )

तत्र प्रमाकरणं प्रमाणम्।¹ तत्र स्मृतिव्यावृत्तं प्रमात्वं, ‘अनधिगताबाधित-²विषयज्ञानत्वम्’। स्मृतिसाधारणं तु ‘अबाधित³-विषयज्ञानत्वम्’ ।

अर्थ- 'तत्र'—ब्रह्म, ब्रह्मज्ञान और उसमें प्रमाण इनमें प्रमा का जो करण ( साधन ) वह प्रमाण है। प्रमा का अर्थ है यथार्थज्ञान। ( कुछ लोग⁴ स्मृति-ज्ञान को प्रमा नहीं मानते। इसलिए यहाँ प्रथमतः स्मृति में न जाने वाला 'प्रमा' का लक्षण कहते हैं— ) अनधिगत और अबाधित विषय का ज्ञान ही प्रमा है। ( परन्तु कुछ लोग स्मृति-ज्ञान को भी प्रमा मानते हैं। इसलिए स्मृति तथा अनुभव इन दोनों ज्ञानों के लिए जो साधारण हो ऐसा प्रमा का दूसरा लक्षण करते हैं ) अबाधित विषय का ज्ञान ही प्रमा है। यही स्मृति साधारण प्रमा है।

विवरण- 'न हि लक्षणप्रमाणाभ्यां विना वस्तुसिद्धिः'—लक्षण और प्रमाण के बिना किसी वस्तु की सिद्धि नहीं हुआ करती, ऐसा न्याय है। अतः यहाँ पर प्रमाण का


१. प्रमेयनिंरूपणम्प्रमाणाधीनमिति प्रथमं प्रमाणमेव निरूपणीयम्। विशेषज्ञानस्य सामान्यज्ञानपूर्वकत्वात् प्रथमं तावत् प्रमाणस्य सामान्यलक्षणं निरूप्यते। प्रमाणलक्षणस्य प्रमाघटितत्वात् प्रथमं तावत् प्रमात्वं निरूप्यते। तत्र अभिव्यक्तचैतन्यस्यैव प्रमात्वं, तस्यैव अज्ञानविरोधित्वात्। अतोऽज्ञानविरोधिचैतन्यस्यैव प्रमात्वमुच्यते। अन्तःकरणपरिणामरूपाया वृत्तेस्तु जडत्वात् नाऽज्ञानविरोधित्वमिति न प्रमात्वम् किन्तु प्रमाकरणत्वेन तस्याः प्रमाणत्वम्। इन्द्रियादेः प्रमाणत्वव्यवहारस्तु प्रमाणजनकतया गौणो विज्ञेयः। न्यायरत्नावलीकाराणामपि एतदभिमतम्— "चक्षुरादेः प्रमाणत्वव्यवहारस्तु वृत्तिजनक तयौपचारिकः" इति स्थितिः, तथापि प्रत्यक्षपरिच्छेदे चैतन्यस्य प्रमात्वम्, अनुमानपरिच्छेदे वृत्तेः प्रमात्वं दर्शितवान् ग्रन्थकारः। तत्र स्वाकार-वृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यस्य प्रमात्वे वृत्तेः करणत्वम् व्यापारस्तु वृत्ति-विषययोः सम्बन्धः, स च सर्वप्रमाणसाधारणः। वृत्तेः प्रमात्वे तु करणानि इन्द्रियाणि व्याप्तिज्ञानादीनि च। व्यापारस्तु विषयेन्द्रियसम्बन्धरूपो व्याप्तिसंस्कारादिरूपश्च।
२-३. तार्थविषयक—इति पाठान्तरम्।
४. माध्व-वैशेषिकादयः स्मृतेः प्रमात्वं स्वीकुर्वन्ति, किन्तु नैयायिकादयः स्मृतेः प्रमात्वं न स्वीकुर्वन्तीतिमतद्वयम्। तथा च प्रमात्वं स्मृत्यवृत्ति स्मृतिवृत्तिचेति। तत्र व्यवहारे भाट्टनय इतिचित्सुखाचार्योक्तमनुस्मरन् भाट्टाभिमतं स्मृत्यवृत्ति-प्रमात्वस्य स्वरूपं 'स्मृतव्यावृत्त'मिति ग्रन्थेनोक्तवान् ग्रन्थकारः।

१०वेदान्तपरिभाषा[ प्रमालक्षणम्

निरूपण करने के लिए प्रारम्भ में ही प्रमाण-लक्षण बताया गया है ‘प्रमाकरणं प्रमाणम्’। यहाँ ‘प्रमाण’ यह लक्ष्य है और ‘प्रमाकरण’ यह उसका लक्षण है। अब इस लक्षण में पदकृत्य बताते हैं—यहाँ यह शंका हो सकती है कि ‘करणम्’ इतना ही प्रमाण का लक्षण न करके ‘प्रमाकरणम्’ इतना बड़ा लक्षण क्यों किया है ? और ‘करण’ क्या वस्तु है अर्थात् ‘करण’ किसे कहते हैं ?

उत्तर—‘करणं प्रमाणम्’ इतना ही यदि प्रमाण का लक्षण किया जाय तो ‘दण्डादि’ भी घटादिकों का करण हुआ करता है तो दण्डादिकों को भी ‘प्रमाण’ कहना पड़ेगा अर्थात् प्रमाण का लक्षण दण्ड आदि में अतिप्रसक्त (अतिव्याप्त) होगा। यह अतिव्याप्ति दोष न आने पावे इसलिये ‘प्रमा का जो करण, वह प्रमाण है’ ऐसा कहना आवश्यक हो जाता है। ‘व्यापारवत् असाधारणं कारणं करणम्’। व्यापारवान् होकर किसी कार्य के प्रति जो असाधारण कारण होता है उसे ही ‘करण’ कहते हैं। ‘प्रमाकरणम्’ यह प्रमाण का सामान्य लक्षण है। इस लक्षण में जो प्रमा शब्द है उसका क्या अर्थ है ? उत्तर—‘प्रमा’ का अर्थ है ‘यथार्थज्ञान’। यथार्थज्ञान, स्मृति और अनुभव भेद से दो प्रकार का है। परन्तु कुछ लोग प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उत्पन्न होने वाला जो अनुभव रूप ज्ञान है उसी को ‘प्रमा’ कहते हैं। स्मृति साक्षात् प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उत्पन्न नहीं होती, किन्तु प्रत्यक्षादि अनुभव से संस्कार उत्पन्न होता है और संस्कार से स्मृति उत्पन्न होती है। संस्कारों में, प्रमाणत्व न होने से स्मृति को भी प्रमा नहीं माना जाता। इसलिए इस मत में स्मृति को छोड़कर केवल अनुभवात्मक प्रमा का ‘अनधिगताबाधित विषयज्ञानत्वं प्रमात्वम्’ यह लक्षण किया गया है। इसमें ‘प्रमात्वम्’ यह लक्ष्य है और ‘अनधिगत-अबाधित-विषयज्ञानत्वम्’ यह लक्षण है।

‘अनधिगत’—पूर्व ज्ञात न हुआ, ‘अबाधित’—दूसरे प्रमाण से ( उत्तर ज्ञान से ) मिथ्या सिद्ध न होने वाला ( बाधित न होने वाला ) जो विषय, उसका ज्ञान ही प्रमा कहा जाता है। स्मृति का विषय ( जिसका स्मरण होता है वह पदार्थ ), पूर्व अधिगत ( ज्ञात ) हुआ रहता है। क्योंकि बिना अनुभव के स्मरण नहीं होता। इसलिये लक्षण में विषय का ‘अनधिगत’ यह विशेषण लगाने से स्मृति के विषय की व्यावृत्ति हो गई। इसी प्रकार ‘शुक्तौ इदं रजतम्’ शुक्ति ( सीप ) में रजत ( चाँदी ) का ज्ञान होता है। इस ज्ञान का विषय रजत है। परन्तु उसका प्रमाण के द्वारा विवेचन किये जाने पर बाध होता है। अतः शुक्ति में होने वाला रजत-ज्ञान ‘प्रमा’ नहीं है। ऐसे बाधित विषय की निवृत्ति करने के लिए लक्षण में विषय का ‘अबाधित’ यह विशेषण लगाया गया है। अर्थात् ‘अनधिगत और अबाधित विषय का जो ज्ञान, वही प्रमा है’ यह लक्षण स्मृति में घटित न होने से केवल अनुभवात्मक प्रमा का निर्दोष लक्षण है। इस लक्षण के ‘विषयज्ञानत्व’ इस शब्द में जो ‘ज्ञान’ पद है, वह ‘प्रमा’ का स्वरूप बताने के लिए है। इच्छादि अन्तःकरण-वृत्तिरूप नहीं है। इच्छा भी एक प्रकार का अन्तःकरण-

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११

वृत्तिरूप ज्ञान ही है, परन्तु 'अनधिगत' = अज्ञात इस विशेषण से उसका निरसन हो जाता है क्योंकि ज्ञात हुए विषयों में ही इच्छादि उत्पन्न होती है।

अथवा चक्षुरादिकों में लक्षण की अतिव्याप्ति न हो इसलिए प्रमा के लक्षण में 'ज्ञान' पद दिया गया है। क्योंकि चक्षुरादिकों में भी घटादिस्फुरण के द्वारा घटादि-विषयत्व माना गया है। यहाँ पर ज्ञान का अर्थ ज्ञप्ति = अनुभव है। इस कारण उसका करण जो अन्तःकरणवृत्तिरूप ज्ञान है, उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।

पहले बता चुके हैं कि जिस स्मृति का विषय यथार्थ होता है अर्थात् उत्तरज्ञान से बाधित नहीं होता ऐसी स्मृति को भी कुछ लोग प्रमाण मानते हैं। इसलिए 'अबाधित-विषयज्ञानत्वं प्रमात्वम्' ऐसा दूसरा स्मृतिसाधारण लक्षण किया है। साधारण का अर्थ है अनेक में रहने वाला। 'उत्तर ज्ञान से बाधित न होनेवाले विषय का ज्ञान ही प्रमा है' यह लक्षण अनुभव और स्मृति इन दोनों ज्ञानों में समान रूप से घटित होता है। इसलिए प्रमा का यह लक्षण स्मृति-साधारण है। प्रथमतः 'अयं घटः' यह घट है ऐसा ज्ञान होता है और उसका किसी उत्तर-ज्ञान से बाध भी नहीं होता। उस ज्ञान से अन्तःकरण में सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न होते हैं। उन संस्कारों से आगे चलकर कुछ समय के अनन्तर उसी घट का स्मरण होता है। इस स्मृति का विषय अबाधित घट होने से यह स्मृति प्रमा है। इसी प्रकार अबाधित घट का ज्ञान भी प्रमा है। परन्तु इसके विपरीत शुक्ति में रजत का ज्ञान होने पर अथवा रज्जु में सर्प का ज्ञान होने पर उसके समीप जाकर क्या सचमुच यह रजत ही है और सर्प ही है ? इस प्रकार प्रमाण के द्वारा निरूपण करने लगते हैं तब यह रजत न होकर शुक्ति है, और यह सर्प न होकर रज्जु है, यह ज्ञान होता है। इस उत्तर ज्ञान से पहले उत्पन्न हुए रजत ज्ञान और सर्प-ज्ञान बाधित हो जाते हैं, इसलिए ऐसे स्थलों में यह अनुभवरूप ज्ञान बाधित-विषय है, प्रमा नहीं है। ऐसे बाधित-विषय की कालान्तर में होनेवाली स्मृति भी प्रमा नहीं है। इसलिए स्मृति और अनुभव इन दोनों प्रमाओं का 'अबाधित-विषय-ज्ञानत्वम्' यह साधारण लक्षण है। अनुभव और स्मृति ये दोनों ज्ञान यथार्थ तथा अयथार्थ भेद से दो प्रकार के हुआ करते हैं। इस लक्षण में भी 'ज्ञान' पद पहले की तरह इच्छादिकों की व्यावृत्ति कराने के लिए है।

प्रश्न—'अयं घटः, अयं घटः यह घट, यह घट, यह घट इस धारावाहिक अनुभव ज्ञान में 'यह घट' यह ज्ञान, दूसरे, तीसरे, चौथे आदि सभी ज्ञानों में क्रमशः (पूर्व पूर्व ज्ञान) विषय है। इसलिए द्वितीयादि ज्ञानों में अधिगतविषयत्व है। इस कारण 'अनधि-गतविषयज्ञानत्व' यह पहला लक्षण धारावाहिक प्रमा-ज्ञान में अव्याप्त हो रहा है।

नीरूपस्यापि ¹कालस्येन्द्रियवेद्यत्वाभ्युपगमेन धारावाहिक-बुद्धेरपि


१. कालस्य नीरूपत्वं सर्वसम्मतम्। द्रव्यप्रत्यक्षे महत्त्वसमानाधिकरणस्योद्भूतरूप-वत्त्वस्य प्रयोजकत्वात् कालस्य च द्रव्यस्य रूपाभावात् अतीन्द्रियत्वं नैयायिकैरभ्युपगतम्।

१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

पूर्वपूर्वज्ञानाविषयतत्तत्क्षणविशेष-^१विषयकत्वेन न तत्राव्याप्तिः ।

**अर्थ—**रूपरहित काल को हम इन्द्रियविषयत्व मानते हैं अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय से काल का प्रत्यक्ष होता है। इस कारण धारावाहिक बुद्धि को भी पूर्व-पूर्व ज्ञान का विषय न होनेवाला जो उत्तर-उत्तर द्वितीय, तृतीयादि क्षण तद्विषयकत्व है, अतः धारावाहिक बुद्धि में भी प्रथम लक्षण की अव्याप्ति नहीं है।

विवरण—'जिस द्रव्य में महत्त्व-परिमाण और उद्भूत-रूप रहता है वही द्रव्य, चक्षु का विषय होता है अर्थात् आँख से दिखाई देता है, यह तार्किकों का सिद्धान्त है। किन्तु 'इस समय घट है' यह अनुभव सभी को होता है। उपर्युक्त वाक्य में 'इस समय' यह पद वर्तमान-काल का बोध करा रहा है अर्थात् काल का प्रत्यक्ष होता है यह बात सिद्ध हो रही है। इसलिये द्रव्य के चाक्षुष प्रत्यक्ष में महत्त्व और उद्भूत रूप कारण हुआ करता है, यह (तार्किकों का) सिद्धान्त काल-रूप द्रव्य को छोड़कर इतर द्रव्यों के बारे में है; ऐसा समझना चाहिये। क्योंकि तार्किकों के कथनानुसार जिसमें महत्त्व और उद्भूत रूप नहीं होते उसका चक्षु से प्रत्यक्ष नहीं होता है। ऐसा यदि मान लिया जाय तो रूप-रहित रूप का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता है यह कहना पड़ेगा। परन्तु रूप तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है किन्तु उसमें उद्भूत रूप तथा महत्त्व नहीं होता। क्योंकि वैशेषिक लोग 'गुण' में गुण की स्थिति नहीं मानते। 'रूप' गुण है इसलिए 'रूप' नामक गुण में उद्भूत रूप नामक दूसरा गुण रहता है, यह कदापि नहीं कह सकते। इसी न्याय से रूपरहित काल भी चक्षुरिन्द्रिय का विषय होता है। 'अयं घटः, अयं घटः, अयं घटः', यह धारा-वाहिक बुद्धि भी, पूर्व-पूर्व ज्ञान का विषय न होने वाला जो उत्तर-उत्तर क्षण उसको विषय करती है। अर्थात् 'यह घट' इस प्रकार प्रथम क्षण में होनेवाले ज्ञान का विषय प्रथम क्षण में स्थित 'घट' होता है। दूसरे-तीसरे क्षण में होने वाले ज्ञान का विषय बनने वाला 'घट', पूर्व क्षण के ज्ञान का विषय बने हुए घट से भिन्न है। प्रथम क्षण में जिस 'घट' का ज्ञान हुआ, वह 'घट' प्रथम क्षण के साथ ही निवृत्त हुआ। इस कारण दूसरे क्षण के ज्ञान का विषय बनने वाला 'घट', पूर्व क्षण के ज्ञान का विषय बने हुए घट से पृथक् है। इसी प्रकार तृतीयक्षणीय ज्ञान का विषयभूत 'घट', द्वितीय क्षणिक ज्ञान के विषयभूत घट से भिन्न है। अतः धारावाहिक ज्ञान कितने ही क्षण तक होते रहने पर भी प्रत्येक क्षण के ज्ञान का विषय 'घट' भिन्न-भिन्न होने से धारावाहिक ज्ञान में


मीमांसकैः कालस्येन्द्रियवेद्यत्वमभ्युपगम्यते । तथा चोक्तं—"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यत्र कालो न भासते" इति । 'इदानीं घटः' इत्यादिप्रतीतौ कालविशेषस्य विषयत्वेनानुभवात् । अन्यथा गृहीतेऽपि घटे, 'घटो वर्तमानो नवा' इत्याकारको वर्तमानतासंशयो लोकस्य भवेत् । न च तथा, तस्मात् कालस्य प्रत्यक्षत्वं स्वीकार्यम् ।

१. विशिष्ट-विषयत्वेन-इति पाठान्तरम् ।

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३

अधिगतविषयत्व नहीं आ पाता । इसलिए 'अनधिगतज्ञानविषयत्व' यह प्रमा का लक्षण धारावाहिक बुद्धि में भी ठीक घटित हो जाता है इसलिए धारावाहिक बुद्धि में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती है। यह प्रथम-क्षण का घट, यह दूसरे क्षण का घट, यह तीसरे क्षण का घट, यह चौथे क्षण का घट इस प्रकार की धारावाहिक बुद्धि के अनेक क्षणों में से प्रत्येक क्षण का विषय ( घट ) उस-उस क्षण से विशिष्ट होने से भिन्न-भिन्न है। पूर्व क्षण-विशिष्ट विषय ही उत्तर-क्षण के ज्ञान का विषय नहीं है। इसलिए उसे अधिगत ( ज्ञात ) नहीं कह सकते । अतः धारावाहिक बुद्धि में 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती । धारावाहिक बुद्धि के, उत्तर-उत्तर क्षण में पूर्व-पूर्व क्षण का विषय ही यदि प्रतीत हुआ होता तो प्रमा का 'अनधिगतविषयत्व' यह लक्षण वहाँ अव्याप्त हुआ होता, परन्तु वैसा नहीं है, अतः प्रमा के प्रथम लक्षण में अव्याप्ति दोष नहीं है।

शंका—'इस समय घट है' इस वाक्य के 'इस समय' शब्द से वर्तमान काल का प्रत्यक्ष हो रहा है, ऐसा यदि कहें तो 'आकाश में बलाका' इस प्रतीति के बल से 'आकाश का प्रत्यक्ष हो रहा है' यह भी आप को कहना पड़ेगा । इस पर कदाचित् आप यह कह दें कि आकाश का प्रत्यक्ष होना तो हमें इष्ट ही है, परन्तु आप ऐसा कह नहीं सकते, क्योंकि आकाश का यदि प्रत्यक्ष हुआ करता तो उसका अस्तित्व सिद्ध करने के लिए 'शब्द' जिसका लिङ्ग है ऐसे अनुमान प्रमाण का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं होती । परन्तु प्रायः सभी वादी आकाश का अस्तित्व, शब्दलिङ्गक-अनुमान प्रमाण से ही सिद्ध करते हैं ।

इसके अतिरिक्त आकाश का प्रत्यक्ष होता है ऐसा मानने पर 'अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति' आकाश के अप्रत्यक्ष रहने पर भी अज्ञ लोग तलमलिनता आदि का अध्यास करते हैं ( ब्र. सू. भाष्य ), भाष्यकार के इस कथन से विरोध होगा । 'रूपरहित रूप के समान ही रूपरहित काल का भी चाक्षुष ज्ञान होना सम्भव है' यह आपने पहले कहा है । परन्तु महत्त्व और उद्भूत रूप से रहित द्रव्य का चाक्षुष ज्ञान नहीं हुआ करता, ऐसा हम तार्किकों का सिद्धान्त है। इसलिए 'रूपरहित रूप' का जो कि गुण है चाक्षुष ज्ञान हो सकेगा, लेकिन, रूपरहित 'काल' का जो कि द्रव्य है, चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता । यही कारण है कि सामने पड़े हुए चन्दन के टुकड़े को देखकर यह 'सुरभि० ( सुगन्धि ) चन्दन है', इस चाक्षुषज्ञान में 'सौरभ' की परोक्षता और 'चन्दन' की चाक्षुषता जिस प्रकार है उसी प्रकार 'इस समय यह घट है' इस वाक्य के 'इस समय' इस काल के अंश में परोक्षता ही है, ऐसा समझिये, उसे चाक्षुषता नहीं है । अर्थात् धारावाहिक बुद्धि में प्रत्येक रूपरहित क्षण को चाक्षुषत्व न होने से ऊपर दिये गये अव्याप्ति दोष की वैसी ही स्थिरता रही ।

समाधान—आप सच कह रहे हैं। परन्तु उपर्युक्त समाधान हमने आपके मत के

१४ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

अनुसार दिया था। क्योंकि आपका मत है कि 'रूपरहित रूप चाक्षुष ज्ञान का विषय होता है' तो उसी प्रकार रूपरहित काल, वायु इत्यादि द्रव्यों का भी प्रत्यक्ष हो सकता है, यह हमारा आशय था। इस पर 'महत्त्व और उद्भूतरूप से रहित द्रव्य का चाक्षुषज्ञान नहीं हुआ करता, परन्तु रूपरहित 'रूप' यह गुण होने से चक्षु का विषय हो सकता है।' ऐसा यदि आपका कहना है तो ठीक है। उपर्युक्त समाधान हमारा सिद्धान्तरूप नहीं है। इसलिए उसमें अरुचि प्रकट करते हुए धारावाहिक ज्ञान के विषय में हम अपना परम सिद्धान्त बताते हैं—

किञ्च¹ सिद्धान्ते धारावाहिक-बुद्धिस्थले न ज्ञानभेदः,² किन्तु यावद्घटस्फुरणं, तावत् घटाकारान्तःकरणवृत्तिरेकैव, न तु नाना, वृत्तेः स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिवृत्त्युत्पत्तिपर्यन्तं³ स्थायित्वाभ्युपगमात्⁴। तथा च⁵ तत्प्रतिफलितचैतन्यरूपं घटादिज्ञानमपि तत्र तावत्कालीनमेकमेवेति नाव्याप्तिशङ्काऽपि।

**अर्थ—**हमारे वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार धारावाहिक ज्ञान में ( 'यह घट है, यह घट है', इस प्रकार अनेक क्षणों तक होते रहते एकाकार ज्ञान में) वस्तुतः ज्ञान का (अन्तःकरण की वृत्ति का) भेद ही नहीं है। बल्कि जब तक घटादि एक ही विषय का स्फुरण (अनुभव) होता रहता है तब तक घटादि-विषयाकार में परिणत हुई अन्तःकरणवृत्ति एक ही रहती है। एकाकार-ज्ञान में अन्तःकरणवृत्ति अनेकाकार हो यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि अन्तःकरण की कोई भी वर्तमान वृत्ति, उसके विरुद्ध दूसरी वृत्ति उत्पन्न होने तक स्थायी (स्थिर) रहती है। अर्थात् विरोधी वृत्ति के पैदा होने तक घटादि विषयाकार वृत्ति के एक ही होने से उस स्थिर वृत्ति में प्रतिबिम्बित हुआ जो चैतन्य रूप घटादिविषयक ज्ञान, वह भी तबतक (जबतक वृत्ति स्थिर है) एक ही रहता है।


१. अन्यैरभ्युपगतं धारावाहिकज्ञानभेदमभ्युपेत्य प्रमालक्षणस्य अव्याप्तिः निवारिता। इदानीं विवरणभावप्रकाशिकोक्तमनुस्मरन् स्वसिद्धान्तं दर्शयति।
२. ज्ञानैकत्वे वृत्त्येकत्वं प्रयोजकम्।
३. पर्यन्त-स्था—इति पाठान्तरम्।
४. वृत्तेर्द्रव्यत्वात् एकद्रव्यवर्ति द्रव्यान्तरारम्भो न भवति। तथाचोक्तं विवरणभावप्रकाशिकायामज्ञानानुमाननिरूपणे—"अस्मन्मते तु धारावाहिकबुद्धिरेवनास्ति, एकस्यैव ज्ञानस्य तावत्समयस्थित्युपपत्तेः।"
अद्वैतदीपिकायाञ्च—"घटादिवद् वृत्तेरपि द्रव्यत्वात् यावद्विनाशकारणमवस्थातस्येष्टत्वात्।"
५. तत्प्रतिफलितेति वृत्तिप्रतिबिम्बितेत्यर्थः।

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १५

इसलिए 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस प्रमा के लक्षण की धारावाहिक बुद्धिस्थल में अव्याप्ति नहीं हो पाती । धारावाहिक ज्ञान में यदि 'अधिगतज्ञानविषयत्व' होता तो इस लक्षण की उसमें अव्याप्ति हुई होती । धारावाहिक ज्ञान में अनधिगत ( अज्ञात ) ही घट विषय है, अतः प्रमा का प्रथम लक्षण अव्याप्ति दोष से दूषित नहीं है।

विवरण—'इस समय यह घट है' इस वाक्य के 'इस समय' इस शब्द से वर्तमान क्षण का ज्ञान होता है । अतः काल की भी प्रत्यक्षता है यह निश्चित होता है । इसी कारण से यह कहा था कि धारावाहिक ज्ञान में प्रत्येक क्षण का विषय भिन्न, अर्थात् पूर्वक्षण का विषय उत्तर क्षण में नहीं रहने से उत्तरक्षण में विषय ज्ञात नहीं है, अपितु अज्ञात ही है । इसलिए लक्षण की अव्याप्ति नहीं है यह एक समाधान दिया था । उस पर तार्किक ने कहा था कि वैसा मानने पर 'आकाश में पक्षी' इस प्रतीति से आकाश को प्रत्यक्ष मानना होगा, परन्तु 'आकाश का प्रत्यक्ष होता है' यह कथन वेदान्त सिद्धान्त के विरुद्ध है । और 'इस समय यह घट है' इस प्रतीति की तरह 'आकाशे पतत्री' आकाश में पक्षी है यह प्रतीति भी अनुभव सिद्ध है । इस कारण पूर्वोक्त अव्याप्ति दोष स्थिर रहा । इसलिए काल की प्रत्यक्षता वेदान्त-सिद्धान्त के अनुकूल होती हुई भी वेदान्ती अब दूसरी युक्ति से पूर्वोक्त अव्याप्ति का निराकरण करते हैं ।

वेदान्त-सिद्धान्त, धारावाहिक-बुद्धि में ( 'यह घट है' इस प्रकार मुहूर्त भर स्थिर रहने वाले ज्ञान में ) ज्ञान का भेद स्वीकार नहीं करता । क्योंकि जब तक एक ही विषय प्रतीत होता रहता है तब तक तदाकार अन्तःकरणवृत्ति भी एक ही रहती है । बिना वृत्ति-भेद के ज्ञान-भेद नहीं होता । जब तक हम सामने रखे हुए घटादि किसी वस्तु की ओर देखते रहते हैं और उसका ज्ञान होता रहता है तब तक तदाकार हुई एक ही अतःकरण-वृत्ति रहती है । एक प्रत्यय ( ज्ञान ) में अनेक वृत्तियों के मानने पर गौरव ( दोष ) होगा । इस कारण 'यह घट है' इस एकाकार प्रवाह-ज्ञान में एक अन्तःकरणवृत्ति को मानना सर्वथा युक्त है, और इसी में अतिलाघव है ।

शंका—लाघव गुण के लोभ से यदि आप 'अयं घटः' 'यह घट है' इस आकार का अनुभव जब तक होता रहता है तब तक एक वृत्ति रहती है ऐसा मानते हों तो गाढ निद्रा लगने तक एक वृत्ति मानने में और भी लाघव होगा, तब जगने से लेकर सुषुप्ति तक एक ही वृत्ति क्यों नहीं स्वीकार करते ?

उत्तर—'अयं घटः' इस वृत्ति के विरुद्ध जो 'अयं पटः' यह दूसरी वृत्ति उत्पन्न होती है, वह पहली वृत्ति को नष्ट करके ही उत्पन्न होती है । 'अयं घटः' लगातार दस क्षण तक रहा, बाद में 'अयं पटः' यह दूसरा ज्ञान होगा तो ग्यारहवें क्षण में पहली घट-वृत्ति का नाश करके बारहवें क्षण में वह स्वयं उत्पन्न होगा । जिस क्षण में घटाकार वृत्ति रहेगी उस क्षण में पटाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं हो सकती । इसलिए जगने से लेकर सोने तक एक ही वृत्ति रहती है, यह नहीं स्वीकार किया

१६वेदान्तपरिभाषा[ प्रमालक्षणम्

जा सकता। जाग्रत् अवस्था में अन्तःकरण की वृत्तियों का प्रभाव निरंतर चलता रहता है। ये वृत्तियाँ पूर्व वृत्ति का नाश करके ही उत्पन्न हो सकती हैं। अतः पूर्व वृत्ति दूसरी विरोधी वृत्ति की उत्पत्ति से पूर्वक्षण तक ही स्थिर रहती है, ऐसा हम लोगों का सिद्धान्त होने से सुषुप्ति तक एक ही वृत्ति नहीं रह सकती। वृत्तियों का विरोध उनके विषयों से निश्चित होता है। घटाकार वृत्ति, पटाकार वृत्ति, जलाकार वृत्ति इत्यादि वृत्तियाँ परस्पर एक दूसरे से विरुद्ध हैं, क्योंकि उन वृत्तियों के घट, पट, जल इत्यादि विषय भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् परस्पर विरुद्ध हैं। उदासीनता के समय में भी उदासीनताकार वृत्ति रहती है। अतः वह भी अन्य सब वृत्तियों से विरुद्ध ही है। अखण्डाकार वृत्ति अपनी विरोधिनी अविद्यादि सब वृत्तियों का नाश करके दग्धेन्धनाग्नि की तरह अपना भी नाश कर लेती है। क्योंकि उस वृत्ति में अधिष्ठान ज्ञान है, इसलिए वह अविद्यादि सब वृत्तियों का नाश कर सकती है, और उसे दृश्यत्व होने से अपने को भी नष्ट कर लेती है। अधिष्ठानज्ञानत्व के रूप से वह नाशक है और दृश्यत्व के रूप से वह नाश्य है।

शंका—धारावाहिक बुद्धि में भिन्न-भिन्न ज्ञान नहीं हैं; यह बताने के लिए आपने धारावाहिक वृत्ति की एकता का कथन किया। परन्तु वह उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त में चैतन्य को ही ज्ञान शब्द से कहते हैं।

उत्तर—उपर्युक्त कथनानुसार धारावाहिक-बुद्धि में वृत्तिभेद नहीं होता अर्थात् जब तक 'अयं घट:' ऐसी एकाकार बुद्धि रहती है तब तक घटाकार अन्तःकरण-वृत्ति एक ही रहती है। और उस घटाकार वृत्ति में प्रतिबिंबित¹ हुआ चैतन्यरूप घटादि-ज्ञान भी एक ही रहता है। क्योंकि वृत्तिरूप उपाधि का भेद न होने से उस औपाधिक ज्ञान का भी भेद नहीं होता। इसलिए धारावाहिक बुद्धि में 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस लक्षणांश की अव्याप्ति की शंका भी नहीं है।

इस पर पुनः शंका करते हैं—

ननु सिद्धान्ते² घटादेर्मिथ्यात्वेन बाधितत्वात् तज्ज्ञानं कथं प्रमाणम् ?


१. ननु नीरूपायां वृत्तौ नीरूपस्य चैतन्यस्य कथं प्रतिबिम्बः ? रूपवत्येव रूपवतः प्रतिबिम्बनियमोवर्तते, इति चेन्न। नीरूपस्यापि आकाशादेः प्रतिबिम्बदर्शनात् तादृशनियमे प्रमाणाभावः। द्रव्यप्रतिबिम्बे तादृशस्य नियमस्य स्वीकारेऽपि अद्रव्यप्रतिबिम्बे तादृशस्य नियमस्याऽभावात् चैतन्यस्य निर्गुणत्वेन अद्रव्यत्वात् तत्प्रतिबिम्बे न कोऽपि बाधः। तथाचोक्तं सिद्धान्तबिन्दौ-"जपाकुसुमरूपस्य नीरूपस्यापि स्फटिकादौ प्रतिबिम्बदर्शनात्" इति।
२. सिद्धान्ते अद्वैतसिद्धान्ते। 'मिथ्यात्वेन' इत्यत्र ज्ञापकहेतौ तृतीया, तेन मिथ्यात्वज्ञानज्ञाप्यं बाधितत्वमित्यर्थः।

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १७

**अर्थ—**वेदान्त-सिद्धान्त में घटादि पदार्थों का शुक्ति-रजत की तरह मिथ्यात्व है, क्योंकि तत्त्वज्ञान से उनका बाध होता है। तब बाधित होने वाले घटादि मिथ्या विषयों (पदार्थों) के ज्ञान में 'प्रमात्व' कैसे हो सकता है ?

**विवरण—**जिस ज्ञान का विषय बाधित होता है, वह ज्ञान, अप्रमा है। अर्थात् प्रमा नहीं है, यह वेदान्त को भी स्वीकार है। तत्र प्रमा के प्रथम-लक्षण में दिये गये 'अबाधितविषयज्ञानत्व' अंश का घटादिविषयज्ञान तो प्रमाणरूप से लक्ष्य बन ही नहीं सकता। इसलिए वहाँ अव्याप्ति की शंका करना और उसका निरसन करना यह दोनों उचित नहीं हैं, इसी आशय से वादी ने यह शंका की थी १ ।

उपर्युक्त शंका का प्रतिज्ञापूर्वक समाधान— उच्यते । ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरं हि घटादीनां बाधः, २ 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्' (बृ० ४–५–१५) इति श्रुतेः, न तु संसारदशायां बाधः, 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' (बृ० ४–५–१५) इति श्रुतेः । तथा चाबाधितपदेन ३ संसारदशायामबाधितत्व विवक्षितमिति न घटादिप्रमायामव्याप्तिः ।

तदुक्तम् ४—

देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्मनिश्चयात् ॥ १ ॥

इति । आत्मनिश्चयाद् ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तमित्यर्थः । लौकिकमिति घटादिज्ञानमित्यर्थः ।

**अर्थ—**ब्रह्म-साक्षात्कार होने के अनन्तर (स्वाधिष्ठान-साक्षात्कार के अनन्तर) ही घटादि विषयों का बाध होता है। इस विषय में "जिस तत्त्व-साक्षात्कार की दशा में इस ब्रह्मज्ञ के लिए सब आत्मरूप ही हो गया हो, उस दशा में वह 'केन कं पश्येत्' अर्थात् किस करण (इन्द्रिय) से किस विषय को देखेगा।" ऐसी श्रुति है। परन्तु


१. अयमभिप्रायः—अद्वैतिवेदान्तिनां मते ब्रह्मातिरिक्तस्य सर्वस्यापि विषयस्य मिथ्यात्वेन बाधितत्वात् तत्तद्विषयकस्य सर्वस्यापि ज्ञानस्य बाधितविषयकत्वात् तत्र तत्र 'प्रमा' लक्षणस्यागमनात् अव्याप्तिः ।
२. अधिष्ठानसाक्षात्कारस्यैव अध्यस्तनिवर्तकत्वात् ब्रह्मणश्च घटाद्यधिष्ठानत्वात् ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरं घटादीनां बाधः ।
३. ब्रह्मप्रमातिरिक्तेन केनचित् ज्ञानेन घटादिविषयस्य बाधो न भवति ।
४. अतिप्राचीनेन अद्वैतवादिना सुन्दरपाण्ड्याचार्येणेति शेषः ।
२ वे० प०

१८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

संसार दशा में उनका बाध नहीं होता, इस विषय में भी 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' अर्थात् जिस संसार दशा में मानो द्वैत था, उस दशा में यह इतर (जीव) प्रमाता होकर इतर विषय को देखता है, ऐसी वहीं पर श्रुति है। इसलिए प्रमा के प्रथम लक्षण में स्थित 'अबाधित' पद से संसारदशा का 'अबाधितत्व' अर्थ विवक्षित है। इस कारण लक्षण की घटादिप्रमा में अव्याप्ति नहीं होती। इस विषय में प्राचीन सांप्रदायिकों ने ऐसा कहा है--'आ¹ आत्मनिश्चयात्' = आत्मनिश्चय (ब्रह्मसाक्षात्कार) होने तक देह ही आत्मा है—इस प्रकारका ज्ञान प्रमाण रूप में (प्रामाणिक) माना जाता है, उसी प्रकार यह घटादि लौकिक पदार्थों का ज्ञान भी 'प्रमा' है। आ आत्मनिश्चयात्—का अर्थ ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक, और 'लौकिकम्' का अर्थ घटादिज्ञान है।

विवरण—घटादि पदार्थों को शुक्तिरजत की तरह बाधितत्व होने से मिथ्यात्व है, तब बाधित होनेवाले घटादिकों के ज्ञान में प्रमात्व कैसे? उन पदार्थों का ज्ञान प्रमा न होने से घटादिज्ञान भी पूर्वोक्त लक्षणों का लक्ष्य नहीं बन सकता। वादी के द्वारा ऐसी शंका करने पर, मूल में 'उच्यते' इस पद से वादी की शंका का समाधान करने की प्रतिज्ञा करके अग्रिम 'ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरम्' इत्यादि ग्रन्थ से सप्रमाण समाधान किया गया है। घटादि व्यवहारिक पदार्थों का ब्रह्मसाक्षात्कार के अनन्तर ही बाध होता है। शुक्तिरजत की तरह वह संसार दशा में नहीं होता। शुक्ति में रजत का भास संसार दशा में होता है और उसका प्रमाण के द्वारा आलोचन किये जाने पर भासित होने वाले रजत का बाध भी उसी दशा में होता है। इसलिए शुक्तिरूप्य मिथ्या है। परन्तु व्यवहारदशा में बाधित न होनेवाले घटादिपदार्थ मिथ्या नहीं हैं। इसलिए उनका ज्ञान 'प्रमा' होने से प्रमा-लक्षण का लक्ष्य भी है। इस विषय में 'यत्र तु०' इस श्रुति का आधार दिया गया है। यहाँ 'तु' शब्द के द्वारा अविद्यावस्था की अपेक्षा विद्यावस्था की विलक्षणता को सूचित करके जिस ब्रह्मसाक्षात्कार की अवस्था में तत्त्वज्ञ की दृष्टि से सम्पूर्ण जगत् आत्मरूप ही हो जाता है, उस अवस्था में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का भेद ही नहीं रहता, ऐसी स्थिति में वह ज्ञानी किन इन्द्रियादि साधनों से कौन से घटादि विषयों का ग्रहण करेगा। ऐसा कहकर इस श्रुति से परमार्थवस्था में सभी व्यवहारावस्था का बाध हो जाता है, यह सूचित किया गया है, परन्तु संसार दशा में घटादि व्यवहारिक पदार्थों का बाध नहीं होता², इसलिए व्यवहार दशा में घटादि पदार्थ मिथ्या नहीं समझे जाते।

संसारदशा में घटादि पदार्थों का बाध नहीं होता इस विषय में 'यत्र हि०' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। जिस संसार दशा में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि द्वैत का-सा प्रत्यय


१. 'आ + आत्मनिश्चयात्' अत्र 'आङ्' इत्युपसर्गो मर्यादार्थकः।
२. घटादिनां नाशेऽपि तदुपादानस्य अज्ञानस्य सद्भावान्नबाधः, किन्तु निवृत्तिः।

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १९

होता है¹, उस द्वैतावस्था में चेतन-आत्मा, स्वरूप से च्युत होकर उपाधिलक्षण प्रमाता बन जाता है, और अपने से भिन्न विषयों को देखता है, इस प्रकार इस श्रुति का तात्पर्यार्थ है।

यदि घटादि पदार्थों को त्रैकालिक अबाधितत्व नहीं है, केवल संसार दशा में ही अबाधितत्व है तो प्रमा का पूर्वोक्त लक्षण घटादि प्रमा में अव्याप्त ही रहा, इस शंका का समाधान 'तथा च' इस ग्रन्थ से किया है—'संसारदशा में घटादि विषयों का बाध न होने से उनकी प्रमा को लक्ष्य समझा जाता है। अतः पूर्वोक्त लक्षण में प्रतीत होने वाले अव्याप्ति दोष को दूर करने के लिए लक्षणगत 'अबाधित' पद से 'संसारदशा में अबाधितत्व' यह अर्थ विवक्षित है। उससे घटादि-प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। यही समाधान-ग्रन्थ का तात्पर्य है।

'व्यवहारदशा में घटादिज्ञान प्रमा है' अपने (ग्रन्थकार के) इस कथन को पुष्ट करने के लिए प्राचीन साम्प्रदायिक विद्वानों की सम्मति को 'तदुक्तम्' इस ग्रन्थ से प्रदर्शित किया है। "आत्मनिश्चय होने तक 'देह ही आत्मा' यह अनुभव सर्वप्राणि-साधारण है और वह प्रमाण (प्रमारूपसे) माना जाता है। उसी तरह आत्मनिश्चय होने तक सभी लौकिक-ज्ञान (क्रिया-कारक-फलादि-विषयकज्ञान) प्रमाण (प्रमा) हैं" इस प्रकार उस लौकिक वचन का तात्पर्य है।

संसारदशा में भी 'यह मैं' ऐसा आत्मनिश्चय रहता है, तब 'आत्मनिश्चय होने तक' इस कथन का क्या आशय है ? ऐसी शङ्का यदि किसी को हो तो उसके समाधानार्थ ग्रन्थकार ने 'आ आत्मनिश्चयात्' इन पदों का ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक यह अर्थ बताया है। ब्रह्मसाक्षात्कार का अर्थ है आ ब्रह्मस्तम्बपर्यन्त सब प्राणियों में एकात्मा का अनुभव होना, अर्थात् संसारदशा में 'यह मैं' इस प्रकार आत्मनिश्चय होना भ्रान्त प्रत्यय है। 'यत्र त्वस्य०' इस पूर्वोक्त श्रुति वचन से यही सिद्धान्त सूचित किया है। 'लौकिकम्' शब्द से 'केवल प्रत्यक्ष प्रमाणजन्य-ज्ञान' यह अर्थ न समझा जाय, इसलिए ग्रन्थकार ने उसका अर्थ 'घटादिज्ञान' बताया है। 'ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक' ऐसा कहने से श्लोकस्थ 'लौकिक घटादिज्ञान' इन पदों से 'ब्रह्मातिरिक्त सब वस्तुओं का ज्ञान' समझना चाहिए। तब 'ज्योतिष्टोमादिकों में स्वर्गादि इष्ट फलों की साधनता है' इत्यादि ज्ञान के अलौकिक होने पर भी कोई दोष नहीं। क्योंकि 'ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक ब्रह्म-भिन्न सब वस्तुओं का ज्ञान प्रमाण (प्रमा) है' यह अर्थ स्पष्ट होता है²।

यहाँ तक प्रमा का स्मृतिव्यावृत्त और स्मृतिसाधारण ऐसा लक्षण बताया। अब


१. व्यवहारदशायां ( संसारदशायां ) द्वैतमिव = द्वैतं भवतीव। प्रपञ्चोपादानभूतेन अज्ञानेन द्विचन्द्रादिदर्शनवत् क्रिया-कारक-फल लक्षण-कल्पितभेदवदिव भवति, वास्तविकं द्वैतं न भवति।
२. प्रमासामान्यलक्षणम्—
'अनधिगत-ब्रह्मप्रमातिरिक्त-अबाधितार्थ-विषयकज्ञानत्वं प्रमात्वम्'।

२० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

उस लक्षण से लक्षित (अवगत) होने वाला जो प्रमा-करण प्रमाण है, वह कितने प्रकार का है ? ऐसी आकांक्षा होने पर प्रमाण के प्रकारों को बताते हैं—

( प्रमाणभेदनिरूपणम् )

तानि च प्रमाणानि षट्, प्रत्यक्षानुमानोपमानागमार्थापत्त्यनुपलब्धिभेदात् ।

**अर्थ—**ये प्रमाण यथार्थ ज्ञान (प्रमा) के साधन अर्थात् करण छह हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और शब्द, अनुपलब्धि ।

**विवरण—**चार्वाक के मत में केवल 'प्रत्यक्ष' ही एक प्रमाण है। कणाद, वैशेषिक और बौद्ध, के मत में 'प्रत्यक्ष और अनुमान' दो प्रमाण हैं। सांख्य के मत में 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द' तीन प्रमाण हैं। नैयायिक के मत में प्रत्यक्षादि तीन और 'उपमान' चार प्रमाण हैं। प्रभाकर मीमांसक के मत में पूर्वोक्त चार और 'अर्थापत्ति' ये पाँच प्रमाण हैं। पौराणिक के मत में पूर्वोक्त पाँच और 'सम्भव' तथा 'ऐतिह्य' सात प्रमाण हैं।¹ इन सबका निराकरण करने के लिए तथा वे छह प्रमाण कौन से ? ऐसी आकांक्षा होने पर उनका 'प्रत्यक्ष, अनुमान' इत्यादि ग्रन्थ से उद्देश (नाम-निर्देश) किया है। पौराणिकों के अभिमत सम्भवादि अधिक प्रमाणों का इन छह प्रमाणों में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अतः उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है।

इन छह प्रमाणों में से 'प्रत्यक्ष' प्रमाण, अन्य सब प्रमाणों का उपजीव्य अर्थात् कारण है, और वह अन्य किसी भी प्रमाण से पूर्व प्रवृत्त होने के कारण ज्येष्ठ भी है। इसलिए ग्रन्थकार प्रथमतः 'तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणम्', इत्यादि ग्रन्थ से उसी का निरूपण प्रारम्भ करते हैं—

( प्रत्यक्षप्रमाणनिरूपणम् )

तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणं प्रत्यक्षप्रमाणम् । प्रत्यक्षप्रमा चात्र चैतन्यमेव । 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ( बृ० ३-४-१ ) इति श्रुतेः । अपरोक्षादित्यस्यापरोक्षामित्यर्थः ;

**अर्थ—**उन छह प्रमाणों में से प्रत्यक्ष प्रमा के करण को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं ।


१. 'प्रत्यक्षमेकं चार्वाकाः कणाद-सुगतौ पुनः ।
अनुमानञ्च तच्चाथ सांख्याः शब्दश्च ते अपि ॥
न्यायैकदेशिनोऽप्येवमुपमानञ्च केचन ।
अर्थापत्त्या सहैतानि चत्वार्याह प्रभाकरः ॥
अभावषष्ठान्येतानि भाट्टावेदान्तिनस्तथा ।
सम्भवैतिह्ययुक्तानि तानि पौराणिका जगुः ॥—( तार्किकरक्षा )